कहानी नहीं… चेतावनी हूँ मैं।
मेरे पास आने की कोशिश मत करना।”
अभी भी मेरा सवाल है ,,
(योगेश्वर अग्निवंश ने उससे सवाल रखने को बोले दोनों के बीच महाभारत काल के संबंधिक सवाल जवाब हुए जिन में सभी सवालों के जवाब ठीक ठीक थे उससे वो बहुत खुश हुआ ओर उसको बिलीव भी हो गया उस योगेश्वर पर )
फिर कुछ सेकंड बाद—
“लेकिन तुम आओगे… मैं जानता हूँ।” क्योंकि मेरे सारे योगों की दवा सिर्फ तुम्हारे घर में है । जिसके तुम जन्म दाता हो आज से तुम मै हु मै ही तुम हु ।
और स्क्रीन पूर्णतः black हो गई।
योगेश्वर ने धीरे से कहा—
“यह संवाद…
इतिहास का पहला वैज्ञानिक-पौराणिक संपर्क था।”
उसी समय उसने समित चौहान को संपर्क किया वो कुछ ही मिनटों बाद उस लेब में पहुंच गया ओर साथ में राठौड़ भी ,जब वो अंदर आए तो योगेश्वर के चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी जिसको देख कर समित चौहान ने अंदाजा लगा लिया कि कामयाबी मिल चुकी है ,लेकिन वो उसके मुंह से सुनना चाहता था वो कुछ वाक्य हुआ ।
धीरे धरे उसने सारी बातें समित चौहान के सामने रखी ओर ओर वो सब कुछ जो उन दोनों के बीच महाभारत काल के संबंध में सवाल पूछे गए ।
लेकिन एक बात थी जिसको उसने गुप्त रखा वो थी ,,जैसा कि उस Ashvdhama ने बोली ,,, तुम उसके जन्म दाता हो वो तुम्हारे घर में
समित ने उसकी ओर देखा—
“डॉक्टर साहब…
अब क्या करेंगे?”
योगेश्वर ने गहरी साँस ली—
“अब…
हिमालय जाना पड़ेगा।”
रथौड़ चिल्लाया—
“क्या आप पागल हो गए हैं? वहाँ कौन है, आपको पता है?”इंसान है या कोई आतंकी संगठन या कोई अन्य दुश्मन। मै सही बोल रहा सर क्यों इसके चक्कर में समय बर्बाद कर रहे हो जरूर ये किसी देश की साजिश है जो हमारे सिस्टम को क्रैश करना चाहता है ।
योगेश्वर ने शांत स्वर में कहा—
“हाँ…
वहाँ एक युग इंतज़ार कर रहा है।” लेकिन अभी वो बाते तुम्हारे दिमाग के लिए केवल काल्पनिक है ।
समित चौहान::
बस करो राठौड़,, (शांत करते हुए ) योगेश्वर हमे जल्दी करनी होगी जैसे हमें इसका इंतजार था कोई ओर भी है जिसको इसकी खबर पहुंच गई होगी ,,।
योगेश्वर अग्निवंश की कार जंगल के बीच एक पुरानी कच्ची सड़क पर धीरे-धीरे बढ़ रही थी। रात गहरी थी, झींगुरों की आवाज़ें हवा में तैर रहीं थीं। उसके हाथ में वही फाइल थी—अश्वत्थामा के अंतिम दर्शन से जुड़ी तस्वीरें, और वे गुप्त कोड जिन पर वह वर्षों से रिसर्च कर रहा था। उसे पता था कि वह जहाँ जा रहा है, वहाँ से लौटना आसान नहीं होगा… लेकिन यह भी सच था कि वह पूरी मानव सभ्यता के लिए एक क्रांतिकारी खोज की दहलीज पर था।
लेकिन वह लौटा नहीं।
दूसरे दिन सुबह, न्यूज़ चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी—
“भारत के शीर्ष वैज्ञानिक योगेश्वर अग्निवंश रहस्यमय ढंग से लापता!”
“कार मिली, वैज्ञानिक नहीं…!”
“अफवाह—क्या किसी गुप्त मिशन पर थे?”
“परिवार सदमे में…”
कुछ ही घंटों में एक और झूठी खबर तैरने लगी—
“सूत्रों के हवाले से—योगेश्वर अग्निवंश संभवतः मृत।”
किसने यह खबर फैलाई? कैसे? इतने बड़े वैज्ञानिक की गुमशुदगी पर सरकारी चुप्पी क्यों? सब कुछ संदिग्ध था।
घर पर मातम का माहौल था।
पत्नी रितु बार-बार दरवाज़े की तरफ देखती, जैसे वह भीतर आते ही कहेंगे—
“रितु, मैं आ गया… बस थोड़ा ज़रूरी काम था।”
पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
15 साल का उनका बेटा आदित्य अपने कमरे में खामोश बैठा था। उसकी आंखों में सवाल थे—
“पापा कहाँ गए?”
कोई जवाब नहीं।
एक साजिश की शुरुआत
सरकारी अधिकारी घर आए थे, पर उनके सवाल ही ऐसे थे कि जैसे योगेश्वर किसी भारी राज़ में उलझे हों।
उनके जाने के बाद रितु को लगा—
कुछ तो छुपाया जा रहा है…
कुछ बहुत बड़ा।
योगेश्वर की लैब सील कर दी गई।
फाइलें, कंप्यूटर, हार्ड ड्राइव, सब अपने कब्जे में ले लिया गया।
रितु की आंखों में डर था…
क्या सच में उसके पति किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश में फंस गए थे?
