Invisible Drink - 20 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | अदृश्य पीया - 20

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अदृश्य पीया - 20

(रात का सन्नाटा। घड़ी की टिक-टिक साफ सुनाई दे रही है।
कमरे में हल्की नीली रोशनी।)
(राधिका की नींद अचानक टूटती है।)

राधिका (मन में) बोली - 
“आज… कुछ अजीब सा लग रहा है…”

(वो धीरे से उठती है। बच्चों के कमरे की ओर जाती है।)

(आरुषि और आरव गहरी नींद में सो रहे हैं। उनके चेहरे पर अजीब सी शांति है।)

राधिका (धीमे स्वर में) बोली - 
“अजीब है…ये बच्चे हर रात इतने सुकून से कैसे सो जाते हैं…”

(तभी उसकी नज़र टेबल पर रखे चश्मे पर पड़ती है। आरुषि का चश्मा।)
(राधिका कुछ पल हिचकिचाती है।)

राधिका (खुद से) बोली - 
“बस एक बार…देख ही लेती हूँ।”

(राधिका चश्मा पहनती है। एक सेकंड… दो सेकंड…)
(अचानक उसका चेहरा सख्त हो जाता है। आँखें फैल जाती हैं।
साँस रुक-सी जाती है।)

राधिका (हांफते हुए) बोली - 
“हे… हे भगवान…!”

(बिस्तर के सिरहाने सुनीति बैठी है। उसके हाथ आरव के सिर पर हैं। वो हल्के-हल्के थपकी दे रही है।)
(दूसरी तरफब कौशिक खड़ा है। आरुषि की चादर ठीक कर रहा है।)
(दोनों के चेहरे पर असीम ममता। कोई डर नहीं।कोई हिंसा नहीं।)

राधिका (कांपती आवाज़ में) बोली - 
“य… ये…ये तो… इंसान हैं…”

(सुनीति की नज़र सीधे राधिका पर पड़ती है।)
(वो चौंकती नहीं। बस हल्की सी मुस्कान।)

सुनीति (धीरे) बोली - 
“आप डरिए मत, राधिका जी…”

(राधिका पीछे हटती है। दीवार से लग जाती है।)

राधिका बोली - 
“त… तुम…तुम लोग…कौन हो?”

(कौशिक आगे बढ़ता है। उसकी आवाज़ में कोई कठोरता नहीं।)

कौशिक बोला - 
“हम भूत नहीं हैं।
हम भी कभी इसी दुनिया का हिस्सा थे।”

(राधिका की आँखों से आँसू बहने लगते हैं।)

राधिका बोली - 
“तो…मेरे बच्चे…?”

सुनीति (नरम स्वर में) बोली - 
“सुरक्षित हैं।
हर रात हम उन्हें वैसे ही सुलाते हैं जैसे अपने बच्चों को सुलाते।”

(राधिका ज़मीन पर बैठ जाती है। हाथ जोड़ लेती है।)

राधिका (रोते हुए) बोली - 
“मुझे लगा था इस घर में कुछ गलत है…पर यहाँ तो कोई मेरे बच्चों से माँ-बाप से भी ज़्यादा प्यार कर रहा है…”

(सुनीति राधिका के पास बैठती है। उसके कंधे पर हाथ रखती है।)

सुनीति बोली - 
“हम बस इस घर में थोड़ा सा अपनापन महसूस करना चाहते थे।”

(राधिका चश्मा उतार लेती है। सुनीति और कौशिक फिर से अदृश्य हो जाते हैं।)
(लेकिन राधिका अब डरी हुई नहीं है।)

उस रात राधिका ने भूत नहीं देखे…
उसने दो टूटे हुए इंसान देखे जो बिना दिखे ममता बाँट रहे थे।

(रात का आख़िरी पहर। घर में सन्नाटा है। आरुषि और आरव गहरी नींद में हैं।)
(राधिका हॉल में बैठी है। हाथ में आरुषि का चश्मा। उसकी आँखों में नींद नहीं—सिर्फ़ सवाल हैं।)

राधिका (खुद से) बोली - 
“जो देखा…वो सपना नहीं था।”

(वो चश्मा पहनती है।)
(सोफ़े के कोने पर सुनीति बैठी है। शांत। थकी हुई।)
(राधिका चौंकती है, लेकिन इस बार पीछे नहीं हटती।)

राधिका (धीमी, कांपती आवाज़ में) बोली - 
“आप…यहीं थीं?”

सुनीति (हल्की मुस्कान के साथ) बोली - 
“हाँ…क्योंकि आज आप हमें देख पा रही हैं।”

(राधिका धीरे-धीरे सामने कुर्सी खींचकर बैठती है।)

राधिका बोली - 
“आप लोग मेरे बच्चों के साथ…क्यों?”

(सुनीति की आँखें नम हो जाती हैं।)

सुनीति बोली - 
“क्योंकि…हमारे बच्चे कभी हो ही नहीं पाए।”

(राधिका की उंगलियाँ चश्मे को कसकर पकड़ लेती हैं।)

सुनीति (धीरे-धीरे) बोली - 
“ये घर…कभी हमारा था। फिर ज़िंदगी ने हमें ऐसा मोड़ दिया
कि हम खुद ही दिखाई देना भूल गए।”

(थोड़ा रुककर)

“जब आपके बच्चे यहाँ आए… तो पहली बार घर में हँसी लौटी।
सबको लगता है हम भूत हैं। पर हम भूत नहीं लाचार इंसान हैं।
जो science के experiment का शिकार हुए हैं।”

(राधिका की आँखों से आँसू गिरते हैं।)

राधिका:
“मैं…मैं एक अच्छी माँ नहीं हूँ न?”

(सुनीति चौंकती है।)

सुनीति बोली - 
“ऐसा क्यों कह रही हैं?”

राधिका (सिसकते हुए) बोली - 
“मेरे बच्चे मुझसे लिपटकर सोना चाहते थे…
और मैं… मैंने उन्हें अकेला छोड़ दिया।”

(सुनीति आगे बढ़ती है। राधिका का हाथ थाम लेती है।)

सुनीति बोली - 
“माँ होना परफ़ेक्ट होना नहीं होता।
बस समझ जाना काफी होता है।”

(राधिका सुनीति को देखती है, अब डर नहीं, इज़्ज़त है।)

राधिका बोली - 
“आप लोग…हमारे लिए ख़तरा तो नहीं हैं न?”

(सुनीति की आवाज़ भारी हो जाती है।)

सुनीति बोली - 
“हम खुद अपनी ज़िंदगी से लड़ रहे हैं।
किसी और को नुकसान देने की ताक़त भी नहीं बची।”

(कुछ पल की ख़ामोशी।)

राधिका बोली - 
“मैं किसी को कुछ नहीं बताऊँगी।”

(सुनीति की आँखों में आभार झलकता है।)

सुनीति बोली - 
“धन्यवाद…
पर याद रखिए आप जब चाहें हमें रोक सकती हैं।”

राधिका (साफ़ स्वर में) बोली - 
“नहीं।
मेरे बच्चे आपसे सुरक्षित हैं।”

(बाहर से पक्षियों की आवाज़। सुबह होने वाली है।)
(राधिका चश्मा उतारती है। सुनीति फिर से अदृश्य हो जाती है।)
(लेकिन इस बार  घर पहले से ज़्यादा अपना लगता है।)

उस रात दो औरतें मिलीं—
एक जिसकी दुनिया दिखती थी, और एक जो दुनिया से छुप गई थी।
डर नहीं बचा था। सिर्फ़ एक गुप्त रिश्ता।