Bis Minit - So Mil - Ek Shart - 7 in Hindi Drama by Varun Vilom books and stories PDF | बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 7: सीमाएँ

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बीस मिनट - सौ मील - एक शर्त - अध्याय 7: सीमाएँ

अहमदाबाद

प्रतुल मोतवाणी के शहर वाले घर के बाहर गहमागहमी थी।

महँगी गाड़ियाँ एक के बाद एक आ रही थीं—

लो-स्लंग सुपरकार्स, रेस-ट्यून सेडान्स, ट्रैक-डे स्पेशल्स।

ड्राइववे पर सिक्योरिटी वाले व्यस्त थे—

हाथों के इशारे, वॉकी-टॉकी, पार्किंग स्लॉट।

दस बजे एक बड़ी मीटिंग होनी थी।

उसी आवाजाही में, एक ऑटो आकर रुका।

नील उतरा।

हाथ में एक मुड़ी हुई पर्ची—जिस पर पता लिखा था।

दाढ़ी शेव की हुई थी, पर हल्की-सी फिर उग आई थी।

किराये की शर्ट—मैली नहीं, बस थकी हुई।

कंधे पर वही पुराना झोला।

वह बड़े फाटक की ओर बढ़ा।

सिक्योरिटी गार्ड ने हाथ उठा दिया।

“रुको।”

“मैं रेसर हूँ,” नील ने कहा।

आवाज़ शांत थी।

गार्ड ने उसे ऊपर-नीचे देखा।

फिर हँसी दबाई।

दूसरा गार्ड पास आ गया।

“रेसर?”

तीसरा बोला,

“भाई, आज फैंसी ड्रेस शो नहीं है।”

तीनों हँस पड़े।

नील ने फिर कहा,

“मीटिंग में बुलाया गया है।”

गार्ड ने फाटक के भीतर झाँका।

“लिस्ट में नाम?”

नील एक पल चुप रहा, फिर बोला—

“नील वरदराजन। चेक कीजिए। मैंने फोन किया था।”

तभी एक महँगी रेसकार तेज़ी से पास से निकली।

तीन में से दो गार्ड उसके पीछे भागे—

“रुको, रुको!”

विंडो के पीछे बैठे गार्ड ने नील को घूरा।

“अरे भाई, आप जाइए यहाँ से। आज बहुत काम है।”

नील हटा—

पर गया नहीं।

फाटक से कुछ दूर,

मील के पत्थर के पास जाकर बैठ गया।

हाथ में वही पर्ची—कसकर।

अंदर माहौल अलग था।

लॉन के किनारे छोटी-सी हाई टी।

कॉफ़ी, चाय और रेड वाइन।

सैंडविच और हल्के स्नैक्स।

रेसर्स हल्की बातचीत में थे—

पुरानी रेसों के किस्से,

ट्रैक की दुश्मनियाँ,

लास्ट-मिनट फिनिश,

और कारों की टेक्निकल बातें।

थोड़ी देर बाद सबको

एक छोटे से प्राइवेट सिनेमा हॉल में ले जाया गया।

लाइट्स डिम हुईं।

स्क्रीन ऑन।

फ़िल्म चली।

वॉइस-ओवर साफ़, ठंडा—

“आज से दो महीने बाद—

तीन फ़रवरी।

शाम छह बजे।

अहमदाबाद से वडोदरा।”

मैप उभरा।

सीधी लाइन।

102 किलोमीटर।

“टारगेट टाइम: 20 मिनट।”

हॉल में हलचल।

“अगले दो महीनों में चुनिंदा रेसें होंगी।

अंत में—

सिर्फ़ एक ड्राइवर चुना जाएगा

तीन फ़रवरी के लिए।”

स्क्रीन काली हुई।

फिर आख़िरी लाइन चमकी—

“तीन फ़रवरी, छह बजे।

बीस मिनट से एक सेकंड भी ऊपर—शून्य।

एक सेकंड भी कम—पूरे पाँच करोड़।”

फ़िल्म खत्म।

बत्तियाँ जलीं।

हॉल में खुसर-फुसर फैल गई—

“बीस मिनट?”

“हाइवे पर?”

“ट्रैफ़िक?”

“कानून?”

प्रतुल भीतर आया।

मुस्कराया।

एक-एक करके रेसर्स से हाथ मिलाया।

एंकल मॉनिटर छिपाने की भरसक कोशिश थी—

पर दिख ही जाता था।

लोग उठने लगे।

कुछ ने सिर हिलाया—असंभव।

कुछ चुप रहे।

धीरे-धीरे हॉल खाली हो गया।

प्रतुल पीछे रुक गया।

साथ में रामनिक भाई थे।

प्रतुल के पेट में अजीब-सी गुदगुदी—डर।

“अगर उस दिन मैं टाइम पर नहीं पहुँचा,”

उसने धीमे कहा,

“तो… मेरी ज़िंदगी ख़त्म है।”

रामनिक भाई ने कंधा थपथपाया।

“धीरज रखो प्रतुल भाई,

तमे ईनाम राख्यो छे—

कोई न कोई मिलेगा।”