. गुप्त लेब का रहस्य
योगेश्वर ने कभी किसी को अपनी गुप्त लेब की लोकेशन नहीं बताई थी—
न सरकारी स्टाफ को, न अपने ऑफिस को, न मीडिया को… न घरवालों को।
सिर्फ अपने बेटे आदित्य को यह कहा था—
“बेटा, बड़ा होकर अगर कभी महसूस हो कि दुनिया को सच की ज़रूरत है…
तो मेरे नोट्स पढ़ना।
मैंने सब रिकॉर्ड कर रखा है…”
आदित्य ने उस समय हँस कर इसे मज़ाक समझा था।
लेकिन अब… हर शब्द जैसे किसी गूढ़ संकेत जैसा लगने लगा।
15 साल बाद…
समय भागता गया।
दुनिया बदल गई।
तकनीक तेज़ हुई।
राजनीति बदल गई।
लेकिन एक चीज़ नहीं बदली—
अग्निवंश परिवार का दर्द।
योगेश्वर अग्निवंश की मौत की खबर 15 साल बाद भी बिना किसी सबूत के फाइलों में धूल खाती रही।
मीडिया ने शुरुआत में खूब टीआरपी बटोरी, फिर मामला ठंडा कर दिया।
सरकार ने “राष्ट्रीय सुरक्षा” का हवाला देकर केस बंद कर दिया।
लेकिन बेटा आदित्य, अब 30 साल का हो चुका था।
इंजीनियर बनने के बाद उसने पिता की दिशा पकड़ ली थी—
वह अब एक साइंटिफिक सिस्टम एनालिस्ट था।
और वह अपने पिता पर शोध कर रहा था—
उसी तरह जैसे उसके पिता अश्वत्थामा पर शोध करते थे।
एक दिन, एक पुराना अलमारी खोलते समय उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।
अलमारी का पिछला पैनल हल्का अलग-सा लग रहा था।
उसने उसे धक्का दिया—
टक!
एक छिपा हुआ लकड़ी का पैनल खुल गया।
अंदर एक खुफिया बॉक्स था।
उस पर उकेरा हुआ था—
“Y.A. – Only for Aditya.”
आदित्य की सांसें रुक गईं।
यह तो पिता की लिखावट थी…
वीडियो नम्बर 1 – “मैं मरूँगा नहीं”
आदित्य ने बॉक्स खोला।
अंदर एक छोटा प्रोजेक्टर और 17 चिप्स थीं।
पहली चिप पर लिखा था—
“Ashvdhamaa Truth – 01”
उसने प्ले किया।
स्क्रीन पर पिता थे…
थके हुए, चिंतित, पर आँखों में वही दृढ़ता।
“आदित्य, अगर यह वीडियो तुम्हारे हाथ में आया है…
तो इसका मतलब है कि मैं शायद लौट नहीं पाया।”
आदित्य की आंखें नम हो गईं।
“बेटा, मुझे अश्वत्थामा मिल गया है…
या यू कहूँ—मैं उसके करीब हूँ।
लेकिन मेरी यह खोज कई शक्तियों को पसंद नहीं आएगी।
वे मुझे रोकेंगे।
मारने की कोशिश करेंगे।
लेकिन…
जान लो…
मैं मरा नहीं हूँ।
मैं कहीं कैद हूँ, किसी ऐसे स्थान पर जहाँ विज्ञान और समय दोनों असहाय हो जाते हैं।”
वीडियो में अचानक एक तेज़ आवाज़ आई—
जैसे कोई दरवाज़ा तोड़ रहा हो।
“आदित्य, ये लोग आ गए—
मेरी बात याद रखना—
अश्वत्थामा अमर है,
और अब… कोई मुझे रोकने—”
वीडियो वहीं कट गया।
आदित्य स्तब्ध खड़ा था।
उसके हाथ कांप रहे थे।
उसकी रगों में खून उबल रहा था।
“पापा जिंदा हैं…!”
यही बात अब उसके मस्तिष्क में मथ रही थी।
आदित्य ने उस रात एक फैसला किया—
“मैं ढूँढूँगा पापा को…
और इस साजिश की जड़ तक जाऊँगा।”
वह पिता की रिसर्च को समझने लगा।
हर चिप में ऐसे खुलासे थे जो मानव इतिहास को बदल सकते थे—
अश्वत्थामा आज भी भारत में है।
उसके ऊपर कृष्ण का श्राप आज भी सक्रिय है।
वह अमर है लेकिन शापित भी।
कई गुप्त संगठन उसकी तलाश कर रहे हैं—कई वैज्ञानिक, कई आतंकवादी, कई धार्मिक समूह।
और कहीं न कहीं, योगेश्वर अग्निवंश इसी कारण गायब हुआ।
आदित्य के सामने एक नया रास्ता खुल चुका था—
जो विज्ञान से शुरू होकर पौराणिक रहस्य में गहराइयों तक जाता था।
एपिसोड के अंत में, आदित्य वीडियो की 7वीं चिप चलाता है।
वीडियो में उसके पिता बोल रहे थे—
“आदित्य… मेरी अंतिम लोकेशन देख।
मैं यहाँ हूँ—”
वीडियो में एक पहाड़ दिखता है—
बर्फ से ढका… बादलों के बीच खोया हुआ…
और उसके नीचे लिखा—
“केदारखंड की सीमा।
जहाँ देवता भी बिना अनुमति प्रवेश नहीं करते।”
आदित्य ने फुसफुसाया—
“पापा… मैं आ रहा हूँ।”
और इसी के साथ शुरू होने वाली थी—
एक ऐसी यात्रा…
जहाँ विज्ञान और पौराणिक इतिहास आमने-सामने खड़े होने वाले थे।
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लेखक भगवत सिंह नरूका ✍️