कमरे के भीतर का दृश्य देखकर काव्या सुन्न खड़ी थी। वह चीख जो उसके मुँह से निकली थी, अब कमरे की भारी ख़ामोशी में कहीं खो गई थी। कमरे की दीवारों पर बने रंग-बिरंगे कार्टून और बिस्तर पर रखी वह अधूरी गुड़िया चीख-चीख कर किसी की मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो वक़्त यहाँ ठहर गया हो।
विराज, जो अब तक पत्थर बना खड़ा था, अचानक टूट सा गया। वह धीरे से कमरे के बीच रखे छोटे से पालने के पास जाकर बैठ गया। उसके हाथ कांप रहे थे। "यह अनन्या का कमरा है," उसने दबी आवाज़ में कहा। उसकी आँखों में वह गुस्सा अब गहरी पीड़ा में बदल चुका था। "मेरी बेटी... जिसे मैं कभी वह दुनिया नहीं दिखा सका जिसका उसने सपना देखा था।"
काव्या ने पास आकर देखा, एक छोटी सी मेज पर विराज की उसी तस्वीर का बड़ा फ्रेम रखा था जिसे उसने कल देखा था। उस तस्वीर में विराज के साथ खड़ी महिला उसकी पत्नी थी और वह छोटी बच्ची अनन्या। काव्या को अपनी गलती का अहसास हुआ। जिसे वह कोई आपराधिक साज़िश समझ रही थी, वह दरअसल एक पिता के अधूरेपन का गहरा ज़ख़्म था।
"सात साल पहले एक कार हादसे ने मुझसे सब छीन लिया, काव्या," विराज ने शून्य में ताकते हुए कहा। "लोग कहते हैं कि यादों को मिटा देना चाहिए, लेकिन मैं इस कमरे को बंद करके अपने उस हिस्से को ज़िंदा रखना चाहता था। मुझे लगा कि अगर मैं कठोर बन जाऊँगा, तो दुनिया मुझे और दुख नहीं पहुँचा पाएगी। इसीलिए मैंने तुम्हें यहाँ से जाने को कहा, क्योंकि तुम उस सच के करीब पहुँच रही थीं जिसे मैं खुद से भी छिपाता हूँ।"
काव्या की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने धीरे से विराज के कंधे पर हाथ रखा। इस बार विराज ने उसे झिड़का नहीं। "सर, दुख को बंद कमरों में कैद करने से वह खत्म नहीं होता, बल्कि और गहरा हो जाता है। अनन्या की मुस्कुराहट इन दीवारों के लिए नहीं, बल्कि आपकी यादों में महकने के लिए थी। उसे दुख नहीं, आपकी ख़ुशी चाहिए थी।"
उस रात विराज पहली बार घंटों बात करता रहा। उसने बताया कि कैसे अनन्या को कहानियाँ सुनना पसंद था और कैसे वह अपनी पत्नी के जाने के बाद पूरी तरह टूट गया था। काव्या ने महसूस किया कि विराज का वह 'रूखा व्यवहार' और 'पत्थर जैसी ख़ामोशी' दरअसल उसका कवच था।
जब सुबह की पहली किरण कमरे की खिड़की से भीतर आई, तो कमरे का माहौल कुछ बदला हुआ था। विराज खड़ा हुआ और उसने पहली बार काव्या की आँखों में सीधे देखते हुए एक हल्की सी मुस्कान दी।
"काव्या, तुमने कल इस्तीफे की बात की थी," विराज ने गंभीर स्वर में कहा। काव्या का दिल बैठ गया। उसे लगा कि शायद अब भी वह उसे नौकरी से निकाल देगा। लेकिन विराज आगे बोला, "मैं तुम्हारा इस्तीफा नामंजूर करता हूँ। मेरी बायोग्राफी अधूरी है... और मुझे लगता है कि अब मेरे पास अपनी कहानी का सबसे ज़रूरी हिस्सा लिखने की हिम्मत आ गई है। क्या तुम मेरी मदद करोगी?"
काव्या ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसे अहसास हुआ कि यह केवल एक नौकरी नहीं थी, बल्कि दो टूटे हुए दिलों के बीच पनपते एक अनकहे रिश्ते की शुरुआत थी। लेकिन क्या विराज का अतीत उसे इतनी आसानी से पीछा छोड़ने देगा? या अभी कुछ और राज़ हैं जो इस 'हवेली' की दीवारों में दफन हैं?
क्या आपको लगता है कि विराज अब पूरी तरह बदल जाएगा? या फिर उसका अतीत एक बार फिर उनके बीच दीवार बनकर खड़ा होगा? कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं ✨✍️
Author name Deepti Gurjar