(हवन कुंड के सामने बैठे पंडित जी अचानक मौन हो जाते हैं।
मंत्र रुक चुके हैं।।उनकी आँखें आग को नहीं…किसी पुराने दृश्य को देख रही हैं।)
ये वही पंडित जी थे… जो इस घर में आज पहली बार नहीं आए थे।
ये घर…ये नाम…ये रहस्य…सब उन्हें पहले से पता था।
(पंडित जी की आँखों में बीता हुआ समय उतरता है।)
पंडित जी (मन में) बोले -
“कौशिक…विज्ञान का वो पागल लड़का…
जो अदृश्य हो गया था।”
(फ्लैशबैक शुरू होता है।)
(शाम का समय। मंदिर में दीपक जल रहे हैं। घंटी की आवाज़।)
(सुनीति मंदिर में बैठी है।
उसके हाथ में एक पुरानी मोटी किताब है।)
पंडित जी (तभी) बोले
“बेटी…ये किताब साधारण नहीं है।”
सुनीति (शांत पर दृढ़ होकर) बोली -
“मैं जानती हूँ पंडित जी।
पर अगर इसका जवाब इसमें नहीं है…तो कहीं नहीं।”
(किताब पर लिखा है—“दृश्य और अदृश्य के बीच”)
पंडित जी बोले -
“इस किताब का ज्ञान इंसान को बचा भी सकता है…और मिटा भी सकता है।”
सुनीति बोली -
“अगर मिटकर किसी की ज़िंदगी बचे…तो वो सौदा मुझे मंज़ूर है।”
(वो किताब को सीने से लगाकर मंदिर से चली जाती है।)
(फ्लैशबैक टूटता है। हवन कुंड की आग फिर से दिखती है।)
उस दिन के बाद… सुनीति कभी मंदिर नहीं आई।
और पंडित जी को यही लगा, कि वो कौशिक को लेकर कहीं दूर चली गई है।
(पंडित जी बच्चों को देखते हैं, जो हवा से बात कर रहे हैं।)
पंडित जी (मन में) बोले -
“कौशिक का अदृश्य होना मैं जानता था…पर सुनीति…?”
(उनकी नज़र आरुषि पर जाती है।)
पंडित जी (धीमे) बोले -
“क्या तू भी…उसी दुनिया में चली गई, बेटी?”
(सुनीति ठीक सामने खड़ी है। आँखों में श्रद्धा। चेहरे पर शांति।)
सुनीति (नम्र स्वर में) बोली -
“पंडित जी…मैं कहीं नहीं गई।”
(पंडित जी चौंकते हैं। पर उन्हें आवाज़ नहीं सुनाई देती।)
कौशिक (धीमे) बोले -
“आप हमें देख नहीं सकते…पर आप हमें पहचान चुके हैं।”
(पंडित जी आँखें बंद कर लेते हैं। गहरी साँस।)
पंडित जी बोले -
“अगर मेरी आत्मा सच महसूस कर रही है… तो ये घर भूतों का नहीं…”
(आँखें खोलते हैं।)
पंडित जी बोले -
“…बल्कि बलिदान करने वालों का है।”
(राधिका और मिस्टर राणा अब भी सहमे हुए हैं।)
राधिका बोली -
“पंडित जी… क्या सच में इस घर में…”
पंडित जी (शांत स्वर में) बोले -
“डरने की कोई बात नहीं है बहन।
यहाँ जो हैं…वो रक्षक हैं।”
जिस किताब को एक लड़की आख़िरी उम्मीद समझकर ले गई थी… उसी किताब ने उसे अदृश्य कर दिया।
पर पंडित जी अब समझ चुके थे—
👉 सुनीति भागी नहीं थी…
👉 वो वहीं थी…
दृश्य और अदृश्य के बीच।
(सुबह का समय। मंदिर लगभग खाली है। धूप की एक पतली लकीर पुरानी अलमारी पर पड़ रही है।)
(पंडित जी पूजा समेटते हुए अचानक रुक जाते हैं।)
पंडित जी (धीमे) बोले -
“ये…?”
(अलमारी के पीछे एक पुरानी, भूरे कवर की डायरी पड़ी है। कोनों से घिसी हुई।)
(पंडित जी डायरी उठाते हैं। कवर पर लिखा है—“सुनीति”)
(पंडित जी बैठ जाते हैं। डायरी खोलते हैं।)
वॉइस ओवर – सुनीति (डायरी से) —
“अगर कोई ये डायरी पढ़ रहा है…
तो समझ लेना मैंने वो रास्ता चुन लिया है जहाँ से लौटना शायद मुमकिन न हो।”
(पंडित जी की उंगलियाँ काँप जाती हैं।)
वॉइस ओवर – सुनीति —
“कौशिक जी को दुनिया अदृश्य कहती है,
पर मुझे तो उसका दर्द सबसे ज़्यादा दिखाई देता है।
वो चश्मा… उसकी आँखों से ज़्यादा मेरी हिम्मत बन चुका है।”
वॉइस ओवर - सुनीति —
आज मैने कौशिक जी को डांट दिया क्योंकि उन्होंने चश्मा नहीं लगाया था।
पर अब मुझे बहुत दर्द हो रहा है कि मैने उन्हें क्यों डांटा।
उनको तो चश्मा लगाने से दर्द होता है।
क्यों मैं इतनी चिड़चिड़ी हो रही हूं ?
वॉइस ओवर – सुनीति —
“किताब कहती है सच्चा प्यार अदृश्य होकर ही अदृश्य को लौटा सकता है।
अगर मुझे अपनी पहचान, अपना शरीर, अपनी दुनिया छोड़नी पड़े…तो मैं तैयार हूँ।”
(पंडित जी की आँखों से एक बूँद गिरती है।)
वॉइस ओवर – सुनीति —
“उस रात मैंने कौशिक जी को सोते देखा। उसके सिर में दर्द था।
मैंने दबाया…पर वो नहीं जानते कि उस दबाव में मेरी आत्मा टूट रही थी।”
वॉइस ओवर – सुनीति —
“केमिकल का असर धीरे नहीं हुआ। मैं घर तक पहुँची भी नहीं थी
कि मेरा वजूद हल्का पड़ने लगा।
मुझे डर नहीं लगा… क्योंकि डर तो तब लगता है जब अकेले हों।”
वॉइस ओवर – सुनीति —
“अगर कभी इस घर में बच्चे आएँ… तो उन्हें बताना यहाँ भूत नहीं रहते। यहाँ ऐसे लोग रहते हैं जो बिना दिखे रक्षा करते हैं।”
(डायरी बंद होती है।)
पंडित जी (गंभीर स्वर में) बोले -
“अब ये रहस्य केवल हवा का नहीं रहा।”
(वो खड़े होते हैं।)
पंडित जी बोले -
“अगर सुनीति अदृश्य दुनिया में है…तो उसका रास्ता यहीं से शुरू हुआ था।”
(हवेली में शांति। दीपक जल रहा है।)
(सुनीति अचानक बेचैन हो उठती है।)
सुनीति बोली -
“कौशिक जी…मेरी डायरी…”
कौशिक (चौंककर) बोला -
“क्या हुआ?”
सुनीति (धीमे) बोली -
“अगर वो मिल गई… तो शायद कोई हमें समझ पाए।”
एक डायरी जो शब्दों से भरी थी… अब रास्तों से भरी थी।
📌 डायरी मिल चुकी थी।
📌 सच लिख दिया गया था।
अब सवाल ये था—
👉 क्या पंडित जी
उस रास्ते पर चल पाएँगे
जहाँ दृश्य और अदृश्य
एक-दूसरे को छूते हैं?