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जिन में सभी सवालों के जवाब ठीक ठीक थे उससे वो बहुत खुश हुआ ओर उसको बिलीव भी हो गया उस योगेश्वर पर
फिर कुछ सेकंड बाद—“ लेकिन तुम आओगे. मैं जानता हूँ। क्योंकि मेरे सारे योगों की दवा सिर्फ तुम्हारे घर में है. जिसके तुम जन्म दाता हो आज से तुम मै हु मै ही तुम हु. और स्क्रीन पूर्णतः black हो गई. योगेश्वर ने
कहा—“ यह संवाद. इतिहास का पहला वैज्ञानिक-
पौराणिक संपर्क था। उसी समय उसने समित चौहान को संपर्क किया वो कुछ ही मिनटों बाद उस लेब में पहुंच गया ओर साथ में राठौड भी, जब वो अंदर आए तो योगेश्वर के चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी जिसको देख कर समित चौहान ने अंदाजा लगा लिया कि कामयाबी मिल चुकी है, ।
लेकिन वो उसके मुंह से सुनना चाहता था वो कुछ वाक्य हुआ. धीरे धरे उसने सारी बातें समित चौहान के सामने रखी ओर ओर वो सब कुछ जो उन दोनों के बीच
महाभारत काल के संबंध में सवाल पूछे गए. लेकिन एक बात थी जिसको उसने गुप्त रखा वो थी, जैसा कि उस Ashvdhama ने बोली, तुम उसके जन्म दाता हो वो तुम्हारे घर में समित ने उसकी ओर देखा—“ डॉक्टर साहब. अब क्या करेंगे?
योगेश्वर ने गहरी साँस ली—“ अब. हिमालय जाना
पडेगा।
रथौड चिल्लाया—“ क्या आप पागल हो गए हैं?
वहाँ कौन है, आपको पता है? इंसान है या कोई आतंकी संगठन या कोई अन्य दुश्मन. मै सही बोल रहा sir क्यों इसके चक्कर में समय बर्बाद कर रहे हो जरूर ये किसी देश की साजिश है जो हमारे सिस्टम को क्रैश करना चाहता है.
योगेश्वर ने शांत स्वर में कहा—“ हाँ. वहाँ एक युग
इंतजार कर रहा है।
लेकिन अभी वो बाते तुम्हारे दिमाग के लिए केवल काल्पनिक है.
समित चौहान: बस करो राठौड, (शांत करते हुए )
योगेश्वर हमे जल्दी करनी होगी जैसे हमें इसका इंतजार था कोई ओर भी है जिसको इसकी खबर पहुंच गई होगी,।
अब आगे __________
योगेश्वर अग्निवंश की कार जंगल के बीच एक पुरानी कच्ची सडक पर धीरे- धीरे बढ रही थी. रात गहरी थी,।
झींगुरों की आवाजें हवा में तैर रहीं थीं. उसके हाथ में वही फाइल थी—अश्वत्थामा के अंतिम दर्शन से जुडी तस्वीरें, और वे गुप्त कोड जिन पर वह वर्षों से रिसर्च कर रहा था. ।
उसे पता था कि वह जहाँ जा रहा है, वहाँ से लौटना आसान नहीं होगा. लेकिन यह भी सच था कि वह पूरी मानव सभ्यता के लिए एक क्रांतिकारी खोज की दहलीज पर था. ।
लेकिन वह लौटा नहीं. दूसरे दिन सुबह, न्यूज चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी—“ भारत के शीर्ष वैज्ञानिक योगेश्वर अग्निवंश रहस्यमय ढंग से लापता! कार मिली, वैज्ञानिक नहीं. अफवाह—क्या किसी गुप्त Mission पर थे? ।
परिवार सदमे में. कुछ ही घंटों में एक और झूठी खबर तैरने लगी—“ सूत्रों के हवाले से—योगेश्वर अग्निवंश संभवतः मृत।
किसने यह खबर फैलाई? कैसे? इतने बडे वैज्ञानिक की गुमशुदगी पर सरकारी चुप्पी क्यों? सब कुछ संदिग्ध था. घर पर मातम का माहौल था.।
पत्नी रितु बार- बार दरवाजे की तरफ देखती, जैसे वह भीतर आते ही कहेंगे—“ रितु, मैं आ गया. बस थोडा जरूरी काम था।
पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। पंद्रह साल का उनका बेटा आदित्य अपने कमरे में खामोश बैठा था. उसकी आंखों में सवाल थे—“ पापा कहाँ गए? कोई जवाब नहीं.
