जिसे मृत मान लिया गया. वह जीवित था”रात का समय था.
हिमालय की ऊँचाइयों पर बहती ठंडी हवा में एक विचित्र- सी गंध घुली हुई थी—धूप, राख और किसी अनजानी शक्ति की महक. दूर कहीं तंत्र- मंत्र की धीमी- सी आवाजें गूँज रही थीं
. सामने एक विशाल गुफा, जिसकी दीवारों पर लाल धागों और अज्ञात चिह्नों की लिखावट थी.
अश्वत्थामा कई वर्षों से इसी स्थान पर आता- जाता था. लेकिन आज कुछ अलग था. गुफा में बैठे नागा- साधुओं के सामने एक नया व्यक्ति खडा था—लंबे बाल, झुर्रियों से भरा चेहरा, शरीर पर सफेद चादर. और आँखों में जिद, जुनून, और अनकहा दर्द.वह था
भारत का महान वैज्ञानिक, योगेश्वर अग्निवंश.जिसे दुनिया पंद्रह साल पहले“ मर चुका” मान चुकी थी.अतीत का सच उस रात क्या हुआ था
किसी को कुछ नहीं पता था.पंद्रह साल पहले, जिस रात योगेश्वर रहस्यमय तरीके से“ गायब” हो गया था, वह वास्तव में गायब नहीं हुआ था.उस रात उसकी लेब में एक बहुत बडी खोज सामने आई थी
.उसने सैकडों साल पुराने ग्रंथों, DNA सैंपल्स, और एक अजीब- सी ऊर्जा तरंग को जोडकर कुछ ऐसा पाया था. जो इंसानी इतिहास को बदल सकती थी.अश्वत्थामा की अमरता का वैज्ञानिक रहस्य थाजैसे ही वह उस रहस्य को सुरक्षित करने निकल रहा था,
अचानक उसकी गाडी को एक काले SUV ने टक्कर मार दी. यह“ साधारण एक्सीडेंट” नहीं था यह हत्या की साजिश थी हमलावर उसे खत्म करना चाहते थे.लेकिन योगेश्वर बच गया. घायल, लहूलुहान. पर जिंदा.वह किसी तरह घसीटते हुए जंगल की तरफ भागा.और उसी जंगल में उसके जीवन ने करवट लीक्योंकि उसे बचाया था नागा साधुओं ने. लेकिन लोगों की नजरों में वो मर चुका था
.और वहीँ उसने पहली बार अश्वत्थामा को साक्षात देखा.अश्वत्थामागुफा के भीतर भारी वातावरण था.अश्वत्थामा की उपस्थिति में हवा ठंडी होने लगती थी.
उसकी आँखों में हजारों साल का दर्द, क्रोध और इंतजार था.योगेश्वर धीरे से बोला,मैं आपको खोज रहा था. और इसीलिए लगभग मर भी गया।अश्वत्थामा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखामरना. तुम्हारी किस्मत में नहीं था.
और तुम्हें खोजने का अधिकार केवल उसी को है, जो सत्य का भार सह सके।
योगेश्वर समझ गया — यह कोई साधारण बात नहीं थी.वह काँपती आवाज में बोला,मैं विज्ञान का आदमी हूँ. पर जितना मैंने पढा है, जितना समझा है. आप एक पहेली नहीं, जीवित इतिहास हैं।
अश्वत्थामा मुस्कुराया—इतिहास नहीं. श्राप. श्राप कहो मित्रऔर उसी श्राप ने तुम्हें यहाँ खींच लाया है।
अघोरी साधुओं की भविष्यवाणीठीक उसी समय नागा साधुओं के प्रमुख ने घोषणा की—समय बदल रहा है.कल्कि का युग आने की छाया दिखाई देने लगी है.
और इस परिवर्तन में एक वैज्ञानिक की भूमिका होगी.जिसकी आत्मा नहीं मरी, पर जिसे दुनिया ने मृत मान लिया।योगेश्वर ने सिर उठाकर पूछा,मेरी भूमिका?नागा प्रमुख ने धीरे से कहा,एक समय आएगा जब तुम्हारा बेटा. तुम्हारी जगह खडा होगा. ये संयोग नहीं तुम्हारा दूसरा जन्म है
ओर तुम्हारे बेटे का भीपरंतु अभी नहीं आया वो समय जब तुम्हारा बेटा भी इसका हिस्सा होगा.तुम्हें तैयार करना होगा आने वाले युद्ध के लिए।योगेश्वर स्तब्ध था.
