(घर में सन्नाटा है। दीवार घड़ी की टिक-टिक साफ़ सुनाई दे रही है।)
(Mr. राणा सोफ़े पर बैठे हैं। नींद नहीं आ रही। हाथ में वही चश्मा है जिसे राधिका ने चुपके से रख दिया था।)
Mr. राणा (खुद से) बोले -
“राधिका कुछ दिनों से बदली-बदली सी है… बच्चे भी… जैसे किसी से बात करते रहते हों।”
(वो चश्मे को घूरते हैं… फिर धीरे से पहन लेते हैं।)
(जैसे ही चश्मा आँखों पर चढ़ता है— कमरे का सन्नाटा टूटता है।)
(खिड़की के पास एक आदमी खड़ा है। शांत, गंभीर, आँखों में थका हुआ सुकून।)
Mr. राणा (हड़बड़ाकर खड़े होते हुए) बोले -
“क…कौन है वहाँ?!”
(कौशिक मुड़ता है। पहली बार कोई मर्द उसे देख पा रहा है।)
कौशिक (धीमी लेकिन स्थिर आवाज़ में) बोला -
“डरिए मत।
मैं…इस घर का पुराना मालिक हूँ।”
(Mr. राणा एक कदम पीछे हटते हैं। मुट्ठियाँ कस जाती हैं।)
Mr. राणा बोले -
“पुराना मालिक?
तो वही हो तुम…जिसके बारे में बच्चे बात करते हैं?”
(कौशिक सिर झुका लेता है।)
कौशिक बोला -
“हाँ।
मेरा नाम कौशिक है।”
Mr. राणा (कठोर स्वर में) बोले -
“मेरे बच्चों के पास तुम्हारा क्या काम?”
(कौशिक की आवाज़ में दर्द उतर आता है।)
कौशिक बोला -
“काम नहीं…बस कमी।”
(Mr. राणा चौंकते हैं।)
कौशिक (आगे) बोला -
“जो कमी एक माँ-बाप के होने से पूरी होती है।
हमने उन्हें कभी डराया नहीं…सिर्फ़ सुलाया है।”
Mr. राणा (गुस्से में) बोला -
“ये मेरा घर है!
मेरे बच्चे हैं!
तुम्हें कोई हक़ नहीं—”
(तभी पीछे से सुनीति की आवाज़ आती है।)
सुनीति (शांत लेकिन भारी आवाज़ में) बोली -
“हक़ नहीं माँगा…बस दिल लग गया।”
(Mr. राणा मुड़ते हैं—पहली बार एक औरत को भी देखते हैं।)
Mr. राणा (हैरानी में) बोले -
“दो…दो लोग?”
सुनीति बोली -
“हम भूत नहीं हैं।
हम…एक अधूरा विज्ञान हैं।”
(सुनीति सब कुछ बता देती है— एक्सपेरिमेंट, अदृश्य दुनिया,
और वो कीमत जो उन्होंने चुकाई।)
(Mr. राणा की आँखें नम हो जाती हैं।)
Mr. राणा (धीमे स्वर में) बोले -
“मेरे बच्चे…अकेले महसूस करते थे।
और मुझे पता भी नहीं चला।”
(वो कुर्सी पर बैठ जाते हैं।)
(Mr. राणा कौशिक की ओर देखते हैं।)
Mr. राणा बोले -
“अगर…अगर कभी मेरे बच्चों को ज़रा भी चोट पहुँची—”
कौशिक (सीधे आँखों में देखकर) बोला -
“तो सबसे पहले मुझसे सवाल करना।”
(कुछ पल की ख़ामोशी।)
(Mr. राणा चश्मा उतारते हैं। कमरा फिर खाली दिखने लगता है।)
Mr. राणा (गहरी सांस लेकर) बोले -
“जब तक तुम मेरे बच्चों को माँ-बाप की कमी महसूस नहीं होने दोगे…”
“…तब तक ये राज़ इसी घर में रहेगा।”
उस रात एक पिता को अपने बच्चों का सच दिखा—
और एक अदृश्य आदमी को पहली बार एक मर्द की इज़्ज़त मिली।
(सुबह का समय। हवेली में हल्की धूप उतर रही है। दीपक अब भी जल रहा है।)
(सुनीति और कौशिक खिड़की के पास खड़े हैं। चेहरे पर उम्मीद और डर साथ-साथ।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“कल पहली बार किसी ने हमें बिना डर के देखा…”
कौशिक बोला -
“और पहली बार कोई हमें वापस लाने की कोशिश कर रहा है।”
(Mr. राणा एक छोटे से कमरे को अस्थायी लैब में बदल चुके हैं।
टेबल पर बीकर, फ्लास्क, केमिकल बोतलें।)
(वो अलमारी खोलते हैं—वही सील्ड कंटेनर।)
Mr. राणा (खुद से) बोले -
“यही वो केमिकल है…जिसने दो ज़िंदगियाँ छीन लीं।”
(वो सावधानी से केमिकल को मापते हैं।)
(Mr. राणा लैपटॉप पर पुराने नोट्स खोलते हैं।)
Mr. राणा बोले -
“अगर ये फेज़-शिफ्ट रिवर्स हो जाए…
तो बॉडी की विज़िबिलिटी लौट सकती है।”
(केमिकल मिलाते हैं। घोल बनता है।)
(एक चूहे पर ट्रायल।)
(कुछ सेकंड—कुछ नहीं होता।)
(रात हो जाती है। बोतलें खाली होती जा रही हैं।)
Mr. राणा (थकी आवाज़ में) बोले -
“नहीं…ये भी काम नहीं कर रहा।”
(कौशिक और सुनीति पास खड़े देख रहे हैं। उनकी आँखों में वो दर्द—जो दिखाई नहीं देता।)
सुनीति (टूटती आवाज़ में) बोली -
“शायद…हम वापस नहीं आ सकते।”
(Mr. राणा कुर्सी पर बैठ जाते हैं। हाथ काँप रहे हैं।)
Mr. राणा बोले -
“इस केमिकल ने शरीर के पार्टिकल्स को एक ऐसे आयाम में धकेल दिया है… जहाँ से लौटने का कोई सीधा रास्ता नहीं।”
कौशिक (शांत स्वर में) बोला -
“आपने कोशिश की…यही बहुत है।”
(Mr. राणा सिर झुका लेते हैं।)
Mr. राणा बोले -
“एक साइंटिस्ट होकर मैं हार मान रहा हूँ… ये सबसे भारी बात है।”
(अचानक Aarushi दौड़ती हुई आती है।)
Aarushi बोली -
“पापा!
पंडित जी फिर आए हैं!
वो कोई पुरानी डायरी ढूंढ रहे हैं!”
(सुनीति और कौशिक एक-दूसरे को देखते हैं।)
सुनीति (धीरे से) बोली -
“मेरी…डायरी।”
जहाँ विज्ञान ने हाथ खड़े कर दिए थे…वहीं शायद आस्था और त्याग अब अपनी बात कहने वाले थे।