I will come secretly - Part 7 in Hindi Love Stories by Std Maurya books and stories PDF | चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 7

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चुपके-चुपके आऊँगा - भाग 7

लेखक -एसटीडी मौर्य ✍️

बस पंक्चर हो जाने के बाद हम तीनों जल्दी-जल्दी पैदल ही रेलवे स्टेशन की ओर चलने लगे। समय बहुत कम बचा था और हमारे मन में बस एक ही चिंता थी—कहीं ट्रेन छूट न जाए।

प्रियांशी बार-बार घड़ी देख रही थी और अंकिता भी घबराई हुई थी। मैं उन्हें दिलासा देता हुआ तेज कदमों से आगे बढ़ रहा था।
कुछ देर बाद आखिरकार हमें दूर से रेलवे स्टेशन दिखाई देने लगा। यह देखकर हम तीनों के चेहरे पर थोड़ी राहत आ गई।
स्टेशन के अंदर पहुँचते ही हमने चारों ओर देखा। प्लेटफॉर्म पर कुछ लोग इधर-उधर बैठे थे, कुछ लोग अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहे थे।
हम जल्दी से एक खाली बेंच पर जाकर बैठ गए, क्योंकि पैदल चलते-चलते हम सब थक चुके थे।
तभी प्रियांशी ने मेरी ओर देखते हुए कहा—
“आप अभी यहाँ बैठो, मैं अभी आ रही हूँ…”
अब कहानी आगे से -

