खोज की शुरुआत
पेरिस की चकाचौंध और भीतर का अंधेरा :
पेरिस की शाम अपनी पूरी खूबसूरती पर थी। एफिल टॉवर सुनहरी रोशनी में नहाया हुआ था और उसके नीचे हजारों सैलानियों की भीड़ अपनी खुशी जाहिर कर रही थी। 35 वर्षीय आर्यन उस भीड़ से थोड़ा दूर, सीन नदी (River Seine) के किनारे एक बेंच पर बैठा था। उसके गले में दुनिया का सबसे महंगा कैमरा लटक रहा था और जेब में एक ऐसा पासपोर्ट था जिस पर दुनिया के आधे देशों के वीज़ा की मुहरें लगी थीं।
उसके दोस्तों की नज़र में आर्यन की ज़िंदगी एक सपना थी। वह एक सफल उद्यमी था जिसने अपनी कंपनी बेचकर पूरी दुनिया घूमने का फैसला किया था। अमेज़न के घने जंगलों से लेकर नॉर्वे की नॉर्दर्न लाइट्स तक, उसने सब कुछ अपनी आँखों से देखा और अपने कैमरे में कैद किया था। लेकिन आज, पेरिस की इस रंगीन शाम में, उसे अपने अंदर एक गहरा और डरावना सन्नाटा महसूस हो रहा था।
उसने अपने कैमरे की स्क्रीन पर अभी-अभी खींची गई एक तस्वीर देखी—एक परफेक्ट शॉट। लेकिन उसे देखते ही आर्यन के मन में एक अजीब सी वितृष्णा (disgust) जागी।
"मैंने दुनिया का कोना-कोना देख लिया," वह खुद से बुदबुदाया, "लेकिन मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मैंने कुछ भी नहीं देखा? मैं बस जगहों को इकट्ठा कर रहा हूँ, जैसे कोई बच्चा डाक टिकट इकट्ठा करता है। पर जीवन कहाँ है?"
उसे महसूस हुआ कि वह भाग रहा है। वह अपनी बेचैनी को नए-नए शहरों के शोर में दबाने की कोशिश कर रहा था। वह दुनिया की सुंदरता का उपभोक्ता (consumer) बन गया था, लेकिन उसे अनुभव (experience) नहीं कर पा रहा था। उसे लगा जैसे उसकी आत्मा प्यासी है और वह उसे खारा पानी पिलाए जा रहा है।
नक्शे पर उंगली और एक फैसला:
उसी रात, अपने आलीशान होटल के कमरे में, आर्यन ने दुनिया का एक बड़ा सा नक्शा मेज पर फैला दिया। उसकी उंगलियाँ न्यूयॉर्क, लंदन, टोक्यो और स्विट्ज़रलैंड के ऊपर से गुजरीं—ये सब उसे अब प्लास्टिक के खिलौनों जैसे लग रहे थे। बनावटी, सुरक्षित और भीड़भाड़ से भरे हुए।
उसकी उंगली भारत के नक्शे पर आकर रुकी, और फिर ऊपर सरकते हुए उस सफेद हिस्से पर ठहर गई जिसे दुनिया 'हिमालय' कहती है।
उसने मनाली, शिमला या लेह जैसे पर्यटन स्थलों को नहीं देखा। उसकी नज़र उन लकीरों पर थी जहाँ सड़कें खत्म हो जाती हैं। गंगोत्री से आगे... गोमुख के पार... सुमेरु और शिवलिंग चोटियों के पीछे का वो इलाका, जिसे नक्शे पर 'No Man's Land' कहा जाता है।
एक अजीब सी सिहरन उसके शरीर में दौड़ गई। यह डर नहीं था, यह एक बुलावा था।
