बारिश की वो शामदिल्ली की गर्मियों में बारिश का मौसम आते ही शहर एक अलग ही रंग में रंग जाता है। सड़कें चमकने लगती हैं, हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू फैल जाती है, और लोग छाते थामे भागते फिरते हैं। रिया भी वैसी ही एक शाम थी। कॉलेज की लाइब्रेरी से निकलकर वह बस स्टॉप की ओर दौड़ रही थी। उसके बाल भीग चुके थे, बैग पर पानी की बूंदें टपक रही थीं। "अरे यार, बस चली गई!" वह बुदबुदाई।तभी एक स्कूटी सड़क किनारे रुकी। स्कूटर पर बैठा लड़का हेलमेट उतारकर मुस्कुराया। "बारिश में भीग रही हो? लिफ्ट चाहिए?" उसकी आवाज गहरी और आत्मविश्वास भरी थी। रिया ने झिझकते हुए देखा। लड़का साधारण जींस-टीशर्ट में था, लेकिन उसकी आंखों में एक चमक थी जो उसे अलग बनाती थी। "नहीं, थैंक यू। मैं खुद चली लूंगी।" रिया ने सिर झुका लिया।लड़के ने हंसते हुए कहा, "अरे, मैं विक्रम हूं। पास ही रहता हूं। बस स्टॉप दूर है, और बारिश तेज हो रही है। चलो ना।" रिया को लगा कि इनकार करना ठीक नहीं। वह स्कूटी के पीछे बैठ गई। रास्ते भर विक्रम ने बारिश के गाने गुनगुनाए। रिया की हंसी छूट पड़ी। बस स्टॉप पर उतरते हुए उसने कहा, "थैंक्स विक्रम। कल कॉलेज में मिलेंगे शायद।"अगले दिन कॉलेज कैंटीन में रिया की सहेली ने पूछा, "कल शाम कौन था वो?" रिया ने शरमाते हुए बताया। सहेली ने चिढ़ाया, "वाह, नया हीरो मिल गया!" लेकिन रिया के दिल में कुछ हलचल हो रही थी। विक्रम आर्किटेक्चर का स्टूडेंट था, रिया कॉमर्स की। दोनों के दोस्तों का ग्रुप मिलने लगा। चाय की दुकानों पर गपशप, लाइब्रेरी में स्टडी, और शाम को पार्क में वॉक। विक्रम की बातें रिया को भातीं। वह जिंदादिल था, सपनों का पिटारा। "मैं एक दिन दिल्ली के सबसे ऊंचे बिल्डिंग का आर्किटेक्ट बनूंगा," वह कहता। रिया मुस्कुराती, "और मैं अपना बिजनेस शुरू करूंगी।"एक दिन पार्क में विक्रम ने रिया का हाथ थामा। "रिया, तुम्हें पता है, पहली बार तुम्हें देखा तो लगा जैसे बारिश रुक गई हो।" रिया का चेहरा लाल हो गया। "विक्रम, ये सब इतना जल्दी?" लेकिन उसके दिल ने हां कह दिया। उसी शाम उन्होंने पहला किस लिया, बारिश की बूंदों के बीच। प्यार की शुरुआत हो चुकी थी।दिन बीतते गए। विक्रम रिया को सरप्राइज देता। कभी हॉस्टल के बाहर गुलाब का फूल, कभी नोट्स में लिखा लव लेटर। रिया भी जवाब में उसके लिए होममेड चॉकलेट बनाती। लेकिन जिंदगी हमेशा आसान नहीं होती। विक्रम के पिता एक स्ट्रिक्ट सरकारी कर्मचारी थे। उन्होंने सुना तो गुस्सा हो गए। "हमारा बेटा इंजीनियर बनेगा, आर्किटेक्चर नहीं। और लड़की? कॉमर्स वाली? कभी नहीं!"रिया के घर में भी हालात खराब थे। उसके पिता छोटे बिजनेसマン थे, जो बेटी की शादी किसी अमीर घर में करना चाहते थे। "प्यार-व्यार सब बकवास है। पहले नौकरी, फिर शादी।" रिया रोई, लेकिन विक्रम से बोला, "हम लड़ेंगे।"फिर आया वो तूफान। विक्रम के पिता ने उसे घर से निकाल दिया। "जाओ, अपनी मर्जी से जियो।" विक्रम रिया के पास आया, आंखें नम। "रिया, मैं फेल हो जाऊंगा। क्या करूं?" रिया ने उसे गले लगाया। "हम साथ हैं ना। मैं तुम्हें पढ़ाऊंगी। तुम्हारा सपना पूरा होगा।"विक्रम ने पार्ट-टाइम जॉब शुरू की। एक आर्किटेक्चर फर्म में असिस्टेंट। रिया कॉलेज के बाद ट्यूशन पढ़ाने लगी। दोनों मिलते कम, लेकिन फोन पर घंटों बातें। "रिया, एक दिन मैं तुम्हें अपना घर बनाकर दिखाऊंगा," विक्रम कहता। रिया हंसती, "बस तुम रहो, घर बन जाएगा।"