ishq or istifa - 5 in Hindi Love Stories by Deepti Gurjar books and stories PDF | इश्क और इस्तीफा - 5

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इश्क और इस्तीफा - 5

                      Chapter 5


रात के सन्नाटे में काव्या की आँखों से नींद कोसों दूर थी। वह फोटो रह-रहकर उसके सामने आ रही थी—विराज मल्होत्रा, जिसके चेहरे पर आज पत्थर जैसी खामोशी रहती है, उस तस्वीर में एक खिलखिलाते हुए युवा के रूप में था। उसके साथ वाली महिला और वो छोटी बच्ची कौन थी? क्या वही उस बंद कमरे का राज़ थे?

अगली सुबह काव्या ने तय किया कि वह अब सीधे सवाल नहीं करेगी, बल्कि विराज के व्यवहार को गहराई से समझेगी। वह नाश्ते की मेज पर पहुँची, जहाँ विराज हमेशा की तरह अपने लैपटॉप और ब्लैक कॉफी में डूबा हुआ था।

"सर, आपकी बायोग्राफी का जो पहला अध्याय मैंने लिखा है, उसे एक बार देख लेते?" काव्या ने हिचकिचाते हुए पूछा।

विराज ने सिर उठाए बिना कहा, "मेज पर रख दो। मैं ऑफिस से आकर देखूँगा। और हाँ, कल दोपहर तुम लाइब्रेरी में नहीं थी, कहाँ थी?"

विराज का स्वर सपाट था, लेकिन काव्या के दिल की धड़कन तेज हो गई। उसे लगा जैसे उसकी जासूसी पकड़ी गई हो। "मैं... मैं बस थोड़ा घर टहल रही थी, सर। जगह को महसूस करने के लिए।"

विराज उसकी आँखों में आँखें डालकर कुछ देर देखता रहा, फिर बिना कुछ कहे उठकर चला गया। उसके जाने के बाद काव्या फिर से उसी पुराने गलियारे की तरफ बढ़ी। उसे पता था कि वह बंद कमरा ही उसकी कहानी का केंद्र है।

दोपहर को, जब घर के बाकी लोग अपने कामों में मशगूल थे, काव्या ने गौर किया कि विराज की पुरानी फाइलों वाली अलमारी के पीछे एक छोटा सा लकड़ी का डिब्बा आधा छुपा हुआ है। उसने उसे धीरे से निकाला। डिब्बे के अंदर पुरानी चिट्ठियाँ और एक छोटा सा खिलौना था। एक चिट्ठी पर 'अनन्या' लिखा था।

जैसे ही उसने चिट्ठी पढ़ने के लिए खोली, पीछे से एक कड़क आवाज़ आई, "मैंने कहा था न काव्या, मेरी रूह के घाव मत कुरेदो!"

काव्या बुरी तरह चौंक गई। हाथ से चिट्ठी गिर गई। सामने विराज खड़ा था, उसकी आँखें गुस्से से लाल थीं।

"सर, मैं बस..."

"बस क्या? चोरी? जासूसी?" विराज उसकी तरफ कदम बढ़ाते हुए बोला। "तुम्हें यहाँ लिखने के लिए बुलाया गया है, मेरी निजी जिंदगी की परतों को उधेड़ने के लिए नहीं। आज और अभी, तुम यह घर छोड़कर जा सकती हो। तुम्हारा इस्तीफा मंजूर है, चाहे तुमने उसे दिया हो या न दिया हो।"

काव्या की आँखों में आँसू आ गए, पर इस बार वह डरी नहीं। "इस्तीफा तो मैं दे दूँगी सर, लेकिन वह तस्वीर... उस बच्ची की मुस्कुराहट आपके आज के इस कड़वे सच से कहीं ज्यादा बड़ी है। आप खुद को सजा दे रहे हैं या उस सच को जो उस कमरे में बंद है?"

विराज एक पल के लिए ठिठक गया। उसके चेहरे के सख्त भाव पिघलने लगे और एक गहरी बेबसी झलकने लगी। उसने काव्या की बाँह पकड़ी और उसे घसीटते हुए उस बंद कमरे के सामने ले गया। उसने जेब से एक भारी चाबी निकाली और कांपते हाथों से ताला खोल दिया।

"देखना चाहती हो न? तो देखो!"

जैसे ही दरवाजा खुला, काव्या के मुँह से चीख निकल गई। कमरा धूल से भरा नहीं था, बल्कि वह बिल्कुल वैसा ही सजा हुआ था जैसे किसी छोटी बच्ची का कमरा होता है—दीवारों पर कार्टून, बिस्तर पर गुड़िया, और हवा में एक अजीब सी उदासी।

क्या काव्या अब इस कमरे और विराज के अतीत का पूरा सच जान पाएगी?

आपको यह भाग कैसा लगा कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं और मेरे पेज को फॉलो करें ताकि इस कहानी के और भागो का नोटिफिकेशन सबसे पहले मिले रेटिंग देना न भूलें ✍️✨

Author name Deepti Gurjar