"मुझे वहाँ जाना है जहाँ कोई वाई-फाई न हो, कोई नक्शा काम न करे, और जहाँ मेरा पैसा मुझे नहीं, बल्कि मेरी सांसें मुझे जिंदा रखें," उसने सोचा। "मुझे ऐसी जगह चाहिए जो मुझे तोड़ सके, ताकि मैं खुद को दोबारा बना सकूं।"
उसी पल, उसने एक फैसला लिया जिसने उसकी जिंदगी की दिशा बदल दी। उसने अपनी वापसी की टिकट कैंसिल कर दी। उसने अपना फैंसी सूटकेस पैक किया और उसे होटल के रिसेप्शन पर दान कर दिया। उसने सिर्फ एक मजबूत रकसैक (Rucksack) उठाया, उसमें कुछ गर्म कपड़े, एक डायरी, और ज़रूरी सामान डाला।
सबसे महत्वपूर्ण बात—उसने अपनी कलाई से वो महंगी घड़ी उतार दी जो उसे हमेशा वक्त की याद दिलाती रहती थी।
"अब मुझे वक्त के हिसाब से नहीं, बल्कि सूरज और चाँद के हिसाब से चलना है," उसने घड़ी को डस्टबिन में डालते हुए सोचा।
सभ्यता का आखिरी छोर:
दो दिन बाद, आर्यन हिमालय की गोद में था। वह दिल्ली से ऋषिकेश और फिर उत्तरकाशी होते हुए गंगोत्री पहुँच चुका था। लेकिन उसकी मंजिल गंगोत्री नहीं थी।
गंगोत्री के मंदिर के पीछे बहती भागीरथी नदी का शोर उसके कानों में गूंज रहा था। यहाँ हवा में ऑक्सीजन कम और ठंडक ज्यादा थी। यहाँ के साधुओं और स्थानीय कुलियों (Porters) की आँखों में उसने एक अलग चमक देखी—एक ऐसी शांति जो पेरिस के अमीर लोगों के पास भी नहीं थी।
उसने एक स्थानीय गाइड से बात की और कहा, "मुझे तपोवन से आगे जाना है, नंदनवन और वासुकी ताल के पार। उस जगह जहाँ सन्नाटा बोलता हो।"
गाइड ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। आर्यन के कपड़े महंगे ब्रांड के थे, जूते नए थे। गाइड हंसा, "साहब, वो मौत का इलाका है। वहाँ ऑक्सीजन नहीं है, सिर्फ बर्फ और तूफान हैं। आप जैसे शहर के लोग वहाँ दो दिन भी नहीं टिक पाएंगे।"
आर्यन की आँखों में एक ऐसी जिद थी जो गाइड ने कम ही देखी थी। आर्यन ने कहा, "मैं वहाँ वापस आने के लिए नहीं जा रहा हूँ। मैं वहाँ कुछ खोजने जा रहा हूँ, और जब तक वो मिल नहीं जाता, मुझे मौत का भी डर नहीं है।"
गाइड उसकी आँखों की गहराई देख चुप हो गया। अगली सुबह, सूरज की पहली किरण के साथ, आर्यन ने अपनी पीठ पर अपना भारी बैग लादा। उसने पीछे मुड़कर देखा—नीचे बस्ती थी, गर्म चाय की दुकानें थीं और सुरक्षित जीवन था। और सामने—विशाल, सफेद, क्रूर और अनंत हिमालय खड़ा था।
उसने एक गहरी सांस ली, बर्फीली हवा ने उसके फेफड़ों को चीर दिया, और उसने अपना पहला कदम उस अनजान रास्ते पर बढ़ाया। वह अब आर्यन 'द टूरिस्ट' नहीं था; वह अब एक 'साधक' था जो शून्य के शिखर की ओर बढ़ रहा था।
दुर्गम चढ़ाई और मौत से सामना
प्रकृति का रौद्र रूप :
गंगोत्री से निकलने के तीन दिन बाद, दुनिया पूरी तरह बदल चुकी थी। हरे-भरे देवदार के जंगल और भोजपत्र के पेड़ अब एक पुरानी याद बनकर बहुत नीचे छूट चुके थे। अब चारों तरफ सिर्फ ग्रे रंग की नुकीली चट्टानें और सफेद बर्फ की चादर थी।
