Chupke Chupke Anunga - Part 3 in Hindi Love Stories by Std Maurya books and stories PDF | चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 3

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 3

लेखक -एसटीडी मौर्य ✍️

कटनी मध्य प्रदेश 


मैं अपने कमरे में गया और फ्रेश हो गया।

फ्रेश होने के बाद मैं और मेरी बहन अंकिता, दोनों प्रियांशी के कमरे की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचकर हमने दरवाज़े के बाहर से आवाज़ लगाई—
“कोई है घर में?”
हमने दो-तीन बार इसी तरह पुकारा।
कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला और सामने प्रियांशी का छोटा भाई खड़ा था।
वह हमें देखकर थोड़ा हैरान हुआ और पूछने लगा—
“आप लोग कौन हैं?”
अंकिता मुस्कुराकर बोली—
“मैं प्रियांशी की सहेली हूँ। मैं कटनी से आई हूँ। पहले मैं उनके पुराने घर गई थी, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। इसलिए मैं इतनी दूर उससे मिलने चली आई।”
लड़का बोला—
“ठीक है, आप लोग अंदर आ जाइए। दीदी अभी किचन में खाना बना रही हैं। मैं उन्हें बता देता हूँ कि आप लोग आए हैं।”
अंकिता तुरंत बोली—
“नहीं! ऐसा मत करो। उन्हें मेरे बारे में मत बताना। हम खुद जाकर उन्हें सरप्राइज देंगे।”
प्रियांशी का भाई हँसते हुए बोला—
“अच्छा, यह तो सही है। आप लोग इतनी दूर से आए हैं, और दीदी को पता भी नहीं है कि आप लोग यहाँ हैं।”
अंकिता बोली—
“हाँ, बिल्कुल!”
मैंने उससे पूछा—
“अगर तुम्हारी अनुमति हो तो बता सकते हो कि किचन किधर है? ताकि हम जाकर प्रियांशी को सरप्राइज दे सकें।”
उसने इशारा करते हुए कहा—
“सामने वाला कमरा… वहीं किचन है, दीदी वहीं होंगी।”
मैं और अंकिता धीरे-धीरे किचन की ओर बढ़े।
जैसे ही हम अंदर पहुँचे, प्रियांशी ने हमें देखा और अचानक चौंक गई।
वह कुछ पल तक हमें ध्यान से देखती रही, जैसे उसे यकीन ही नहीं हो रहा हो कि हम सच में वहाँ पहुँच गए हैं।
उसकी आँखों में आश्चर्य भी था और हल्की-सी खुशी भी…
हम धीरे-धीरे प्रियांशी के करीब गए।
हमें देखते ही वह घबरा गई और धीरे से बोली—
“तुम यहाँ कैसे आ गए? जल्दी चले जाओ, नहीं तो घर वाले देख लेंगे। फिर मुझे डाँट पड़ेगी।”
अंकिता तुरंत बोली—
“नहीं! हम नहीं जाएंगे। तुम्हारे भाई को मैं बता चुकी हूँ कि मैं तुम्हारी सहेली हूँ।”
यह सुनकर प्रियांशी थोड़ी शांत हुई और बोली—
“अगर ऐसा है तो ठीक है।”
तभी अचानक प्रियांशी की दादी वहाँ आ गईं।
उन्होंने मुझे देखा और ध्यान से देखने लगीं। फिर पूछने लगीं—
“बेटा, तुम वही हो न… जो उस दिन मेरी बिल्ली को सड़क से उठाकर हमारे घर लेकर आए थे?”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा—
“जी दादी जी, मैं वही लड़का हूँ।”
फिर मैंने कहा—
“और यह मेरी छोटी बहन है। यह आपकी नातिन की सहेली है। हम लोग इसके जन्मदिन पर इसे सरप्राइज देने आए हैं।”
दादी यह सुनकर थोड़ा हैरान हुईं और बोलीं—
“अरे! हम तो भूल ही गए थे कि आज मेरी नातिन का जन्मदिन भी है।”
यह सुनकर प्रियांशी भी मुस्कुराने लगी, और अंकिता खुशी से उछल पड़ी।
अब घर का माहौल थोड़ा खुशियों से भर गया था…
दादी मुस्कुराते हुए बोलीं—
“आज तुम दोनों कहीं नहीं जाओगे। आज मेरी नातिन का जन्मदिन है और हम इसे बड़ी धूम-धाम से मनाएंगे।”
मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा—
“नहीं दादी जी, हमें जाना होगा। घर पर भी वापस पहुँचना है।”
दादी ने प्यार से कहा—
“अरे बेटा! तुम इतने दूर से आए हो। आज तुम्हें यहीं रुकना ही होगा… मेरी कसम।”
दादी की बात सुनकर मैं मना नहीं कर पाया।
मैंने मुस्कुराते हुए कहा—
“ठीक है दादी जी, अगर आप कह रही हैं तो हम रुक जाते हैं।”
यह सुनकर दादी बहुत खुश हो गईं।
फिर उन्होंने प्रियांशी से कहा—
“बेटी, तुम जल्दी से तैयार हो जाओ। सोचो कि आज जन्मदिन में क्या-क्या बनाना है और किन लोगों को बुलाना है।”
तभी प्रियांशी का भाई बोला—
“अरे दादी, यहाँ हमारा कोई खास जान-पहचान वाला नहीं है। हम अभी तो इस शहर में नए ही आए हैं।”
दादी बोलीं—
“हाँ बेटा, यह बात तो सही है। चलो, पहले फोन करके पता करो कि तुम्हारे पापा-मम्मी कहाँ तक पहुँचे हैं।”
प्रियांशी के भाई ने तुरंत अपने पापा को फोन किया और पूछा—
“पापा, आप अभी कहाँ हैं?”
उधर से पापा ने जवाब दिया—
“बेटा, मैं रास्ते में हूँ। थोड़ी ही देर में घर पहुँचने वाला हूँ।”
भाई ने कहा—
“ठीक है पापा, आप आराम से आइए।”
इतना कहकर उसने फोन काट दिया।
फिर हम सब मिलकर घर की सजावट करने लगे।
हमने गुब्बारे फुलाए, रंग-बिरंगी लड़ियाँ लगाईं और कमरे को अच्छे से सजाने लगे।
धीरे-धीरे आधी सजावट हो चुकी थी।
शाम भी होने लगी थी।
करीब शाम 6 बजे प्रियांशी के पापा बाज़ार से घर लौट आए…


