सर्दियों की हल्की धूप खिली थी। 75 वर्षीय रामदीन बाबू अपनी छड़ी टेकते हुए पार्क के किनारे धीरे-धीरे चल रहे थे। तभी पास की सड़क पर एक पीली स्कूल बस आकर रुकी। बस का हॉर्न और बच्चों की किलकारियों ने अचानक उनका ध्यान खींचा।
एक छोटा सा बच्चा, जिसका बस्ता शायद उसके वजन से भी भारी था, अपनी माँ का हाथ छुड़ाकर बस की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था। उसकी वो बेमन से स्कूल जाने की चाल और फिर खिड़की से झांककर हाथ हिलाना—यह दृश्य देखते ही रामदीन बाबू के कदम वहीं थम गए। उनकी आँखों के सामने से वो पीली बस धुंधली होने लगी और यादों का एक पुराना श्वेत-श्याम (Black and white) चित्र उभरने लगा।
अचानक वो शहर की पक्की सड़क गायब हो गई और उन्हें अपने गाँव की वो धूल भरी पगडंडी दिखाई देने लगी।
"अरे ओ रामदीन! जल्दी चल, वरना मास्टर जी मुर्गा बना देंगे!" उन्हें अपने बचपन के दोस्त माधव की आवाज़ सुनाई दी।
रामदीन बाबू के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान तैर गई। उन्हें याद आया अपना वो खादी के कपड़े से सिला हुआ 'झोला'। आज के बच्चों की तरह पीठ पर लदे बोझ नहीं थे तब, बस एक झोला होता था जिसमें एक लकड़ी की 'तख्ती' (स्लेट), एक नरकुल की कलम और मिटटी की दवात (inkpot) होती थी।
उन्हें याद आया कि कैसे वो सुबह-सुबह मुल्तानी मिट्टी और काले कोयले के घोल से अपनी तख्ती को चमकाते थे। वो तख्ती की सौंधी खुशबू आज भी उनकी सांसों में बसी थी। स्कूल कोई बड़ी इमारत नहीं थी, बल्कि गांव के बाहर पुराने बरगद के पेड़ के नीचे लगता था। न फैंसी बेंच, न पंखे। घर से ले जाई गई 'टाट-पट्टी' (बोरी) ही उनकी सीट हुआ करती थी।
चलते-चलते रामदीन बाबू की आँखों में चमक आ गई जब उन्हें याद आया कि स्कूल जाने का रास्ता स्कूल से ज्यादा मजेदार होता था। रास्तों में कभी किसी के खेत से गन्ना तोड़ लेना, तो कभी बेर के झाड़ियों में पत्थर मारकर बेर गिराना। नंगे पैर जब वो धूल में दौड़ते थे, तो ऐसा लगता था मानो पूरी दुनिया उनके कदमों में है।
उन्हें मास्टर जी का वो कड़क अनुशासन भी याद आया। पहाड़े (Tables) याद न होने पर कान पकड़कर उठक-बैठक लगवाना। लेकिन उस सजा में भी कोई अपमान नहीं था, बस एक सीख थी। और फिर, सबसे बड़ी खुशी— 'आधी छुट्टी' की घंटी! वो आधी छुट्टी में एक आन्ने की बीस संतरे वाली टॉफी और घर से लाया हुआ रूखा-सूखा पराठा, जिसका स्वाद आज के पिज्जा-बर्गर से कहीं ज्यादा अपना सा लगता था।
"आज के बच्चों के पास सुविधाएँ तो बहुत हैं," रामदीन बाबू ने मन ही मन सोचा, "पर क्या उनके पास वो आज़ादी है? क्या वो बारिश होने पर स्कूल की छुट्टी होने की दुआ मांगते हैं और छुट्टी मिलते ही कागज की नाव चलाने भागते हैं?"
तभी पास से गुजरते एक बच्चे ने अनजाने में रामदीन बाबू के पैर छू लिए क्योंकि उसका खिलौना उनके पास गिर गया था। "सॉरी दादाजी," बच्चा बोला।
रामदीन बाबू वर्तमान में लौट आए। उन्होंने झुककर खिलौना उठाया और बच्चे को देते हुए कांपती आवाज़ में बोले, "खुश रहो बेटा, खूब पढ़ो।"
बच्चा तो भाग गया, लेकिन रामदीन बाबू की आँखों के कोर गीले हो चुके थे। उन्होंने अपनी छड़ी उठाई और एक गहरी सांस ली। उन्हें महसूस हुआ कि वक्त बहुत बदल गया है, बचपन अब मोबाइल और भारी बस्तों में सिमट गया है, लेकिन वो 'तख्ती' वाला बचपन, वो बेफिक्री, वो सादगी—वो एक ऐसा खजाना है जिसे वो आज भी अपने दिल के कोने में संभाल कर रखे हुए हैं।
उन्होंने आसमान की तरफ देखा, जहाँ एक पक्षी खुले गगन में उड़ रहा था, बिल्कुल उनके बचपन की तरह आज़ाद। और फिर, पुराने दिनों की गर्माहट को अपने सीने में समेटे, वो धीरे-धीरे अपने घर की ओर बढ़ चले।