(शाम का समय। हवेली के बाहर घंटी बजती है।)
(दरवाज़ा खुलता है। पंडित जी हाथ में पुरानी, हल्की फटी हुई डायरी लिए खड़े हैं। चेहरे पर गंभीरता।)
पंडित जी बोले -
“राधिका बहू…आज जो लाया हूँ,
वो इस घर की किस्मत बदल सकता है।”
(राधिका और Mr. राणा चौंक जाते हैं।)
(पंडित जी डायरी टेबल पर रखते हैं। कवर पर हल्के अक्षर— Suniti Thakur.)
राधिका (धीमे स्वर में) बोली -
“ये… सुनीति की डायरी?”
पंडित जी (सिर हिलाते हुए) बोले -
“हाँ।
ये वही डायरी है जो वो मंदिर से उठाकर ले जा रही थी
उस दिन…जब वो दृश्य और अदृश्य के बीच की किताब ले गई थी।”
(कमरे में सन्नाटा।)
(सुनीति और कौशिक वहीं पास खड़े हैं— सब कुछ सुन रहे हैं,
पर कोई उन्हें देख नहीं पा रहा।)
(Radhika धीरे-धीरे डायरी खोलती है।)
डायरी (सुनीति की लिखावट – वॉइसओवर) —
“अगर कोई ये पन्ने पढ़ रहा है… तो समझ लेना कि मैं या तो बहुत दूर जा चुकी हूँ या दिखाई नहीं दे रही हूँ।”
(Radhika की आँखें भर आती हैं।)
(Mr. राणा अगला पन्ना पलटते हैं।)
डायरी (वॉइसओवर) —
“कौशिक जी का अदृश्य होना सिर्फ़ एक साइंस एक्सीडेंट नहीं है।
ये एक अधूरी रिसर्च का पाप है। और उसका इलाज सिर्फ़ केमिकल नहीं, कनेक्शन है।”
Mr. राणा (धीरे से) बोले -
“कनेक्शन…?”
(पंडित जी पास आकर बैठते हैं।)
डायरी (वॉइसओवर) —
“किताब में लिखा था—
जो इंसान अदृश्य दुनिया में फँसा हो, उसे वापस लाने के लिए
उसका सच्चा प्रेम खुद को उसी दुनिया में पूरी तरह स्वीकार करना होगा।”
(राधिका की साँस अटक जाती है।)
राधिका बोली -
“मतलब… सुनीति ने जान-बूझकर खुद को अदृश्य कर लिया?”
(पंडित जी आँखें बंद कर लेते हैं।)
(Mr. राणा आख़िरी पन्ना खोलते हैं। काग़ज़ पर स्याही हल्की है,
जैसे जल्दी में लिखा गया हो।)
डायरी (वॉइसओवर) —
“अगर हम दोनों एक ही अवस्था में होंगे—
तो शायद हम एक-दूसरे को पूरा देख पाएँगे।
अगर मैं वापस न आ सकूँ… तो याद रखना—
इलाज से ज़्यादा ज़रूरी साथ था।”
(कमरा पूरी तरह शांत।)
(राधिका डायरी बंद करती है। आँसू गिरते हैं।)
राधिका बोली -
“वो कोई भूत नहीं हैं… वो तो… एक-दूसरे के लिए सब कुछ खो चुके लोग हैं।”
(Mr. राणा की आवाज़ भर्रा जाती है।)
Mr. राणा बोले -
“और हम…उन्हें वापस लाने की कोशिश में बहुत देर कर चुके हैं।”
(सुनीति धीरे से आगे बढ़ती है। राधिका के कंधे के पास खड़ी होती है।)
सुनीति (फुसफुसाकर, भावुक होकर) बोली -
“कम से कम… अब सच सामने है।”
(कौशिक उसका हाथ थाम लेता है।)
डायरी के पन्नों ने वो कह दिया जो आँखें नहीं देख पा रही थीं। अब सवाल ये नहीं था कि इलाज है या नहीं—
सवाल ये था… क्या दुनिया उनके त्याग को समझ पाएगी?
(रात का गहरा सन्नाटा। हवेली के मंदिर में दीपक बुझने वाला है।)
(Mr. राणा दीये के सामने खड़े हैं। हाथ जोड़कर आँखें बंद करते हैं।)
Mr. राणा (धीरे से) बोले -
“अगर ये भी नाकाम हुआ…तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगा।”
(वो उठते हैं, लैब की चाबियाँ कसकर पकड़ लेते हैं।)
(पुरानी केमिस्ट्री लैब। जंग लगे दरवाज़े की चरमराहट।)
(लाइट जलती है। धूल के कण हवा में तैरते हैं।)
Mr. राणा बोले -
“यहीं से शुरू हुआ था…और यहीं खत्म भी होगा।”
(टेबल पर सुनीति की डायरी खुली है। पास पुराने रिसर्च पेपर।)
(Mr. राणा पन्ने पलटते हैं।)
Mr. राणा (हैरानी से) बोले -
“डायरी सही कह रही थी… एंटीडोट नहीं, सिंक्रोनाइज़ेशन चाहिए था।”
(वो बोर्ड पर बड़ा सा लिखते हैं—PHASE–LOCK MACHINE)
तार जुड़ते हैं
काँच के दो चैम्बर बनते हैं
मीटर हिलते हैं
नीली रोशनी जलती है
(मशीन तैयार है। बीच में दो लोगों के खड़े होने की जगह।)
Mr. राणा (काँपती मुस्कान के साथ) बोले -
“ये मशीन… दृश्य और अदृश्य को एक ही फेज़ में लॉक कर देगी।”
(Mr. राणा एक शीशी निकालते हैं अजीब चमकता केमिकल।)
Mr. राणा बोले -
“यही वो केमिकल है…जो सीमा तोड़ेगा।”
(वो केमिकल मशीन में डाल देते हैं।)
(मशीन से धीमी गूँज निकलती है।)
(हवेली में—सुनीति और कौशिक आमने-सामने खड़े हैं।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“डर लग रहा है…”
कौशिक (मुस्कुराकर) बोला -
“जब तुम साथ हो,तो डर भी आसान लगता है।”
(वो एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं।)
(Mr. राणा मशीन के पास खड़े हैं।)
Mr. राणा बोले -
“सब तैयार है…अब बस तुम दोनों को मशीन के अंदर जाना होगा।”
(मशीन की रोशनी तेज़ हो जाती है।)
(सुनीति और कौशिक मशीन के सामने खड़े हैं।)
सुनीति (आँखों में आँसू लिए) बोली- “अगर हम वापस न आए तो?”
Mr. राणा (गंभीर स्वर में) बोले -
“तो भी…तुम दोनों साथ रहोगे।”
(कौशिक सुनीति का माथा चूमता है।)
कौशिक बोला -
“जो भी होगा…साथ।”
(मशीन का दरवाज़ा खुला है। अंदर नीली–सफेद रोशनी।)
(दोनों एक कदम आगे बढ़ाते हैं।)
(दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद होने लगता है।)
अब सवाल ये नहीं था कि मशीन काम करेगी या नहीं…
सवाल ये था—
क्या प्रेम दृश्य और अदृश्य की इस सीमा को पार कर पाएगा?