✨✨✨✨
वे आए और हमें देखा। फिर उन्होंने अपनी बेटी से धीरे से हमारे बारे में पूछा। प्रियांशी ने उन्हें हमारे बारे में बताया।
मैं और मेरी बहन अंकिता दोनों ने अंकल को नमस्ते किया।
उन्होंने भी हमसे कुछ बातें कीं और पूछा कि हम यहाँ कैसे आए।
अंकिता बोली—
“बस ऐसे ही… हमें प्रियांशी को सरप्राइज देना था, इसलिए हम आ गए। क्या हम गलत कर दिए?”
प्रियांशी के पापा बोले—
“ऐसा नहीं है बेटी। इसे अपना ही घर समझो। तुम भी मेरी बेटी की तरह हो। जब चाहो, तब आ जाया करो।”
लेकिन हमारे बारे में प्रियांशी को ज़्यादा मालूम नहीं था कि हम क्या करते हैं, इसलिए हम जो कहते थे, वह बस हाँ में हाँ मिला देती थी।
प्रियांशी के घर वाले हमसे बहुत प्यार से बातें कर रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे हम कोई अजनबी नहीं, बल्कि उनके अपने घर के ही सदस्य हों।
फिर यह बात छोड़कर हम सब सजावट करने लगे। हमने घर को बहुत सुंदर सजाया। करीब 8 बजे तक हम सब लोग सजावट का काम करते रहे।
जब पूरा काम हो गया, तो केक काटने की तैयारी होने लगी।
थोड़ी देर बाद जब प्रियांशी सज-सँवर कर आई, तो मैं उसे देखता ही रह गया। कुछ पल तक मेरी नज़रें उससे हट ही नहीं रही थीं। मैं उसकी मुस्कान में खो गया था।
प्रियांशी की मुस्कान इतनी सुंदर थी कि उसका पूरा चेहरा खिल उठा था, और मैं बस उसे देखता ही रह गया।
तभी अंकिता की नज़र मुझ पर पड़ गई।
उसने धीरे से मेरे सामने हाथ हिलाया, लेकिन मैं फिर भी प्रियांशी को ही देखता रहा।
तब अंकिता ने धीरे से मेरे हाथ पर हल्का-सा मारा, ताकि मैं जैसे किसी नींद से जाग जाऊँ।
उसने फिर मेरे हाथ पर मारा, तब जाकर मैं अपने खयालों से बाहर आया।
अंकिता बोली—
“अरे भैया! कहाँ खो गए थे? भाभी की खूबसूरती में क्या?”
मैंने तुरंत कहा—
“अरे पागल, छोड़ यह बात!”
फिर मैंने सबको आवाज़ लगाई—
“दादी, अंकल जी, और छोटे भाई… आप लोग भी आ जाइए। प्रियांशी तैयार हो गई है।”
यह कहते ही सब लोग मुझे देखने लगे कि मैं क्या कह रहा हूँ। लेकिन मैं तो अपनी ही धुन में बोलता जा रहा था।
प्रियांशी भी कम नहीं थी। मेरी यह पागलपन देखकर वह अंदर ही अंदर मुस्कुरा रही थी और मुझे तिरछी नज़र से देख रही थी।
उसकी वह तिरछी नज़र मुझे जैसे घायल कर रही थी।
हम दोनों की नज़रें एक-दूसरे पर ही टिकी हुई थीं।
केक काटने के लिए सब लोग एक जगह इकट्ठा हो गए।
प्रियांशी के बगल में मैं खड़ा था, और दूसरी तरफ उसकी दादी और उसके पापा थे।
हम सब इतने खुश थे कि हमें पता ही नहीं चला कि समय कब बीत गया।
फिर प्रियांशी ने केक काटा। उसके हाथों में चाकू था और दादी, पापा और अंकिता उसके साथ खड़े थे।
मैं और प्रियांशी का भाई मिलकर गुब्बारे फोड़ने लगे, जैसे की हम छोटे बच्चे हो तरह मस्ती कर रहे हों।