वह पंद्रह साल से दुनिया से cut चुका था.उसकी पत्नी, उसका बच्चा. कैसे होंगे?क्या वे उसे भूल चुके होंगे?अश्वत्थामा ने उसके कंधे पर हाथ रखा—तुम्हारा बेटा ‘आदित्य’. यानी ओजसउसका भाग्य, मेरे श्राप से जुडा है.वह इस आने वाले युद्ध की चाबी बनेगा।योगेश्वर की सांसें रुक गईं.आदित्य.लेकिन वह तो अभी बच्चा है
अश्वत्थामा ने कहा,यही कारण है कि उसे अभी दूर रखना होगा.वह मुक्तिदाता होगा वो मेरा पर समय आने पर
दूसरी तरफ आदित्य की साधारण जिंदगीदूर शहर में.इस सब से अनजान आदित्य अपने दोस्तों के साथ Collage लाइफ, हंसी- मजाक और अपने सपनों में खोया रहता था.कभी- कभी अचानक रात में उसके मन में अजीब- सी बेचैनी होती.जैसे कोई उसे दूर से पुकार रहा हो.जैसे किसी की याद.जिसे वह जानता नहीं, पर महसूस करता है.वह अक्सर कहता,यार. पापा को याद नहीं करता.पर पता नहीं क्यों ऐसा लगता है
जैसे वो कहीं आसपास ही हैं।दोस्त मजाक उडा देते.भाई, इमोशनल ना हो. चल चाय पीते हैं।आदित्य फिर भूल जाता.पर उसके अंदर कहीं एक दरार धीरे- धीरे खुल रही थी.जिसे वह समझ नहीं पा रहा था.
फिर वर्तमानगुफा में एक तंत्र अनुष्ठाननागा साधु एक बडा यज्ञ शुरू करते हैं.गुफा में धुआँ भर जाता है.अश्वत्थामा और योगेश्वर दोनों उसके सामने बैठ जाते हैं.
अश्वत्थामा बोलता है—योगेश्वर, तुम्हारे शोध ने आधी सच्चाई उजागर की थी.अब बाकी आधी तुम्हें इस अनुष्ठान में मिलेगी।
अचानक पूरे स्थान पर कंपन होने लगता है.दीवारें थरथराती हैं.
धरती जैसे फटने लगी हो.धुएँ में एक अजनबी आकृति उभरती है।
लाल आँखें, अग्नि जैसा तेज चेहरा.वह एक रिषि की आकृति थी रिषि परशुराम का प्रक्षेपण.उसने कहा—अश्वत्थामा.तेरी मुक्ति का समय तभी आएगाजब विज्ञान, अध्यात्म और कर्म का मिलन होगा.और यह मिलन तेरे नहीं.योगेश्वर के पुत्र के हाथों होगा।
योगेश्वर का शरीर कांपने लगा.उसके दिमाग में आदित्य की छवि घूमने लगी—मेरा बेटा. किस भाग्य में फँस गया है?
अश्वत्थामा ने उत्तर दिया—भाग्य नहीं.कर्तव्य। कर्तव्य कहो मित्र उसका जन्म इसी उद्देश से हुआ है.हिमालय की उस गुफा में अनुष्ठान खत्म हुआ ही था कि अचानक जमीन फिर से काँप उठी.इस बार यह कोई आध्यात्मिक कंपन नहीं था.
बल्कि किसी विशाल यांत्रिक शक्ति की तरंग थी.अश्वत्थामा तुरंत सतर्क हो गया.योगेश्वर ने चौंककर पूछा—ये क्या है? कोई भूकंप?अश्वत्थामा ने उत्तर नहीं दिया. उसकी आँखें सिकुड गईंयह प्रकृति का कंपन नहीं.किसी कालयंत्र की हलचल है।
योगेश्वर के शरीर में सिहरन दौड गई.कालयंत्र. यानी टाइम डिस्टर्बेंस?