आर्यन और उसका गाइड, जिसका नाम शेर सिंह था, अब 14,000 फीट की ऊंचाई पर थे। यहाँ हवा इतनी पतली थी कि हर सांस के लिए फेफड़ों को लड़ना पड़ रहा था। आर्यन का भारी रकसैक अब उसे चट्टान जैसा लग रहा था। उसके पैर सीसा (lead) की तरह भारी हो गए थे, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी दीवानगी थी जो उसे रुकने नहीं दे रही थी।
रास्ता अब खत्म हो चुका था। वे ग्लेशियर (हिमनद) के ऊपर चल रहे थे, जहाँ बर्फ के नीचे गहरी दरारें (Crevasses) छिपी थीं। एक गलत कदम, और इंसान सीधे सैकड़ों फीट नीचे अंधेरे में समा जाए।
आखिरी साथ छूटना:
चौथे दिन की दोपहर, मौसम अचानक बिगड़ने लगा। आसमान, जो अब तक गहरा नीला था, अचानक काले बादलों से घिर गया। हवा की आवाज किसी रोते हुए राक्षस जैसी हो गई।
वे एक ऐसे मुहाने पर खड़े थे जहाँ से आगे सिर्फ खड़ी चढ़ाई और अंतहीन बर्फ का रेगिस्तान था। इसे स्थानीय लोग 'मृत्यु क्षेत्र' कहते थे।
शेर सिंह वहीं रुक गया। उसने अपना सामान नीचे रखा और हाथ जोड़ लिए।
"साहब, अब बस," शेर सिंह ने कांपती आवाज़ में कहा। "इसके आगे जाने का मतलब है आत्महत्या। यहाँ से आगे देवता रहते हैं या राक्षस, इंसान नहीं जाते। मैं अपने बच्चों को अनाथ नहीं कर सकता। हमें लौटना होगा।"
आर्यन ने ऊपर देखा। बर्फीली चोटियाँ उसे चुनौती दे रही थीं। उसने अपनी जेब से नोटों की गड्डी निकाली और शेर सिंह के हाथ में रख दी।
"तुम वापस जाओ, शेर सिंह," आर्यन ने शांत स्वर में कहा। "तुम्हारे लिए यह एक नौकरी है, मेरे लिए यह एक यात्रा है। मेरा रास्ता यहीं से शुरू होता है।"
शेर सिंह ने उसे रोकने की कोशिश की, उसे पागल कहा, लेकिन आर्यन ने अपना बैग उठाया और अकेले आगे बढ़ गया। शेर सिंह उसे तब तक देखता रहा जब तक आर्यन कोहरे में एक धब्बे जैसा होकर गायब नहीं हो गया। अब, आर्यन पूरी दुनिया में बिल्कुल अकेला था।
तूफान और परीक्षा :
शेर सिंह के जाने के कुछ ही घंटों बाद, हिमालय ने अपनी असली ताकत दिखाई। एक भयानक बर्फीला तूफान (Blizzard) आया। विजिबिलिटी जीरो हो गई। ऐसा लग रहा था मानो आसमान खुद जमीन पर गिर रहा हो।
बर्फ के कण गोलियों की तरह आर्यन के चेहरे पर लग रहे थे। तापमान शून्य से 25 डिग्री नीचे चला गया। उसकी जैकेट, थर्मल, सब बेकार साबित हो रहे थे। उसकी उंगलियां सुन्न हो चुकी थीं।
डर ने पहली बार आर्यन के दिल पर दस्तक दी।
"क्या मैंने गलती कर दी?" उसके मन ने चीखकर पूछा। "पेरिस का वो गर्म होटल का कमरा... वो कॉफी... वो दोस्तों की महफिल... मैं यहाँ मरने क्यों आया हूँ?"