यह सब कार्यक्रम हो जाने के बाद हम लोग एक साथ खाना खाने के लिए बैठ गए।
अंकिता और प्रियांशी दोनों मिलकर खाना परोसने लगीं।
अंकिता और प्रियांशी आपस में बहुत मस्ती कर रही थीं। मैं एक रोटी मांगता तो वे मुझे दो दे देतीं। पनीर की सब्ज़ी में तो बस मुझे बार-बार पनीर ही दे रही थीं, दोनों मिलकर।
लेकिन मैं उन्हें डाँट भी नहीं सकता था।
मेरे बगल में प्रियांशी के पापा, उसका भाई और दादी बैठे थे। वे सब यह देखकर अंदर-ही-अंदर मुस्कुरा भी रहे थे कि दोनों मिलकर मेरे साथ जैसे कोई मज़ाक कर रही हैं।
काफी रात हो गई थी।
जब हम अपने कमरे की ओर जाने लगे, तब प्रियांशी धीरे से एक कमरे में छुप गई थी। मैं वहाँ से गुजर ही रहा था कि उसने अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे अंदर खींच लिया।
इतना ही नहीं, वह मुझसे लिपट गई।
वह जैसे बहुत भावुक और रोमांटिक हो गई थी।
जब मैंने उसकी आँखों में देखा, तो मैं भी कुछ पल के लिए खो गया।
हम दोनों इसी तरह एक-दूसरे से गले लगे खड़े थे।
तभी अंकिता वहाँ आ गई। उसने हमें देख लिया।
यह देखकर उसने तुरंत अपनी नज़रें फेर लीं और बोली—
“रात हो गई है… चलो अपने कमरे में चलते हैं।”
लेकिन हम दोनों तो एक-दूसरे में ही खोए हुए थे, इसलिए उसकी बातों पर भी हमारा ध्यान नहीं जा रहा था।

लेकिन अंकिता फिर भी करीब आई और बोली—
“भैया, चलो चलते हैं। क्या रात भर ऐसे ही गले लगे रहोगे?”
हमें लगा कि कोई और है।
हम घबरा कर एक-दूसरे से दूर हो गए। जब देखा तो वह अंकिता थी।
फिर अंकिता दुबारा बोली—
“चलो, कल मिल लेना। आज अंधेरा हो गया है। सुबह बातें कर लेना।”
प्रियांशी बोली—
“अंकिता, तुम मेरे कमरे में जाकर सो जाओ। अभी मैं तुम्हारे भैया से थोड़ी देर छत की बालकनी में बैठकर बातें करूँगी। तुम चली जाओ।”
अंकिता मज़ाक करते हुए बोली—
“मैं तो चली जाऊँगी, लेकिन पहले यह बताओ… क्या मुझे यहाँ बैठने नहीं दोगी?”
प्रियांशी बोली—
“पगली, चली जाओ। बाद में सब बता दूँगी तुम्हें, प्लीज़।”
अंकिता बोली—
“ठीक है, मैं चली जा रही हूँ। तुम दोनों बातें करो।”
मैं बोला—
“अरे, रुक अंकिता! मैं अकेला यहाँ क्या करूँगा?”
प्रियांशी बोली—
“क्या आप मुझसे अकेले में बात करने से डर रहे हो?”
मैं बोला—
“ठीक है अंकिता, तुम चली जाओ।”
अंकिता बोली—
“ठीक है, तुम दोनों रात भर बातें करो। गुड नाइट, मैं सोने जा रही हूँ।”
मैंने भी प्रियांशी से कहा—
“गुड नाइट।”
और उसे सोने के लिए भेज दिया।

(अगले भाग  में  आगे की कहानी पढ़े )