एक साजिश की शुरुआतसरकारी अधिकारी घर आए थे,
पर उनके सवाल ही ऐसे थे कि जैसे योगेश्वर किसी भारी राज में उलझे हों. उनके जाने के बाद रितु को लग कुछ तो छुपाया जा रहा है. कुछ बहुत बडा. योगेश्वर की लैब सील कर दी गई. फाइलें, कंप्यूटर, हार्ड ड्राइव, सब अपने कब्जे में ले लिया गया. ।
रितु की आंखों में डर था. क्या सच में उसके पति किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश में फंस गए थे?
गुप्त लेब का रहस्ययोगेश्वर ने कभी किसी को अपनी गुप्त लेब की लोकेशन नहीं बताई थी—न सरकारी स्टाफ को, न अपने ऑफिस को, न मीडिया को. न घरवालों को. सिर्फ अपने बेटे आदित्य को यह कहा था
“ बेटा, बडा होकर अगर कभी महसूस हो कि दुनिया को सच की जरूरत है. तो मेरे नोट्स पढना. मैंने सब रिकॉर्ड कर रखा है. आदित्य ने उस समय हँस कर इसे मजाक समझा था.।
लेकिन अब. हर शब्द जैसे किसी गूढ संकेत जैसा लगने लगा।
पंद्रह साल बाद. समय भागता गया. दुनिया बदल गई. तकनीक तेज हुई. राजनीति बदल गई.।
लेकिन एक चीज नहीं बदली—अग्निवंश परिवार का दर्द. योगेश्वर अग्निवंश की मौत की खबर पंद्रह साल बाद भी बिना किसी सबूत के फाइलों में धूल खाती रही. ।
मीडिया ने शुरुआत में खूब टीआरपी बटोरी, फिर मामला ठंडा कर दिया. सरकार ने“ राष्ट्रीय सुरक्षा” का हवाला देकर केस बंद कर दिया. लेकिन बेटा आदित्य, अब तीस साल का हो चुका था.
इंजीनियर बनने के बाद उसने पिता की दिशा पकड ली थी—वह अब एक साइंटिफिक सिस्टम एनालिस्ट था. ।
और वह अपने पिता पर शोध कर रहा था—उसी तरह जैसे उसके पिता अश्वत्थामा पर शोध करते थे. ।
एक दिन, एक पुराना अलमारी खोलते समय उसे कुछ अजीब महसूस हुआ. अलमारी का पिछला पैनल हल्का अलग- सा लग रहा था. ।
उसने उसे धक्का दिया—टक! एक छिपा हुआ लकडी का पैनल खुल गया. अंदर एक खुफिया बॉक्स था. उस पर उकेरा हुआ था—“ Y. A. – Only for Aditya. आदित्य की सांसें रुक गईं. यह तो पिता की लिखावट थी.।
वीडियो नम्बर एक –“ मैं मरूँगा नहीं” आदित्य ने बॉक्स खोला. अंदर एक छोटा प्रोजेक्टर और सत्रह चिप्स थीं. पहली चिप पर लिखा था—“ Ashvdhamaa Truth – एक” उसने प्ले किया. स्क्रीन पर पिता थे. थके हुए, चिंतित, पर आँखों में वही दृढता।
आदित्य, अगर यह वीडियो तुम्हारे हाथ में आया है. तो इसका मतलब है कि मैं शायद लौट नहीं पाया। ।