वह एक बड़ी चट्टान की आड़ में दुबक कर बैठ गया। उसकी पानी की बोतल में पानी जम चुका था। नींद उसे अपनी आगोश में ले रही थी—हाइपोथर्मिया का लक्षण। उसे पता था कि अगर वो अभी सोया, तो फिर कभी नहीं उठेगा।
उसने खुद को थप्पड़ मारा। "नहीं! मैं यहाँ मरने नहीं आया हूँ, मैं यहाँ जीने का मतलब जानने आया हूँ। अगर मौत भी आ रही है, तो मैं उसे खुली आँखों से देखूँगा।"
उसने अपनी पूरी इच्छाशक्ति बटोरी और उस तूफान में भी धीरे-धीरे, घिसटते हुए आगे बढ़ता रहा।
शुन्य का सन्नाटा:
पूरी रात संघर्ष करने के बाद, सुबह तूफान थमा। सूरज निकला, लेकिन उसमें गर्मी नहीं थी, सिर्फ रोशनी थी।
आर्यन जब एक ऊंचे दर्रे (Pass) के ऊपर पहुँचा, तो उसके सामने का नज़ारा देखकर उसकी सांसें थम गईं।
वह लगभग 17,000 फीट की ऊंचाई पर था। सामने एक विशाल, समतल पठार था जो पूरी तरह बर्फ से ढका था। वहाँ कोई पेड़ नहीं, कोई पक्षी नहीं, कोई आवाज नहीं। सिर्फ एक अनंत, गहरा सन्नाटा (Silence) था। यह सन्नाटा इतना गहरा था कि आर्यन को अपनी धड़कनें हथौड़े जैसी सुनाई दे रही थीं।
यह जगह डरावनी थी, लेकिन इसमें एक अलौकिक पवित्रता भी थी।
तभी, उसकी नज़र दूर, एक खड़ी चट्टान के नीचे बनी एक गुफा पर पड़ी। गुफा के बाहर कोई हलचल नहीं थी, लेकिन आर्यन को अपने अंदर एक खिंचाव महसूस हुआ—जैसे कोई चुंबक लोहे को खींच रहा हो। उसके थके हुए पैरों में अचानक एक अनजानी ताकत आ गई।
वह लड़खड़ाते कदमों से उस गुफा की ओर बढ़ा। जैसे-जैसे वह नजदीक गया, उसने देखा कि गुफा के बाहर, खुले आसमान के नीचे, बर्फ की एक चट्टान पर कोई बैठा है।
एक मानव आकृति। स्थिर। अचल।
आर्यन के रोंगटे खड़े हो गए। वह समझ गया कि उसकी मंजिल आ गई है। वह उस 'शून्य' के दरवाजे पर खड़ा था जिसकी तलाश में उसने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी थी।
मिलन और तिरस्कार
समय से परे एक अस्तित्व :
आर्यन जैसे-जैसे उस आकृति के करीब पहुँचा, उसके कदमों की आहट भी उसे अपराध जैसी लगने लगी। उस जगह की पवित्रता ही ऐसी थी।
गुफा के मुहाने पर, बर्फ की एक समतल शिला पर वो योगी विराजमान थे।
दृश्य अकल्पनीय था। जिस तापमान में आर्यन को सात परतों वाले (7-layer) कपड़ों के अंदर भी ठंड लग रही थी, वहां यह वृद्ध योगी केवल एक लंगोट में बैठे थे। उनका शरीर भस्म (राख) से ढका था, जो बर्फ की सफेदी में भी अलग चमक रहा था। उनकी जटाएं (बाल) घुटनों तक लंबी थीं और बर्फ की तरह जमी हुई थीं।
लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उनके आसपास की बर्फ पिघली हुई थी। उनके शरीर से एक ऐसी अदृश्य ऊष्मा (Heat) और कंपन (Vibration) निकल रहा था, जिसे आर्यन दस कदम दूर से भी महसूस कर सकता था। यह शरीर की गर्मी नहीं थी, यह 'तप' की ऊर्जा थी।
आर्यन के घुटने अपने आप मुड़ गए। वह थकान से नहीं, बल्कि उस उपस्थिति (Presence) के बोझ से गिर पड़ा। वह हाँफ रहा था, लेकिन योगी की सांसें इतनी धीमी थीं कि मानो वे सांस ले ही न रहे हों।
ब्रह्मांड जैसी आँखें :
