(शाम का समय। राधिका किचन में खड़ी है। चूल्हे पर दूध उबल रहा है।)
(उसका ध्यान बार-बार भटक रहा है। दिल में अजीब-सी घबराहट।)
माँ का दिल कभी-कभी बिना देखे भी सब समझ लेता है।
(अचानक बच्चों के कमरे से आवाज़ आती है।)
आरुषि (हँसते हुए) बोली -
“अरे अंकल! ऐसे मत खड़े रहो ना!”
(राधिका का हाथ रुक जाता है।)
राधिका (खुद से) बोली -
“अंकल? घर में तो कोई आया नहीं…”
(राधिका दबे पाँव बच्चों के कमरे की तरफ बढ़ती है।)
(दरवाज़ा आधा खुला है।)
(वो अंदर झाँकती है।)
(कमरे में आरुषि और आरव हैं।)
(आरुषि ऐसे देख रही है जैसे किसी से बात कर रही हो।)
आरुषि बोली -
“आंटी तो बहुत प्यारी हैं।
मुझे रोज़ सुलाती हैं।”
(राधिका की साँस अटक जाती है।)
राधिका (मन में) बोली -
“मैं…मैं तो रोज़ इन्हें सुलाती भी नहीं…”
(राधिका ध्यान से देखती है।)
(तकिए अपने आप थोड़ा खिसकता है। कंबल ठीक हो जाता है।)
(लेकिन कमरे में कोई दिखाई नहीं देता।)
(राधिका एक कदम पीछे हटती है।)
राधिका (काँपती आवाज़ में) बोली -
“आरुषि…तुम किससे बात कर रही हो?”
(आरुषि पलटकर देखती है।)
आरुषि बोली -
“मम्मी…वहीं जो अंकल-आंटी हैं।”
राधिका (घबराकर) बोली -
“कौन से अंकल-आंटी?”
आरुषि (साधारण लहजे में) बोली -
“जो हमारे पास रहते हैं…जो रात को हमें सुलाते हैं।”
(राधिका का चेहरा सफ़ेद पड़ जाता है।)
राधिका बोला -
“ऐसा कुछ नहीं होता आरुषि।
तुम…तुम सपने देख रही हो।”
आरुषि (शांत स्वर में) बोली -
“नहीं मम्मी…आज तो मैं उन्हें देख भी सकती हूँ।”
(राधिका का दिल ज़ोर से धड़कता है।)
(राधिका को अचानक ठंडी हवा का झोंका लगता है।)
(जैसे कोई उसके बहुत पास से गुज़रा हो।)
(वो पलटती है पीछे कोई नहीं।)
जिसे आँखें देख न सकें…माँ का दिल उसे भी महसूस कर लेता है।
(राधिका की आँखें भर आती हैं। डर नहीं… अजीब-सा अपनापन।)
(राधिका बच्चों को सीने से लगा लेती है।)
राधिका (धीरे से) बोली -
“अगर कोई है भी…तो क्या वो तुम्हें नुकसान पहुँचाता है?”
आरुषि (तुरंत) बोली -
“नहीं मम्मी…वो बहुत अच्छे हैं।”
(राधिका बच्चों को सुलाकर कमरे से बाहर आती है।)
(वो पीछे मुड़कर खाली कमरे को देखती है।)
राधिका (मन में) बोली -
“अगर सच में कोई है…तो वो हमसे छुप क्यों रहा है?”
ये पहली झलक थी… जब एक माँ ने अदृश्य को महसूस कर लिया था।
अब सवाल ये नहीं था कि कोई है या नहीं…
सवाल ये था—
वो कौन है?
और क्यों है?
(सुबह का समय। हवेली के आंगन में पूजा की तैयारी चल रही है।हवन कुंड, फूल, धूप, दीप, मंत्रों की पुस्तकें।)
राधिका को यकीन हो चला था—
इस घर में कुछ तो है। और उसने नाम दे दिया… भूत।
पर सच इससे कहीं ज़्यादा अलग था।
(पंडित जी आसन पर बैठते हैं। मंत्र शुरू होते हैं।)
पंडित जी बोले -
“ॐ शांति शांति शांति…”
(हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित होती है।)
(हवन कुंड के ठीक पास सुनीति और कौशिक हाथ जोड़कर बैठे हैं। पूरी श्रद्धा से।)
सुनीति (मन में) बोली -
“भगवान…हम भूत नहीं हैं… बस अधूरे इंसान हैं।”
कौशिक बोला -
“अगर कोई दोष है…तो बस विज्ञान का।”
(आरव और आरुषि धीरे-धीरे उन दोनों के पास आकर बैठ जाते हैं।)
आरव बोला -
“अंकल…ये आग गर्म नहीं है क्या?”
कौशिक (मुस्कुराकर) बोला -
“नहीं…ये डराने के लिए नहीं, शुद्ध करने के लिए होती है।”
(पंडित जी ऊँचे स्वर में मंत्र बोलते हैं।)
पंडित जी बोले -
“ॐ नमः शिवाय…”
(आरुषि अटक जाती है।)
आरुषि बोली -
“मम्मी…मुझे मंत्र याद नहीं आ रहा।”
(सुनीति तुरंत झुककर उसके कान में धीरे से कहती है।)
सुनीति (धीमे) बोली -
“ॐ नमः शिवाय…”
आरुषि (खुश होकर दोहराती हुई) बोली -
“ॐ नमः शिवाय…”
(राधिका और उसके पति मिस्टर राणा एक-दूसरे को देखते हैं।)
(बच्चे ऐसे देख रहे हैं जैसे किसी के साथ बैठे हों… पर वहाँ कोई नहीं।)
राधिका (फुसफुसाकर) बोली -
“ये किससे बातें कर रहे हैं?”
(पंडित जी भी रुककर देखते हैं।)
पंडित जी बोले -
“ये बच्चे मंत्र सही कैसे बोल रहे हैं?”
(आरुषि हँसती है।)
मिस्टर राणा (कड़क आवाज़ में) बोले -
“आरुषि! तुम किससे बात कर रही हो?”
(सारा आंगन शांत हो जाता है। मंत्र रुक जाते हैं।)
आरुषि (बिल्कुल सामान्य स्वर में) बोली -
“अरे पापा…सुनीति आंटी और कौशिक अंकल से।”
(सबके चेहरे उड़ जाते हैं।)
मिस्टर राणा बोला -
“क… कौन?”
आरुषि बोली -
“वही जो यहीं बैठे हैं। ये मुझे मंत्र बता रहे हैं।”
(राधिका के हाथ से पूजा की थाली हल्की-सी काँप जाती है।)
राधिका बोली -
“आरुषि…यहाँ तो…कोई नहीं है।”
आरुषि (चश्मे की तरफ इशारा करके) बोली -
“मम्मी…आपको चश्मा नहीं लगा है ना।”
(पंडित जी के चेहरे पर डर नहीं हैरानी है।)
पंडित जी (धीरे से) बोले -
“ये कोई प्रेत नहीं है…ये तो…अलग ही मामला लगता है।”
(सुनीति और कौशिक एक-दूसरे को देखते हैं।)
सुनीति (धीमे) बोली -
“कौशिक जी…अब सच छुपेगा नहीं।”
कौशिक बोला -
“हाँ…अब या तो सब खत्म होगा… या सब शुरू।”
जिस पूजा को डर भगाने के लिए बुलाया गया था…उसी पूजा ने
सच को सामने ला दिया।
अब सवाल ये नहीं था कि घर में भूत है या नहीं…
अब सवाल था—
क्या राधिका और उसके पति
इस सच्चाई को स्वीकार कर पाएँगे?