लेखक -एसटीडी मौर्य ✍️
कटनी मध्य प्रदेश (भारत )
जैसा कि मैंने पिछले भाग में बताया था, रात को जन्मदिन का कार्यक्रम बहुत खुशी से पूरा हुआ था। हम सबने मिलकर केक काटा, खाना खाया और देर रात तक बातें करते रहे। उसी रात मैं और प्रियांशी छत की बालकनी में बैठकर अपने दिल की बातें भी कर रहे थे, लेकिन अचानक उनके पापा आ गए थे। उस समय हम दोनों थोड़ा डर भी गए थे, क्योंकि हमें लगा था कि शायद उन्होंने हमें देख लिया है।
अब कहानी आगे वहीं से शुरू होती है…
मैं और प्रियांशी वहीं रह गए और एक-दूसरे से बातें करने लगे।
प्रियांशी कहती है—
“आपको मैं कैसे पसंद आ गई?”
मैंने कहा—
“बस ऐसे ही… तुम दिखीं और मेरी आँखों को भा गईं। फिर मैं दौड़ते-दौड़ते तुम्हारे करीब आ गया, और क्या?”
(मैंने यह बात मज़ाक में कही।)
प्रियांशी बोली—
“सच में!
मैंने भी तुम्हें पहली बार तब देखा था, जब तुम बिल्ली के पीछे-पीछे आए थे। उस समय मैं तुम्हें ही देख रही थी। लेकिन जब तुम मुझे देखने लगे, तो मैंने अपनी नज़रें छुपा ली थीं।”
मैंने कहा—
“ओह! इसीलिए तुम मुझसे मज़ाक में पूछ रही थीं कि तुम्हें क्या चाहिए? आज समझ में आ गया।”
फिर मैंने कहा—
“चलो, अब अपनी बात बताओ। तुम्हें क्या पसंद है?”
प्रियांशी बोली—
“मेरी पसंद थोड़ी अलग है।
मैं चाहती हूँ कि मेरा ऐसा कोई हमसफ़र बने जो मुझे समझ सके और मैं उसे समझ सकूँ। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए।
क्या आप मुझसे शादी भी करोगे?”
मैंने कहा—
“बेशक, मैं तुमसे ही शादी करूँगा। अगर शादी नहीं करनी होती, तो मैं इतना दूर तुमसे मिलने नहीं आता।
लेकिन एक बात बताओ—तुम बिना बताए यहाँ कैसे आ गईं?
जानती हो, मैं तुम्हारे बारे में कितना परेशान था। मैंने बहुत से लोगों से पूछा, तब जाकर यहाँ तक पहुँचा हूँ।”
प्रियांशी बोली—
“अच्छा जी! आप मुझे इतना चाहते हैं?”
मैंने कहा—
“हाँ, मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ। तुम्हारे बिना मैं रह नहीं पाऊँगा।”
यह बात सुनकर प्रियांशी शर्माने लगी।
तभी अचानक प्रियांशी के पापा वहाँ आ गए।
प्रियांशी डर के मारे तुरंत मेरे गले से लिपट गई। वहाँ पर पर्दा था, इसलिए वह उसके पीछे छुपने लगी।
करीब 5 मिनट तक हम दोनों बिल्कुल शांत रहे।
उसके पापा इधर-उधर देख रहे थे।
उन्होंने हमें देख भी लिया था, लेकिन फिर भी कुछ कहे बिना वहाँ से चले गए।
हम यह देखकर डर गए थे कि शायद उन्होंने हमें देख लिया है, वह भी रात में।
प्रियांशी के तो पैर काँपने लगे थे।
वह अभी भी मेरे गले से लिपटी हुई थी।
उस समय वह बहुत डर रही थी, लेकिन उसके पापा ने कुछ नहीं कहा और नज़रअंदाज़ करके चले गए।
सुबह-सुबह उन्होंने हमें अपने कमरे में बुलाया और कहने लगे—
“तुम लोग एक-दूसरे को चाहते हो क्या?”
हम दोनों ने हाँ में सिर हिला दिया।
पहले जब उन्होंने हमें बुलाया था, तो हमें लगा था कि वह हमें डाँटेंगे।
लेकिन उन्होंने हमें डाँटा नहीं।
वह तो बस हमारे मन की बात जानना चाहते थे।
हम दोनों ने साफ-साफ बता दिया कि हम एक-दूसरे को बहुत चाहते हैं।
यह सुनकर वह मान भी गए।
यह बात जानकर प्रियांशी अपने पापा के गले से लिपट गई।
उसकी आँखों में आँसू थे और चेहरे पर मुस्कान भी थी।
लेकिन यह बात उस समय सिर्फ दो लोग ही जानते थे—
एक प्रियांशी के पापा और दूसरी मेरी बहन अंकिता।
धीरे-धीरे यह बात प्रियांशी के छोटे भाई को भी पता चल गई।
फिर वह हर समय हमारे साथ मज़ाक और पागलपन करने लगा।
वह कहता—
“जीजू, आप तो फँस गए हो चुड़ैल के जाल में। अब आपको कौन बचाएगा?”
फिर हँसते हुए कहता—
“कम से कम मेरे घर से तो यह चुड़ैल जाएगी, बहुत परेशान करती है मुझे।”
इतना ही नहीं, वह अपनी बहन से भी मज़ाक करता और कहता—
“तू तो गोरी है और जीजू काले हैं। तू इनके घर जाकर इनके सिर पर बैठना।”
यह सब बातें कहकर वह हमारा मज़ाक उड़ाता रहता था।
लेकिन हम कुछ कह भी नहीं सकते थे, क्योंकि वह छोटा साला था… यानी प्रियांशी का छोटा भाई।
एक दिन तो प्रियांशी के भाई ने हद ही कर दी। मज़ाक करते-करते उसने अपने पापा से कह दिया।
वह हँसते हुए बोला—
“पापा, अब तो जीजू को यहीं रोक लो। दीदी के बिना ये कहीं नहीं जाएंगे।”
यह बात सुनकर उसके पापा उसी को डाँटने लगे।
“नालायक! तू बैठा-बैठा कहानी रच रहा है। ज़्यादा मज़ाक मत कर, नहीं तो तेरी भी शादी इन्हीं के साथ ही करा दूँगा और तुझे घर से बाहर कर दूँगा।
कमाना-खाना तब तुझे पता चलेगा।”
यह बात उन्होंने हँसते हुए कही थी, इसलिए सब लोग मुस्कुरा रहे थे।
लेकिन जब प्रियांशी की दादी को यह बात मालूम चली, तो वह डंडा लेकर हमें मारने के लिए दौड़ीं और बोलीं—
“तुम लोग मुझे पहले क्यों नहीं बताए? मेरे से पहले अपने पापा को क्यों बता दिया?”
वह यह बात मज़ाक में कह रही थीं।
लेकिन प्रियांशी की मौसी जी को यह रिश्ता पसंद नहीं था। वह चाहती थीं कि लड़का उनके मनपसंद का हो और पैसा वाला हो। उन्हें प्रियांशी की खुशी से कोई मतलब नहीं था।
वह चाहती थीं कि प्रियांशी की शादी उसी लड़के से हो, जिसे वह चुनें।
वह यह बात अपने जीजू (यानी प्रियांशी के पापा) से कह रही थीं। तभी यह बात मैंने भी सुन ली थी।
यह सुनकर मुझे डर भी लगने लगा था कि कहीं वह प्रियांशी का रिश्ता किसी और जगह न तय कर दें।
(आगे की कहानी अगले भाग में )