काफी देर तक वहां सिर्फ हवा की सनसनाहट रही। आर्यन की हिम्मत नहीं हुई कि वह कुछ बोले। उसे लगा कि वह किसी सोए हुए ज्वालामुखी के सामने खड़ा है।
अचानक, योगी ने अपनी आँखें खोलीं।
आर्यन ने अपनी जिंदगी में कई लोगों की आँखें देखी थीं—नेताओं की, बिजनेसमैन की, प्रेमियों की। लेकिन ऐसी आँखें कभी नहीं देखी थीं।
उन आँखों में न गुस्सा था, न प्यार, न जिज्ञासा। वे बिल्कुल खाली थीं—आसमान की तरह। उनमें एक ऐसा गहरा सन्नाटा था जो आर्यन की आत्मा को चीरता हुआ उसके अंदर के सारे शोर को पी गया।
उन आँखों ने आर्यन को नहीं देखा, बल्कि आर्यन के 'आर-पार' देखा। उस एक नज़र में आर्यन को महसूस हुआ कि उसका पैसा, उसकी उपलब्धियां, उसका अहंकार—सब उस योगी के सामने धूल के समान हैं। वह खुद को नग्न और तुच्छ महसूस करने लगा।
कठोर तिरस्कार :
आर्यन ने अपने सूखे गले से आवाज निकालने की कोशिश की।
"मैं... मैं ज्ञान की तलाश में आया हूँ," उसकी आवाज़ फटी हुई और कमजोर थी। "मुझे रास्ता दिखाइए।"
योगी के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे दो भारी पत्थर आपस में टकरा रहे हों—गंभीर और गूंजती हुई।
"वापस जाओ," उन्होंने कहा। शब्द हिंदी के थे, लेकिन उनका उच्चारण संस्कृत जैसा शुद्ध था। "यह जगह तमाशबीनों के लिए नहीं है।"
आर्यन को धक्का लगा। उसने कहा, "मैं तमाशबीन नहीं हूँ। मैं बहुत दूर से आया हूँ। मैंने मौत का सामना किया है यहाँ पहुँचने के लिए।"
योगी की आँखों में पहली बार एक चमक आई—तिरस्कार की।
"तुम मौत से नहीं, अपनी बोरियत (Boredom) से भागकर आए हो," योगी ने कड़वा सच बोला। "तुम पश्चिम के उन भटके हुए लोगों में से हो जो आध्यात्म को एक नशा समझते हैं। तुम्हें लगता है कि यहाँ कोई जादू होगा जो तुम्हारी खाली जिंदगी को भर देगा? तुम अपनी देह (Body) को भी नहीं संभाल सकते, अपनी आत्मा को क्या संभालोगे? तुम्हारी सांसें अभी भी डर से कांप रही हैं।"
योगी ने अपना हाथ हवा में लहराया, जैसे मक्खी उड़ा रहे हों।
"लौट जाओ उसी दुनिया में जहाँ से आए हो। यहाँ की हवा तुम्हें जला देगी। तुम कच्चे हो।"
जिद और समर्पण:
योगी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे आर्यन का अस्तित्व ही उनके लिए खत्म हो गया हो। यह उपेक्षा (Ignore) किसी भी गाली से ज्यादा अपमानजनक थी।
आर्यन का अहंकार चोटिल हो गया। उसका मन हुआ कि वह चिल्लाए, कहे कि वह कौन है, उसने क्या-क्या हासिल किया है। लेकिन अगले ही पल, उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। वह यहाँ भी अपना 'अहंकार' लेकर ही खड़ा था। वह एक भिखारी बनकर आया था, लेकिन तेवर राजा वाले थे।
उसने पीछे मुड़कर देखा। बर्फीला रास्ता उसे बुला रहा था। वापस जाना आसान था। वापस जाकर वह अपनी पुरानी जिंदगी जी सकता था, यह कहते हुए कि "मैं हिमालय गया था।"
लेकिन उसने महसूस किया कि अगर वह आज वापस गया, तो वह जिंदा तो रहेगा, पर उसकी आत्मा मर जाएगी।
आर्यन ने अपना रकसैक उतारा और उसे बर्फ पर पटक दिया।
"मैं वापस नहीं जाऊंगा," वह बड़बड़ाया, योगी से ज्यादा खुद से कहते हुए। "या तो मुझे वो मिलेगा जो आपके पास है, या मेरा शरीर यहीं बर्फ में दफन होगा। बीच का कोई रास्ता नहीं है।"
