कमरे के अंदर की हवा में बरसों से कैद सन्नाटा अब काव्या की सिसकियों और विराज की भारी सांसों से टूट रहा था। विराज का वह कठोर चेहरा, जो ऑफिस में फाइलों और लैपटॉप के पीछे छिपा रहता था, आज कांच की तरह दरक चुका था। उसने अपनी कांपती उंगलियों से पालने के पास रखी एक छोटी सी गुड़िया को छुआ।
"इसे अनन्या बहुत पसंद करती थी," विराज की आवाज़ में वह कड़वाहट अब नहीं थी, जिसे काव्या ने सुबह नाश्ते की मेज पर महसूस किया था। "मैं हर रात इस कमरे के दरवाजे पर आकर खड़ा होता था, पर अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। मुझे लगता था कि अगर मैंने धूल की इन परतों को छुआ, तो मेरी पत्नी नियति की खुशबू हमेशा के लिए उड़ जाएगी।"
काव्या ने अपने आँसू पोंछे और धीरे से कमरे के एक कोने में रखी खिड़की के भारी पर्दे हटा दिए। बरसों बाद सूरज की एक सुनहरी किरण उस कमरे में दाखिल हुई, जिसने धूल के कणों को हवा में नचा दिया।
"सर, यादें दरवाजों में कैद नहीं होतीं, वो हमारे अंदर होती हैं," काव्या ने धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा। "आपने खुद को सजा देने के लिए इस कमरे को कब्रिस्तान बना दिया था, जबकि इसे एक मंदिर होना चाहिए था। अनन्या और नियति मैम कभी नहीं चाहती होंगी कि आप अपनी मुस्कान के साथ-साथ अपनी जिंदगी भी इस अंधेरे में दफन कर दें।"
विराज ने मुड़कर काव्या को देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सा अहसास था—जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया हो। वह कुछ कहना ही चाहता था कि अचानक नीचे वाले हॉल से किसी के ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने और कांच टूटने की आवाज़ आई।
विराज के चेहरे के भाव तुरंत बदल गए। उसकी उदासी की जगह अब एक पुराने खौफ ने ले ली। "वो यहाँ क्या कर रहा है?" उसने बुदबुदाते हुए कहा और तेज़ी से कमरे से बाहर निकला।
काव्या भी उसके पीछे-पीछे नीचे की तरफ भागी। नीचे का मंज़र देख उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। लिविंग रूम में एक अधेड़ उम्र का आदमी, जिसके बाल बिखरे हुए थे और आँखों में खून उतरा हुआ था, हाथों में शराब की बोतल लिए खड़ा था। उसने विराज की स्वर्गीय पत्नी, नियति की एक बड़ी सी फ्रेम वाली तस्वीर ज़मीन पर पटक कर तोड़ दी थी।
"विराज मल्होत्रा! तुझे क्या लगा था कि तू अपनी आलीशान कोठी में छिपकर चैन से जिएगा?" वह आदमी चिल्लाया। "मेरी बेटी की मौत का सौदा करके तूने ये साम्राज्य खड़ा किया है, और आज तू उसकी यादों को बायोग्राफी में बेचने चला है?"
विराज के हाथ मुठ्ठियों में खिंच गए। उसके गले की नसें उभर आई थीं। "मामा जी, बाहर निकलिए यहाँ से! आपकी नफरत ने पहले ही सब कुछ तबाह कर दिया है।"
काव्या स्तब्ध रह गई। मामा जी? क्या ये वही शख्स था जिसकी वजह से विराज का अतीत इतना उलझा हुआ था? उसने देखा कि वह आदमी अब विराज की तरफ बढ़ने लगा था, और उसके हाथ में कांच का एक नुकीला टुकड़ा था।
काव्या बिना सोचे समझे विराज और उस आदमी के बीच में आ खड़ी हुई। "रुकिए! आप जो भी हैं, इस घर में इस तरह तमाशा नहीं कर सकते।"
उस आदमी ने एक ठंडी हंसी हंसी। "अरे, तो ये है नई चिड़िया? विराज, तूने जल्दी ही नियति की जगह भरने का इंतज़ाम कर लिया? काव्या, सही कहा न? संभल कर रहना लड़की, इस आदमी के पास जाने वाले सिर्फ राख बनकर लौटते हैं।"
विराज ने काव्या को धीरे से अपने पीछे किया और उस आदमी की आँखों में आँखें डालकर कहा, "इस्तीफा मंजूर है मामा जी, पर आपका नहीं, मेरा। आज से ये बायोग्राफी का काम बंद। काव्या, तुम अभी इसी वक्त यहाँ से चली जाओ।"
काव्या का दिल ज़ोर से धड़का। क्या फिर से एक इस्तीफा उनकी कहानी को खत्म कर देगा? या फिर ये एक नई लड़ाई की शुरुआत थी?
कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ राज और गहरे होते जा रहे हैं। 'मामा जी' के आने से विराज के अतीत का कौन सा काला सच सामने आएगा? क्या काव्या को भी इस नफरत की आग में जलना होगा? जुड़े रहिए अगले रोमांचक अध्यायों के साथ। आपकी रेटिंग और रिव्यूज मुझे और बेहतर लिखने की प्रेरणा देते हैं।
Author name Deepti Gurjar