आदित्य की आंखें नम हो गईं। बेटा, मुझे अश्वत्थामा मिल गया है. या You कहूँ—मैं उसके करीब हूँ. लेकिन मेरी यह खोज कई शक्तियों को पसंद नहीं आएगी. वे मुझे रोकेंगे. मारने की कोशिश करेंगे. लेकिन. जान लो. मैं मरा नहीं हूँ।
. मैं कहीं कैद हूँ, किसी ऐसे स्थान पर जहाँ विज्ञान और समय दोनों असहाय हो जाते हैं।
वीडियो में अचानक एक तेज आवाज आई—जैसे कोई दरवाजा तोड रहा हो।
आदित्य, ये लोग आ गए—मेरी बात याद रखना—अश्वत्थामा अमर है, और अब. कोई मुझे रोकने—” वीडियो वहीं cut गया. आदित्य स्तब्ध खडा था. उसके हाथ कांप रहे थे. उसकी रगों में खून उबल रहा था।
पापा जिंदा हैं. यही बात अब उसके मस्तिष्क में मथ रही थी. आदित्य ने उस रात एक फैसला किया—“ मैं ढूँढूँगा पापा को. और इस साजिश की जड तक जाऊँगा।
वह पिता की रिसर्च को समझने लगा. हर चिप में ऐसे खुलासे थे जो मानव इतिहास को बदल सकते थे—अश्वत्थामा आज भी भारत में है.
उसके ऊपर कृष्ण का श्राप आज भी सक्रिय है. वह अमर है लेकिन शापित भी. कई गुप्त संगठन उसकी तलाश कर रहे हैं—कई वैज्ञानिक, कई आतंकवादी, कई धार्मिक समूह. और कहीं न कहीं, योगेश्वर अग्निवंश इसी कारण गायब हुआ.
आदित्य के सामने एक नया रास्ता खुल चुका था—जो विज्ञान से शुरू होकर पौराणिक रहस्य में गहराइयों तक जाता था.
अंत में, आदित्य वीडियो की सातवीं चिप चलाता है. वीडियो में उसके पिता बोल रहे ।
आदित्य. मेरी अंतिम लोकेशन देख. मैं यहाँ हूँ।
वीडियो में एक पहाड दिखता है—बर्फ से ढका. बादलों के बीच खोया हुआ. और उसके नीचे लिखा
केदारखंड की सीमा. जहाँ देवता भी बिना अनुमति प्रवेश नहीं करते। आदित्य ने फुसफुसाया
पापा. मैं आ रहा हूँ।
और इसी के साथ शुरू होने वाली थी—एक ऐसी यात्रा. जहाँ विज्ञान और पौराणिक इतिहास आमने- सामने खडे होने वाले थे. दोपहर की हल्की धूप से मोहल्ले की गलियाँ सोई- सोई लग रही थीं. Collage के बाद की छुट्टी में आदित्य अपने यारों के साथ स्थानीय चाय वाली दुकान पर बैठा था — मोबाइल, हंसना- ठहाका, फुटबॉल के अगले वीकेंड की बात. पिता की कहानी, गुप्त वीडियो, केदारखंड — ये सब अभी उसकी जिंदगी के किसी दूर- कोने में एक झिलमिला कर रह गया था, पर उसने उसे अभी झटके में खींचकर सामने नहीं रखा।
यार, चल बाहर मैच पे, रोहित बोला और एक दमदार शॉट की तरह अपनी हँसी छोडी।
हाँ यार, पापा वाला सिलसिला छोड दे,
अमन ने कहा, वो पुरानी बातें हैं.