अश्वत्थामा ने धीमी, पर गूंजती आवाज में कहा—हाँ.युगों के संतुलन को जो शक्ति हिलाती है.
उसे कालयंत्र कहते हैं।
हजारों साल बाद पहली बार. संकेत मिला था.अश्वत्थामा ने मठ की दीवार पर बना एक प्राचीन- तम यंत्र छुआ.दीवार चमकी.और उस पर प्रकाश रेखाओं में एक चिन्ह उभरा—नीलचक्र भंग”यानी समय का पहिया घायल हो चुका है.
योगेश्वर हतप्रभ था.वह एक वैज्ञानिक था, लेकिन उसके सामने जो दिख रहा था वह विज्ञान की सीमाओं से बाहर था.इसका मतलब क्या है?
अश्वत्थामा:जब- जब कालयंत्र हिलता है,किसी बडे युद्ध. किसी बडी आपदा की आहट होती है।
योगेश्वर:तो भविष्य बदल रहा है?अश्वत्थामा:नहीं.किसी ने भविष्य को बदलने की कोशिश शुरू कर दी है. ये केवल दैत्य शुक्राचार्य ही कर सकता है
ओर किसी के बस में नहीं है. कोई तो है जो दैत्य शुक्राचार्य का आह्वान कर रहा है.
उधर, आदित्य के पास पहला संकेत पहुंच चुका थाशहर में आदित्य अपने दोस्तों के साथ एक स्थानीय मेले में था.
रौशनी, भीड और हंसी— लेकिन आदित्य के कान अचानक बंद हो गए.जैसे कोई जोरदार आवाज उसके दिमाग में गूँज रही हो.समय टूटा है. समय टूटा है.
आदित्य लडखडा कर रुक गया.दोस्त घबरा गए.भाई क्या हुआ?
चक्कर आ रहे हैं?आदित्य ने सिर पकडा—न. नहीं पता. जैसे किसी ने मेरे कान में चिल्लाया हो.पर अगले ही पल आवाज गायब हो गई.उसने खुद को संभाल लिया—शायद थक गया हूँ।
दोस्त हँसकर बोले—चल पाव भाजी खाते हैं, सब ठीक हो जाएगा।
आदित्य भी हँस दिया.लेकिन भीतर कुछ जाग चुका था,जिसे वह समझ नहीं पा रहा था.
(उसे नहीं पता था—यह वही संकेत था जो कालयंत्र के जागने पर“ योग्य व्यक्ति” को प्राप्त होते हैं। )
फिर हिमालय की गुफा में — काला दरवाजा खुलता हैअश्वत्थामा ने योगेश्वर को गुफा के एक और हिस्से में ले जाया.वहाँ एक प्राचीन लौहद्वार था,
जिस पर अग्नि- रक्षित मंत्र लिखे थे.योगेश्वर:यह क्या है?अश्वत्थामा:यह कालदर्पण है.इसमें हम समय की दरारें देख सकते हैं।
द्वार खुद- ब- खुद खुला.अंदर एक गोलाकार दर्पण था, जिसकी सतह पानी जैसी थी. लेकिन उसमें परछाइयाँ तेजी से घूम रही थीं
.अश्वत्थामा बोला—देखो, क्या दिखता है।
योगेश्वर आगे बढा.दर्पण में पहला दृश्य उभरा—एक विशाल शहर, जहाँ आसमान लाल था, इमारतें ढह रही थीं, और हवा में राख उड रही थी.दूसरा दृश्य—समुंदर का स्तर असामान्य रूप से ऊपर उठ चुका था.
शहर पानी में डूबते जा रहे थे.तीसरा दृश्य मेंएक अंधकारमय योद्धा सेना लेकर खडा था
.उसके माथे पर काली त्रिशूल का निशान.
योगेश्वर भय से पीछे हट गया—ये क्या है?
भविष्य?
अश्वत्थामा बोला—यह सुनिश्चित भविष्य नहीं.यह वह भविष्य है जिसे कोई बदलने की कोशिश कर रहा है।कौन?एक भारी आवाज दर्पण के भीतर गूँजी—असुर वंश जाग चुका है.