वह योगी से कुछ फीट की दूरी पर बर्फ में पालथी मारकर बैठ गया। उसने अपनी जैकेट की ज़िप ऊपर तक खींची, आँखें बंद कीं, और वहीं जम जाने का फैसला किया।
योगी ने एक बार भी आँखें नहीं खोलीं। परीक्षा शुरू हो चुकी थी। एक तरफ हिमालय की जानलेवा ठंड थी, और दूसरी तरफ एक इंसान की जलती हुई जिद।
अग्निपरीक्षा और अहंकार का अंत
बर्फ की समाधि :
आर्यन को गुफा के बाहर बैठे हुए 24 घंटे बीत चुके थे। सूरज डूब चुका था और हिमालय की रात अपनी क्रूरता के साथ उतर आई थी। तापमान इतना गिर चुका था कि आर्यन की पलकों पर बर्फ जम गई थी।
योगी अभी भी उसी मुद्रा में बैठे थे, बिल्कुल पत्थर की मूर्ति की तरह। उन्होंने न तो कुछ खाया था, न पानी पिया था, और न ही एक इंच हिले थे। आर्यन उन्हें देख-देखकर अपनी हिम्मत बनाए रखने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसका शरीर अब जवाब दे रहा था।
भूख अब पेट में आग की तरह जल रही थी और प्यास गले को काट रही थी। उसने मुट्ठी भर बर्फ उठाकर मुंह में डाली, लेकिन उससे प्यास बुझने की बजाय गला और छिल गया। उसका महंगा थर्मल सूट अब कागज जैसा पतला लग रहा था। ठंड हड्डियों के भीतर घुस चुकी थी, मज्जा (marrow) को जमा रही थी।
मन का खेल (Hallucinations) :9
दूसरी रात सबसे भयानक साबित हुई। जब शरीर टूटने लगता है, तो मन बागी हो जाता है। आर्यन को मतिभ्रम (Hallucinations) होने लगे।
अचानक, उसे बर्फीली हवा में गर्म कॉफी की खुशबू आने लगी। उसे अपनी माँ की आवाज़ सुनाई दी, "बेटा, घर आ जा, खाना तैयार है।"
उसने अपनी धुंधली आँखों से देखा—उसे लगा कि कुछ दूर एक अलाव (Bonfire) जल रहा है। उसका मन चीखा, "उठो! वहाँ आग है! जाओ खुद को गर्म करो!"
वह उठने के लिए आगे झुका, लेकिन गिर पड़ा। वहाँ कोई आग नहीं थी, सिर्फ चाँदनी में चमकती हुई ठंडी बर्फ थी।
उसका मन उसे कोसने लगा: "तुम बेवकूफ हो। तुम यहाँ ज्ञान के लिए नहीं, एक सनक के लिए मरने आए हो। वह बूढ़ा आदमी पागल है और तुम उससे भी बड़े पागल हो।"
आर्यन रोना चाहता था, लेकिन आँसू जम चुके थे। उसका अहंकार (Ego) अब अपनी आखिरी लड़ाई लड़ रहा था। वह अभी भी सोच रहा था कि वह अपनी 'इच्छाशक्ति' से जीत जाएगा।
'मैं' का टूटना (The Death of Ego) :
तीसरे दिन की सुबह तक, आर्यन अचेत अवस्था (Semi-conscious state) में पहुँच गया था। उसका शरीर नीला पड़ने लगा था। सांसें उखड़ रही थीं। उसे अब ठंड महसूस होना बंद हो गई थी—जो कि मौत का आखिरी संकेत होता है।
इस बेहोशी के आलम में, आर्यन के अंदर कुछ टूट गया।
उसकी जिद, उसका यह सोचना कि "मैं कुछ हासिल कर सकता हूँ," उसका यह मानना कि "मैं आर्यन हूँ, एक सफल आदमी"—सब कुछ बिखर गया।
उसे अपनी तुच्छता का अहसास हुआ। इन विशाल पहाड़ों के सामने वह धूल के कण से भी छोटा था। उसने योगी की ओर देखा। अब उसे योगी में कोई 'कठोर इंसान' नहीं दिख रहा था, बल्कि साक्षात प्रकृति दिख रही थी।
आर्यन के मन में अब कोई शिकायत नहीं थी, कोई मांग नहीं थी। उसने अपनी मुट्ठियाँ, जो अब तक कस कर बंद थीं, ढीली छोड़ दीं।