प्रियांशी कहती हैं—
“आप अभी यहाँ बैठो, मैं अभी आ रही हूँ।”
मैंने पूछा—
“तुम कहाँ जा रही हो? अगर कुछ चाहिए तो मुझे ही बताओ, मैं लेकर आ जाऊँ।”
प्रियांशी मुस्कुराई और बोली—
“नहीं, आप यही बैठो। मैं अंकिता के साथ जा रही हूँ।”
फिर अंकिता और प्रियांशी पानी और खाने-पीने की चीज़ें लेने चली गईं। कुछ समय बाद वे दोनों वापस आईं, लेकिन टिकट लेना भूल गईं।
मैंने थोड़ी चिंता करते हुए कहा—
“अरे प्रियांशी, अभी ट्रेन आने वाली है और हम टिकट भी नहीं लिए हैं!”
अंकिता हँसते हुए बोली—
“हाँ भैया! लेकिन चिंता मत करो। वहाँ भीड़ भी नहीं है, मैं जल्दी जाकर टिकट ले आती हूँ। आप दोनों यहीं बैठो।”
मैंने कहा—
“ठीक है, लेकिन तुम दोनों साथ ही जाओ।”
अंकिता मुस्कुराई—
“ठीक है, हम दोनों टिकट लेने जा रहे हैं।”
कुछ देर बाद अंकिता टिकट लेकर लौट आईं। फिर हम तीनों प्लेटफॉर्म नंबर 5 की ओर बढ़े। हमारा कोच नंबर भी वही था जो टिकट पर लिखा था।
प्रियांशी बोली—
“हमें यहीं रुकना चाहिए।”
कुछ ही देर में ट्रेन आ गई। ट्रेन रुकते ही हम अंदर चढ़ गए। अंदर जाकर देखा तो लगभग सारी सीटें खाली थीं।
हम खुश होकर बोले—
“वाह! जगह तो मिल गई। नहीं तो जब हम कटनी से जबलपुर आए थे, तब तो हमें बैठने तक की जगह नहीं मिली थी।”
हम तीनों सीट पर बैठकर बातें करने लगे।
मैंने प्रियांशी से कहा—
“जानती हो, एक बात?”
प्रियांशी हँसते हुए बोली—
“आप बताओगे तभी तो पता चलेगा।”
मैंने कहा—
“मैंने कभी ट्रेन इतनी खाली नहीं देखी। आज पहली बार खाली ट्रेन में बैठकर जा रहा हूँ।”
अंकिता बोली—
“हाँ भैया, यह बात तो सच है। जब हम कटनी से जबलपुर आए थे, तब तो खड़े होकर आना पड़ा था।”
प्रियांशी बोली—
“इसके पीछे भी कुछ कारण होते हैं।”
मैंने पूछा—
“कौन सा कारण?”
प्रियांशी बोली—
“कभी-कभी व्यवस्था ठीक से नहीं हो पाती, इसलिए यात्रियों को परेशानी होती है।”
मैंने कहा—
“हाँ, अगर ट्रेन के कोच बढ़ा दिए जाएँ तो लोगों को आराम से जगह मिल सकती है।”
फिर हम लोग बातें कर ही रहे थे कि तभी मेरे पापा का कॉल आ गया।
पापा बोले—
“अरे बेटा! तुम अभी कहाँ हो?”
मैंने कहा—
“पापा जी, मैं अभी ट्रेन में हूँ। चिंता मत कीजिए, हम समय पर पहुँच जाएंगे। ब्लड की भी चिंता मत कीजिए, हमने इंतज़ाम कर लिया है।”
पापा बोले—
“ठीक है बेटा, ध्यान से आना। मैं तुम्हारी मम्मी के साथ अस्पताल में ही हूँ।”
मैंने कहा—
“ठीक है पापा जी, पहुँचकर कॉल करूँगा।”
पापा बोले—
“ठीक है बेटा, बाय।”
मैंने कहा—
“बाय।”
तभी प्रियांशी ने पूछा—
“पापा क्या कह रहे थे? सब ठीक है न?”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा—
“हाँ पगली, सब ठीक है। बस यह पूछ रहे थे कि गाड़ी मिल गई या नहीं।”
इतने में प्रियांशी के पापा का भी कॉल आ गया।
पापा बोले—
“अरे बेटा! ट्रेन मिली या नहीं?”
प्रियांशी बोली—
“हाँ पापा जी, ट्रेन मिल गई है। हम लोग ट्रेन में बैठ चुके हैं।”
पापा बोले—
“ठीक है बेटा, अपना ध्यान रखना। अगर कोई कुछ खाने को दे तो मत खाना।”
प्रियांशी मुस्कुराकर बोली—
“ठीक है पापा जी।”
इतना कहकर उन्होंने कॉल रख दिया।
हम तीनों खुश भी थे और थोड़ा दुखी भी।
दुखी इसलिए कि मम्मी बीमार थीं,
और खुश इसलिए कि सफर अब तक ठीक चल रहा था।
तभी अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकी।
वहाँ से एक लड़की ट्रेन में चढ़ी और हमारे पास आकर बोली—
“सर, क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ? अगर इस सीट पर कोई न बैठा हो तो।”
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“हाँ, जरूर बैठिए। यहाँ कोई नहीं बैठा है।”
लड़की बोली—
“धन्यवाद, सर।”
थोड़ी देर बाद वह लड़की फिर बोली—
“आप लोग कहाँ जा रहे हैं?”
मैंने कहा—
“हम कटनी जा रहे हैं।”
प्रियांशी ने पूछा—
“और आपका नाम क्या है?”
लड़की मुस्कुराकर बोली—
“मेरा नाम गुड़िया है। मैं कटनी के एक अस्पताल में नर्स हूँ।”
प्रियांशी ने पूछा—
“आप किस अस्पताल में काम करती हैं?”
गुड़िया बोली—
“मैं बजाज हॉस्पिटल में काम करती हूँ।”
यह सुनकर अंकिता धीरे से बोली—
“भैया, मम्मी भी तो उसी अस्पताल में भर्ती हैं।”
मैंने धीरे से कहा—
“हाँ, पापा ने बताया था। अभी हम इन्हें नहीं बताएँगे।”
कुछ देर बाद हमने अपना खाना निकाल लिया।
हमने गुड़िया को भी खाने के लिए कहा, लेकिन वह मना करने लगी।
गुड़िया बोली—
“नहीं, आप लोग खाइए। मैं घर से खाना खाकर आई हूँ।”
प्रियांशी बोली—
“नहीं, आपको भी हमारे साथ खाना होगा।”
गुड़िया मुस्कुराकर बोली—
“ठीक है, फिर मैं सिर्फ एक ही रोटी लूँगी।”
मैं हँसते हुए बोला—
“अरे क्यों नहीं! हम सब मिलकर खाएँगे।”
अंकिता बोली—
“हाँ भैया, आप सही कह रहे हो।”
और फिर हम सब हँसते हुए साथ बैठकर खाना खाने लगे।
कुछ समय बाद हम कटनी पहुँचने ही वाले थे कि अचानक ट्रेन बीच रास्ते में रुक गई।
दरअसल सामने से आने वाली दूसरी ट्रेन को पास देने के लिए हमारी ट्रेन को साइड में खड़ा कर दिया गया था।
हम लोग मजाक में कहने लगे—
“लगता है ट्रेन पंचर हो गई है, चलो उतरकर दक्का लगाते हैं!”
मेरी यह बात सुनकर प्रियांशी, अंकिता और नर्स गुड़िया हँसने लगीं।
प्रियांशी हँसते हुए बोली—
“हाँ चलो, जल्दी दक्का लगाते हैं, शायद ट्रेन चल पड़े।”
हम सब अभी मजाक ही कर रहे थे कि तभी ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी।
अंकिता मुस्कुराकर बोली—
“देखो! मैंने कहा था ना, ट्रेन चल पड़ेगी।”
प्रियांशी और गुड़िया हँसते हुए बोलीं—
“अरे, यह तो आपका ही ट्रेन है, आपकी बात तो मानेगी ही!”
हम सब जोर-जोर से हँसने लगे।
थोड़ी ही देर बाद ट्रेन कटनी स्टेशन के पास पहुँच गई और धीरे-धीरे रुकने लगी।
जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रुकी, चारों ओर चाय और नाश्ता बेचने वालों की आवाजें गूँजने लगीं—
“चाय ले लो… गरम चाय!”
“समोसे ले लो… गरम-गरम समोसे!”
स्टेशन पर काफी चहल-पहल थी।
ट्रेन रुकते ही हम सब अपना सामान लेकर धीरे-धीरे ट्रेन से नीचे उतर गए।

(आगे की कहानी जानने के लिए अगला भाग पढ़े )