लेकिन किस्मत ने फिर चाल चली। रिया के पिता को पता चल गया। उन्होंने रिया को घर बंद कर दिया। "शादी तय हो गई है। लड़का आईटी कंपनी में है, अच्छी सैलरी।" रिया बागी हो गई। "पापा, मैं विक्रम से प्यार करती हूं।" झगड़ा हुआ। रिया भाग आई विक्रम के पास।विक्रम के छोटे से रूम में दोनों रुके। "अब क्या?" रिया बोली। विक्रम ने कहा, "शादी कर लें। कोर्ट मैरिज।" लेकिन पैसे कहां? दोनों ने फैसला किया, पहले मेहनत करें। विक्रम ने एग्जाम दिए, टॉप किया। जॉब लग गई। रिया ने भी अपना बिजनेस आइडिया शेयर किया – ऑनलाइन बुटीक।बारिश का वो मौसम फिर आया। एक साल हो चुका था। विक्रम ने रिया को सरप्राइज दिया। कनॉट प्लेस के पास एक छोटा सा फ्लैट किराए पर लिया। "ये हमारा पहला घर।" रिया की आंखें भर आईं। शाम को दोनों छत पर बैठे। बारिश हो रही थी। विक्रम घुटनों पर बैठा, "रिया, मुझसे शादी करोगी?"रिया ने हंसते हुए हां कहा। लेकिन परिवार? विक्रम के पिता ने फोन किया। "बेटा, गलती हुई। तुम्हारी मेहनत देखी। आ जाओ।" रिया के पिता भी पिघल गए। "बेटी खुश रहे, बस।"शादी हुई। छोटी सी, लेकिन प्यार भरी। दिल्ली की बारिश में दोनों ने वादा किया – हमेशा साथ। आज भी जब बारिश होती है, रिया विक्रम से कहती, "याद है वो पहली शाम?" विक्रम मुस्कुराता, "हां, तब से हमारी जिंदगी बारिश की तरह रोमांचक है।"(कहानी का विस्तार नीचे जारी...)प्यार की परीक्षाशादी के बाद जिंदगी आसान नहीं थी। विक्रम की जॉब दिल्ली के बाहर, नोएडा में थी। रिया का बुटीक घर से चल रहा था। सुबह जल्दी उठना, ट्रैफिक में फंसना, शाम को थककर लौटना। लेकिन प्यार ने सब सह लिया। रिया रात को विक्रम के लिए खाना बनाती। विक्रम वीकेंड पर सरप्राइज देता – लाल किले घुमाना, हौज खास में पिकनिक।एक दिन रिया को पता चला, वह प्रेग्नेंट है। खुशी की लहर दौड़ी। लेकिन विक्रम को प्रमोशन मिला, जिसके लिए ट्रांसफर मुंबई। "रिया, जाना पड़ेगा। एक साल के लिए।" रिया रो पड़ी। "बच्चा होगा ना। अकेले कैसे?" विक्रम ने गले लगाया। "ट्रस्ट मी। मैं हर वीकेंड आऊंगा।"मुंबई चला गया विक्रम। फोन पर बातें, वीडियो कॉल। रिया का पेट बढ़ने लगा। एक रात तेज दर्द हुआ। हॉस्पिटल ले जाना पड़ा। विक्रम को फोन किया। वह ट्रेन पकड़कर सुबह पहुंचा। बेटा पैदा हुआ। "अर्जुन," नाम रखा। विक्रम ने कहा, "ये हमारा नया सपना।"वापस दिल्ली लौटे। विक्रम ने अपना आर्किटेक्चर फर्म शुरू किया। रिया का बुटीक चमकने लगा। लेकिन चुनौतियां खत्म कहां? विक्रम के पुराने दोस्त ने बिजनेस में धोखा दिया। पैसा डूब गया। "क्या करें?" विक्रम उदास। रिया ने कहा, "फिर से शुरू करेंगे। जैसे पहले किया।"बारिश का मौसम आया। परिवार के साथ छत पर। अर्जुन बारिश में नाच रहा। विक्रम ने रिया को देखा। "तुम्हारे बिना ये सब असंभव था।" रिया मुस्कुराई। "प्यार सब जीत लेता है।"अंतिम मोड़कुछ साल बाद विक्रम को बड़ा प्रोजेक्ट मिला – दिल्ली में नई हाई-राइज बिल्डिंग। उद्घाटन में रिया खड़ी थी। "ये तुम्हारा सपना था।" विक्रम ने कहा। रिया बोली, "हमारा।"आज भी वो पहली शाम याद आती। बारिश ने उन्हें मिलाया था, और बारिश ही उनकी जिंदगी को सींचती रही। प्यार की कहानी कभी खत्म नहीं होती, बस नए रंग भरती जाती है।