उसने मन ही मन कहा: "मैं हार गया। मेरा ज्ञान, मेरा पैसा, मेरी ताकत... सब बेकार है। मैं कुछ नहीं हूँ। शून्य हूँ।"
यह हार नहीं थी, यह समर्पण (Surrender) था। उसने मौत को स्वीकार कर लिया। उसने अपनी आखिरी सांस ली और अपनी आँखें बंद कर लीं, पूरी तरह से तैयार कि अब वे कभी नहीं खुलेंगी।
स्पर्श और पुनर्जन्म :
जैसे ही आर्यन ने जीवन की डोर छोड़ी, गुफा के मुहाने पर हलचल हुई।
तीन दिन से स्थिर बैठे योगी ने अपनी समाधि तोड़ी। वे अपनी जगह से उठे। उनके चलने से बर्फ पर कोई आवाज नहीं हुई।
वे आर्यन के पास आए, जो अब लगभग एक लाश में तब्दील हो चुका था। योगी ने झुककर आर्यन के सिर पर अपना दाहिना हाथ रखा।
वह स्पर्श साधारण नहीं था।
आर्यन को लगा जैसे उसके सिर के ऊपर किसी ने बिजली का नंगा तार रख दिया हो। एक प्रचंड ऊर्जा (Energy) उसके रीढ़ की हड्डी से होती हुई पूरे शरीर में दौड़ गई। वह गर्मी किसी आग की नहीं, बल्कि प्राण-शक्ति की थी।
आर्यन के रुके हुए दिल ने जोर से धड़कना शुरू किया। फेफड़ों ने हवा को अंदर खींचा। जमी हुई नसें खुल गईं। वह एक झटके के साथ होश में आया, जैसे कोई गहरे पानी से बाहर निकला हो।
उसने आँखें खोलीं। सामने योगी का चेहरा था। लेकिन अब उन आँखों में तिरस्कार नहीं था। वहाँ एक हल्की सी करुणा थी, जैसे एक पिता अपने बच्चे को देख रहा हो जिसने अभी-अभी चलना सीखा है।
योगी मुस्कुराए नहीं, बस इतना बोले:
"पात्र जब तक भरा होता है, उसमें अमृत नहीं डाला जा सकता। तुमने अपने 'मैं' को खाली कर दिया। अब तुम सीखने के लिए तैयार हो।"
योगी ने अपनी कमंडल से थोड़ा सा पानी आर्यन के होंठों पर लगाया। वह पानी आर्यन को अमृत जैसा लगा।
"उठो," योगी ने आदेश दिया। "दीक्षा का समय हो गया है।"
आर्यन, जो एक मिनट पहले मरने वाला था, अब एक नई ऊर्जा के साथ खड़ा हो गया। पुराना आर्यन मर चुका था, और एक शिष्य का जन्म हो चुका था।
दीक्षा - शून्य का नाद
गुफा के भीतर का ब्रह्मांड :
योगी आर्यन को लेकर गुफा के अंदर गए। बाहर जहां जानलेवा ठंड थी, गुफा के अंदर का तापमान आश्चर्यजनक रूप से सामान्य था। वहां कोई आग नहीं जल रही थी, फिर भी एक गुनगुनी गर्मी थी। गुफा खाली थी—न कोई मूर्ति, न कोई पूजा का सामान, सिर्फ एक बाघंबर (Tiger skin) और पानी का एक कमंडल।
लेकिन आर्यन को महसूस हुआ कि यह गुफा खाली नहीं है। यहाँ हवा 'भारी' थी। ऐसा लग रहा था मानो हजारों वर्षों के मंत्र और मौन यहाँ की दीवारों में समाए हुए हैं।
योगी बैठ गए और आर्यन को अपने सामने बैठने का इशारा किया।
"अब तक तुमने अपनी आँखों से दुनिया देखी," योगी बोले, "अब वह देखो जो आँखों से नहीं दिखता।"
'मैं' से परे की यात्रा (Who am I?) :
योगी ने आर्यन की आँखों में झाँका और पूछा, "तुम कौन हो?"
आर्यन ने जवाब देने के लिए मुंह खोला, "मैं आर्यन..."
योगी ने उसे बीच में ही रोक दिया। "यह तुम्हारा नाम है। तुम कौन हो?"
आर्यन: "मैं एक यात्री हूँ... एक इंसान..."
योगी: "यह तुम्हारे शरीर की पहचान है। शरीर तो बाहर बर्फ में मरने वाला था। क्या तुम वह शरीर हो?"