तू अब बडा हो गया है—नई जॉब, नए लोग।
आदित्य मुस्कराया. दिल में कुछ उठता—एक हल्की सी बेचैनी—पर वह इसे चाय की गर्मी में घुलने दिया. उसने अपने जेब से वह छोटा बॉक्स निकालकर वापस वॉल्ट में रख दिया —“ Y. A. – Only for Aditya” जैसे किसी भविष्य के लिए अलमारी में बंद हुआ
खजाना. S- 91 की धीमी हरकतेंदूसरी तरफ, शहर के ऊपरी इलाकों में S- 91 की शाखा चुपके से काम कर रही थी. समित चौहान की टीम ने पिछले पंद्रह सालों में कई कडियाँ जोड रखीं.।
योगेश्वर के गायब होने से जुडी हर डिटेल पर अब भी उनके दिमाग में खरोच थी. इस बीच वे चुपचाप किसी बडे खिलाडी का इंतजार कर रहे थे ।
— कोई सूचना स्रोत, कोई पुराना साथी, या कोई ऐसी घटना जो पूरे खेल को खोल दे. समित को अंदर ही अंदर लगता था कि योगेश्वर के गायब होने के पीछे सिर्फ असाधारण शक्ति नहीं, बल्कि साजिश है।
— एक ऐसी साजिश जिसमें वैज्ञानिक, राजनैतिक और विदेशी हित एक साथ उलझे थे. पर उनके पास स्पष्ट सबूत नहीं थे, सिर्फ संदिग्ध इशारे और अधूरा भरोसा. इसलिए S- 91 ने ISAR के कुछ पुराने कर्मचारियों पर नजर बनाए रखी — खासकर हेमंत और कुछ तकनीशियनों पर. हेमंत अब भी रातों में नींद नहीं सो पाया करता.
उसने कभी- कभी सोचा था कि अगर उसने उस रात सही सवाल उठाए होते तो क्या होता? वह एक शांत आदमी बनकर काम कर रहा था, ।
पर अंदर कहीं उससे मना कर रही आवाज फिर से हिलने लगी—जो वह सालों से भीतर दबा रहा था. मीडिया का खेलन्यूज चैनल्स में योगेश्वर की मृत्यु की पुरानी कहानी झट से ठंडी पड चुकी थी, ।
पर कुछ अनछुए ब्लॉक्स अब भी बचे थे. एक असंतुष्ट पत्रकार, नंदिनी झा, फॉरेंसिक रिपोर्टों और कागजों में झाँकती रहती. उसने पाया कि सरकारी नोटिस में काफी ‘ब्लैंक्स’ और ‘कन्फिडेंशियल’ स्लिप्स थे — ऐसे शब्द जो अखबार की सच्चाई से कुछ छिपा रहे थे. नंदिनी की दिलचस्पी सिर्फ ट्रेंड पकडने की नहीं थी;
उसे सच पर गरमी थी. वह कभी- कभी ISAR की पुरानी फाइलों के पास से गुजरती — जहाँ तक पहुंच पाती, वहाँ के दस्तावेज उसकी नजरों के सामने दस्तक देते. उसने सुन रखा था कि" किसी ने योगेश्वर को रोकने का आदेश दिया था।
" —पर किसने? यही खोज उसकी नींद उडा रही थी. नंदिनी की रिपोर्टिंग ने समाज में एक हल्की- सी आंच जगा दी—कुछ लोगों ने कहा कि जली हुई पुरानी कहानियाँ फिर से उठेंगी, कुछ ने उसे अफवा कहा. Chronos Lab और विदेशी सायेअंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ आंखें हिली थीं. ।
एक विदेशी रिसर्च कंसोर्टियम, जिसे लोकल लोग केवल Chronos Lab के नाम से जानते थे, ने भी पिछले सालों में अफवाहें फैलायीं कि“ भारत में एक अमर जीव के संकेत मिले हैं” Chronos के एजेंट धीरे- धीरे भारत के अकादमिक नेटवर्क में पाँव पसार रहे थे