दो घंटे बाद—

प्रतुल गाउन पहने व्हिस्की पी रहा था।

पास में चारकोल वाला हल्का अलाव—

नीली-बैंगनी लपटें।

खुले दरवाज़े से

बारिश की ठंडी हवा।

दूर बड़ी स्क्रीन पर

CCTV की लाइव फीड—

हवेली के हर कोने की।

छाते और रेनकोट पहने

सिक्योरिटी गार्ड्स की चहलकदमी।

पास पड़ा फोन।

जिगरा के मैसेज।

वह पढ़ चुका था—

फिर भी हर रात पढ़ता था।

“प्रतुल,

तीन फ़रवरी को शादी फ़िक्स हो गई है।

लड़का कैलिफ़ोर्निया का बड़ा बिज़नेसमैन है।

बैंक्वेट हॉल—चेरिश ग्रैंड, वडोदरा।

सात बजे तक तुम नहीं आए तो…”

प्रतुल ने फ़ोन उठाकर एक ओर पटक दिया।

नींद की गोली हाथ में ली—

तभी CCTV स्क्रीन पर हलचल हुई।

मेन फाटक के बाहर,

मील के पत्थर के पास—

एक आकृति हिली।

प्रतुल ने वॉकी-टॉकी उठाई।

“परेश, मोहित—कौन है वहाँ?”

स्टैटिक।

फिर आवाज़—

“साहब, कोई सुबह से बैठा है।

खुद को रेसर बोलता है।

शक्ल से चोर सा लगता है।

आप बोलें तो थाने खबर करें?”

प्रतुल एक पल रुका।

“नहीं,” उसने कहा।

“चेक करके अंदर लाओ।

लॉन में बैठाओ।

मैं आता हूँ।”

लॉन में नील बैठा था।

दोनों हाथों से कॉफ़ी का कप थामे हुए—उँगलियाँ ठंड से अकड़ी हुई।

कपड़े अब भी भीगे थे।

बालों से पानी टपक रहा था।

कंधों पर भारी कम्बल डाला गया था, फिर भी वह काँप रहा था।

पास ही प्रतुल मोतवाणी बैठा था।

हाथ में बड़ा सिगार।

दूसरे हाथ में व्हिस्की का ग्लास।

धुआँ ऊपर उठता—फिर बारिश में घुल जाता।

“I can’t believe this,”

प्रतुल ने कश लिया।

“वो लड़का, जो इंडिया ही नहीं—शायद एशिया पैसिफ़िक का टॉप रेसर था…

जिसकी वजह से मैंने ज़िंदगी में पहली बार एक करोड़ रुपये गँवाए थे—

आज मेरे सामने ऐसे बैठा है।”

उसने नील को देखा।

“What happened?”

नील ने कॉफ़ी का कप धीरे से नीचे रखा।

“लंबी कहानी है, मोतवाणी साहब,”

उसने कहा।

“बस यूँ समझ लीजिए—अपनों ने ही…” वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

प्रतुल उसकी आँखों में ठहरे दर्द को पढ़ गया।

टॉपिक बदल दिया।

“ओके,” उसने कहा।

“बताओ नील—

सौ किलोमीटर।

बीस मिनट।

मुझे बताया जा रहा है कि ये असंभव है।”

नील ने बिना सोचे कहा—

“कार ही क्यों?

हेलीकॉप्टर से क्यों नहीं?”

प्रतुल हँसा।

“फ़्लाइट रिस्क बता दिया गया है मुझे।”

एक सिप लिया।

“और हाँ—रेसकार भी नहीं।

नॉर्मल गाड़ी होगी।”

नील की नज़र अनायास नीचे गई—

प्रतुल के टखने पर लगे एंकल मॉनिटर पर।

हल्की लाल लाइट बीच-बीच में चमक जाती थी।

नील पीछे टिक गया।

अब उसका दिमाग़ दौड़ रहा था।

वही पुराना ज़ोन।

रेस।

स्पीड।

लाइन।

धर्म।

पैशन।

सब कुछ।

“हमें दो सौ मील प्रति घंटा से जाना होगा,”

उसने कहा।

“दुनिया में सिर्फ़ तीन ऐसी गाड़ियाँ हैं

जो इंडिया की सड़कों पर ये कर सकती हैं।

एक बहुत जल्दी ईंधन खत्म कर देगी।

दूसरी स्टेबल नहीं रह पाएगी।”

एक पल रुका।

“सिर्फ़ एक ही बचती है—

वोल्ट्रोन-मैक्स 45 जीटी।”

प्रतुल की भौंह उठी।

“अगर ये मिल जाए,”

नील की आवाज़ अब सपाट थी,

“तो बीस नहीं—अठारह मिनट, और चालीस सेकंड में पूरा हाईवे पार करा दूँगा।”

प्रतुल के चेहरे पर—उस दिन पहली बार—मुस्कान आई।

वह नील की आँखों में देखता रहा।

मानो कुछ ढूँढ रहा हो—

डर।

झूठ।

घमंड।

या थकान।

उसे दिखी सिर्फ़ एक चीज़—ठंडी आग।

वह उठ खड़ा हुआ।

“टेक्नीकल बातें थ्योरी में अच्छी लगती हैं, नील,” उसने कहा।

“गाड़ी का इंतज़ाम हो जाएगा। पर सवाल ये है—तुम्हारा शरीर? तुम इसे चला भी पाओगे या नहीं?”

नील भी उठ खड़ा हुआ।

“पंद्रह दिन बाद रेस रखी है न आपने?”

उसने शांत स्वर में कहा।

“वहीं देख लीजिएगा।”

बारिश तेज़ हो गई।

लॉन की बत्तियाँ काँप उठीं।

और बहुत समय बाद—नील वरदराजन के चेहरे पर चुनौती थी।