जैसा कि मैने पहले कहा था दैत्य शुक्राचार्य
योगेश्वर सदमे में:असुर वंश? दैत्य गुरु शुक्राचार्य आज के समय में
अश्वत्थामा:
हाँ. जब मै हो सकता हु तो वो क्यों नहीं हजारों साल से वे छिपे हुए थे.
अब उनका लक्ष्य है —कल्कि अवतार के आने से पहले धरती को अराजकता में डुबो देना।
हर तरफ दैत्य ताकते पाप विनाश हर तरफ बुराई
योगेश्वर:तो यह आने वाला युद्ध. सिर्फ पौराणिक नहीं. वास्तविक है?
अश्वत्थामा:हाँ.और इस बार विज्ञान भी उनके खिलाफ खडा होना होगा।
असुरों को कौन जगा रहा है?
दर्पण में अचानक एक चेहरा दिखाई दिया—किसी गुप्त आधुनिक प्रयोगशाला का.वहाँ उपकरण चमक रहे थे, कंप्यूटरों की आवाज गूंज रही थी.और वहाँ.एक व्यक्ति प्रयोगशाला में किसी अंधेरे पत्थर पर काम कर रहा था.
योगेश्वर की आँखें फैल गईं—ये कौन है?
अश्वत्थामा की आवाज भारी थी—यह वही है. दैत्य गुरु शुक्राचार्य का आह्वान करने वाला बुराई का राजा जिसने तुम्हारी हत्या की साजिश रची थी यही नहीं ओर भी इसके साथ है
जो तुम्हारे करीबी रह चुके है.वह व्यक्ति भारत का नहीं.सीधे असुर वंश का दूत है।
फिर दर्पण में वह व्यक्ति मुडकर कैमरे की तरफ देखते हुए कहता है
अगला चरण शुरू करो.कालयंत्र को पूरी तरह सक्रिय करना है।
अश्वत्थामा ने गहरी सांस ली—योगेश्वर.अब यह युद्ध सिर्फ मेरा नहीं. तुम्हारा भी है.और आने वाले समय में. तुम्हारे बेटे का।
योगेश्वर धीमी आवाज में बोला—आदित्य.कहीं वह खतरे में तो नहीं?
अश्वत्थामा:अभी नहीं. वो ठीक है बस कुछ छोटी छोटी घटनाएं हो रही है लेकिन वो ठीक है.पर जिस दिन असुर वंश को पता चलेगा कि दर्पण ने किसे चुना है.वह उनकी पहली निशाना बनेगा।
योगेश्वर के पैरों तले जमीन खिसक गई. लेकिन उसी पल वो शांत हुआ ओर बोला
मुझे वो सब जानना है जो महाभारत के युद्ध में हुआ उससे पहले हुआ क्योंकि हमने तो वहीं पढा है जो गीता ओर वेदों में लिखा है.लेकिन मेरी किस्मत है कि मै उसके सामने हु जिसका जिक्र केवल इस दुनिया के लोगों के लिए एक कल्पनी योद्धा था
क्या आप मुझे वो सब बता सकते है क्योंकि मुझे आपके मुख से वो सारी बातें सुननी है.
अश्वत्थामा एक पल शांत हुआ ओर एक तरफ कोने में बैठ जाता है. ओर लंबी सांस लेता है ओर फिर बोलता है ।
ठीक है मैं भी लंबे समय से इतंजार कर रहा था कि मै भी अपनी दुःख भरी कहानी किसी को सुनाऊं क्योंकि लिखी हुई चीजें समय के अनुसार बदलती जाती है.मै अवश्य तुम्हे उसका हिस्सा बनाऊंगा उसके लिए तुम्हे आज रात्रि के दूसरे पहर तक इंतजार करना होगा
क्या दैत्य गुरु शुक्राचार्य अश्वत्थामा का पता लगा पाएंगे?
कहानी के सवाल को जानने के लिए बने रहे साथ कॉमेंट जरूर करे इंतजार रहेगा।
writer Bhagwat Singh naruka