विराज के 'इस्तीफे' शब्द ने कमरे में जैसे समय को रोक दिया था। काव्या की आँखों में आँसू थे, पर वह वहां से हिली नहीं। 'मामा जी' के नाम से संबोधित वह व्यक्ति, जो नफरत और शराब के नशे में चूर था, जोर-जोर से हंसने लगा।
"इस्तीफा? किससे इस्तीफा दे रहे हो विराज? अपनी यादों से? या उस गुनाह से जिसे तुम इस आलीशान कोठी की दीवारों में दफन करना चाहते हो?" मामा जी ने हाथ में पकड़े कांच के नुकीले टुकड़े को हवा में लहराते हुए कहा।
विराज ने काव्या का हाथ मजबूती से पकड़ा और उसे धीरे से सीढ़ियों की तरफ धकेला। "काव्या, मैंने कहा न... जाओ यहाँ से। यह मेरा अतीत है, तुम्हें इसमें जलने की ज़रूरत नहीं है।" विराज की आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी थी।
लेकिन काव्या, जो अब तक केवल एक बायोग्राफी लिखने आई एक प्रोफेशनल थी, आज खुद को इस कहानी का हिस्सा महसूस कर रही थी। उसने विराज का हाथ नहीं छोड़ा। उसने आगे बढ़कर मामा जी की आँखों में देखते हुए कहा, "अतीत कभी मरता नहीं है मामा जी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह वर्तमान को भी मार दे। आप जिस बेटी के इंसाफ की बात कर रहे हैं, क्या वह अपनी तस्वीर को जमीन पर टूटते देख खुश होती?"
मामा जी के चेहरे पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। उनकी कांपती हुई आँखों में गुस्सा और दुख का एक अजीब मिश्रण था। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "तुम नहीं जानती लड़की! इस इंसान ने नियति की मौत का सौदा किया है। यह जो बिजनेस साम्राज्य तुम देख रही हो, यह मेरी बेटी की लाश पर खड़ा है।"
विराज का चेहरा सफेद पड़ गया था। उसने दबी आवाज़ में कहा, "वह एक एक्सीडेंट था मामा जी... मैंने नियति को बचाने की पूरी कोशिश की थी।"
"झूठ!" मामा जी ने कांच का टुकड़ा फर्श पर फेंक दिया। "उस रात तुम गाड़ी नहीं चला रहे थे, तुम फोन पर अपनी डील्स फाइनल कर रहे थे। तुम्हारी लापरवाही ने मेरी बच्ची को छीन लिया।"
काव्या को अब समझ आ रहा था कि विराज के भीतर का वो 'कठोर बॉस' असल में एक गहरे आत्म-ग्लानि (guilt) का कवच था। वह खुद को सजा दे रहा था। काव्या ने विराज की तरफ मुड़कर देखा, जिसकी आँखें अब फर्श पर टिकी थीं।
"सर," काव्या ने धीमी आवाज़ में कहा, "क्या यही सच है? क्या इसीलिए आपने खुद को इस अंधेरे कमरे में कैद कर लिया था?"
विराज कुछ न बोल सका। माहौल तब और तनावपूर्ण हो गया जब मामा जी ने जेब से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला। "यह देखो काव्या, यह नियति की आखिरी चिट्ठी है जो उसने मरने से एक दिन पहले मुझे लिखी थी। इसमें उसने लिखा था कि वह विराज को छोड़ना चाहती है क्योंकि विराज के पास प्यार के लिए नहीं, सिर्फ फाइलों के लिए वक्त है।"
विराज के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने कभी यह चिट्ठी नहीं देखी थी। क्या उसकी पत्नी उससे नफरत करती थी?
अचानक बाहर पुलिस की गाड़ी के सायरन की आवाज़ सुनाई दी। शायद पड़ोसियों ने हंगामे की खबर दे दी थी। मामा जी लड़खड़ाते हुए दरवाजे की तरफ बढ़े, "आज तो मैं जा रहा हूँ विराज, लेकिन याद रखना, यह बायोग्राफी अधूरी ही रहेगी। दुनिया को तुम्हारा असली चेहरा पता चल कर रहेगा।"
मामा जी के जाने के बाद घर में फिर से वही 'बरसों पुराना सन्नाटा' पसर गया। विराज टूटकर सोफे पर बैठ गया। उसने अपना सिर अपने हाथों में थाम लिया।
काव्या उसके पास गई और फर्श पर पड़े नियति की तस्वीर के टुकड़ों को समेटने लगी। उसने एक बड़ा कांच का टुकड़ा उठाया जिसमें नियति का मुस्कुराता चेहरा दिख रहा था।
"सर, बायोग्राफी बंद नहीं होगी," काव्या ने दृढ़ता से कहा। "अब यह सिर्फ आपके करियर की कहानी नहीं होगी। यह एक इंसान के खुद को माफ करने की कहानी होगी। इस्तीफा समस्या का समाधान नहीं है, सच का सामना करना समाधान है।"
विराज ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखों में एक नई चमक थी—शायद उम्मीद की, या शायद काव्या के प्रति एक अनकहे अहसास की।
क्या विराज खुद को माफ कर पाएगा? क्या काव्या इस टूटे हुए इंसान को फिर से जोड़ पाएगी? जानने के लिए अगले भाग का इंतज़ार करें।
आपकी राय मेरे लिए बहुत कीमती है। आपको क्या लगता है, क्या विराज को उस आखिरी चिट्ठी के बारे में पहले से पता होना चाहिए था? क्या काव्या को विराज का साथ देना चाहिए या उसे इस खतरनाक अतीत से दूर चले जाना चाहिए?
अपनी प्रतिक्रियाएं और रेटिंग्स जरूर दें, क्योंकि आपकी हर एक टिप्पणी मुझे कहानी को और बेहतर बनाने की प्रेरणा देती है। जुड़े रहिए, क्योंकि अगले अध्याय में विराज के अतीत का वो पन्ना खुलेगा जो अब तक पूरी दुनिया से छिपा था।
Author name Deepti Gurjar