— साहित्यिक संगोष्ठियों में, शोध सम्मेलनों में, और कभी- कभार ISAR के सेमिनार में भी. उनकी साजिश सीधी नहीं; वे पहले विज्ञान को अंदर से खोलते—डेटा खाते, सवाल उठाते, और जब अवसर मिलता तो उसे राजनैतिक और आर्थिक मांगों में बदल देते. Chronos का लक्ष्य स्पष्ट था: ।
यदि अश्वत्थामा जैसा कोई अस्तित्व सच है, तो उसकी ऊर्जा/बायोमैट्रिक्स की तकनीक विश्व स्तर पर बदल डाल सकती है.।
अश्वत्थामा का अहसासहिमालय में, जहाँ बर्फ और पत्थर पुराणों की गूँज सुनते थे, अश्वत्थामा एकान्त में बैठा रहता. उसने उन संकेतों को महसूस किया जो दुनिया भर में उभर रहे थे ।
— वैज्ञानिकों की खोज, जासूसों की चाल, और सरकारी छुप- छुप के कदम. वह इन सबको इंसानों की भाषा में समझता—" शक्ति, ज्ञान, लालच" —पर उसके लिए सब एक ही चीज थी: ।
विघ्न. वह अब अधिक संवेदनशील हो गया था. कभी- कभी वह याद करता कि कृष्ण ने उसे क्या कहा था
— अमरता, पर व्यथित. और अब उसके सामने नए युग की आवाजें भी आ रही थीं।
— कम्प्यूटर्स की, सिग्नल्स की, और मानव जिज्ञासा की. उसकी चेतावनी अभी भी वही थी
—“ मेरे पास मत आना” —पर अब वह जानता था कि लोग उसकी चेतावनी के बीच में ही आएँगे. आदित्य के मन का हल्का काँपनावक्त के साथ, ।
आदित्य के भीतर वह एक छोटा सा ज्वालामुखी बनी रही—कभी दब जाती, कभी उभर कर सामने छिडकती. वह दोस्तों के साथ हँसा, काम किया, किसी पार्टी में गया,
और कभी- कभी रातों को अपने पिता के वीडियो के एक- एक फ्रेम को जहन में दोहराता — पिता की थकी आँखें, वही आवाज: मैं मरा नहीं हूँ।
लेकिन उसने अभी उस आवाज को खुलेआम अपनाने से इनकार किया. कारण सरल था—जिंदगी में कई जिम्मेदारियाँ थीं. माँ की कमजोरी, नौकरी की ड्यूटी, दोस्तों की बातें. वह चाहता था
कि ये सब कुछ सामान्य रहे, पर अंदर कुछ उसे बार- बार पुकारता—“ ध्यान रखना, यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई। क्लाइमैक्स — एक छोटी- सी आहटएपिसोड के आखिर में, रात का वक्त था.
आदित्य अपने घर की छत पर चाँद को देख रहा था.
उसी वक्त उसकी जेब में रखा पुराना मोबाइल बज उठा — अनजान नंबर. उसने उठाया—कोई मूक शोर, फिर एक फुसफुसाहट, और फिर एक क्षणिक सिग्नल जिसमें एक जगह का नाम उभर कर गया।
केदारखंड” आदित्य का दिल एक बार जोर से धक्का खा गया. उसने फोन की लाइट में बॉक्स देखा—Y. A. – Only for Aditya। वह उठा, बॉक्स खोलने को झुका पर फिर रुका. बोला खुद से—“ अभी नहीं. कुछ समय बाद।
आसमान में बादल घिरने लगे. हिमालय की ओर कहीं- दूर, किसी ने निगाह उठायी और वापिस झुकायी. जमी हुई चीजें धीरे- धीरे जिंदा होतीं—पर आज की रात वह फैसला नहीं थी. यह केवल एक संकेत था — धीमी, पर निश्चित.
लेखक भगवत सिंह नरूका ✍️