आर्यन चुप हो गया। उसके पास जवाब नहीं था।
योगी ने समझाया: "जिस ठंड ने तुम्हारे शरीर को तड़पाया, उसे जानने वाला कौन था? जब तुम्हारा मन डर रहा था, तब उस डर को देखने वाला कौन था? तुम वो 'देखने वाले' (The Observer) हो, जो न कभी पैदा हुआ, न कभी मरेगा।"
तीसरा नेत्र (The Divine Sight) :
योगी ने अपना अंगूठा आर्यन के माथे के बीचों-बीच (आज्ञा चक्र) पर रखा।
उस स्पर्श के साथ ही आर्यन का भौतिक संसार गायब हो गया।
अचानक, उसे अपनी बंद आँखों के सामने अंधेरा नहीं, बल्कि प्रकाश का विस्फोट दिखाई दिया।
उसे अपना शरीर अब मांस और हड्डियों का नहीं, बल्कि ऊर्जा के कणों (Energy particles) का बना हुआ महसूस होने लगा। उसने देखा कि जिस चट्टान पर वह बैठा है और उसका अपना हाथ—दोनों एक ही ऊर्जा से बने हैं। कोई भेद नहीं था।
उसे महसूस हुआ कि हिमालय उसके बाहर नहीं, उसके अंदर है। वह बहती हवा, वो दूर चमकते तारे, वो सब उसके भीतर घूम रहे थे। उसे पहली बार समझ आया कि 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्मांड हूँ) का मतलब क्या है। यह कोई दर्शनशास्त्र नहीं था, यह एक प्रत्यक्ष अनुभव था।
अनाहत नाद (The Sound of Silence) :
योगी ने कहा, "सुनो। उस आवाज को सुनो जो कभी पैदा नहीं हुई।"
आर्यन ने ध्यान लगाया। पहले उसे सिर्फ अपने दिल की धड़कन सुनाई दी। फिर उसे अपने खून के बहने की आवाज आई।
और फिर... उसे वह सुनाई दिया जिसे योगी 'शून्य का नाद' कहते थे।
यह 'ओम' की ध्वनि थी, लेकिन किसी के बोलने से पैदा नहीं हुई थी। यह एक निरंतर गूंज (Humming sound) थी जो पूरे अस्तित्व में व्याप्त थी।
इस आवाज ने आर्यन के मन के बचे-खुचे विचारों को भी धो डाला। वह एक ऐसी शांति में डूब गया जहाँ समय का कोई अस्तित्व नहीं था। उसे नहीं पता चला कि वह वहां एक घंटा बैठा रहा या एक दिन।
वापसी की तैयारी :
जब आर्यन समाधि से बाहर आया, तो उसकी आँखें बदल चुकी थीं। उनमें अब जिज्ञासा की चंचलता नहीं, बल्कि समुद्र जैसा ठहराव था।
वह समझ गया था कि जिसे वह पूरी दुनिया में ढूंढ रहा था—वह 'शांति' किसी जगह पर नहीं, बल्कि उसके अपने भीतर के 'शून्य' में थी।
योगी ने उसे देखा और मुस्कुराए। यह मुस्कान विदाई की थी।
"घड़ा भर गया है," योगी ने कहा। "सत्य को जान लेना ही काफी नहीं है, आर्यन। सत्य को जीना पड़ता है। अब तुम्हें नीचे जाना होगा।"
आर्यन का मन हुआ कि वह हमेशा के लिए वहीं रह जाए। उसने कहा, "मुझे उस दुनिया में वापस नहीं जाना। वहां सिर्फ शोर और झूठ है।"
योगी ने कठोरता से कहा, "भागना कायरता है। हिमालय पर बैठकर शांत रहना आसान है। असली योगी वह है जो बाजार के शोर के बीच भी अपने भीतर के हिमालय को बचाए रखे। जाओ, और दुनिया में रहकर भी दुनिया से मुक्त रहो।"
आर्यन ने योगी के चरण स्पर्श किए। योगी ने उसे कोई मंत्र या ताबीज नहीं दिया, बस एक दृष्टि दी—हर चीज में ईश्वर को देखने की दृष्टि।
वापसी - संसार में सन्यासी
उतरती हुई ढलान :
हिमालय से नीचे उतरना चढ़ने से भी ज्यादा मुश्किल लग रहा था, लेकिन थकान के कारण नहीं। आर्यन का शरीर, जो हफ्तों पहले एक मजबूत जिम-बॉडी (Gym body) था, अब कमजोर हो चुका था। उसकी दाढ़ी बढ़ गई थी, चेहरे की त्वचा फट गई थी। लेकिन उसकी चाल में एक अजीब सा हल्कापन था, जैसे वह जमीन पर नहीं, हवा में चल रहा हो।
जब वह गंगोत्री वापस पहुँचा, तो वही दुनिया उसका इंतज़ार कर रही थी—पर्यटकों का शोर, घंटियों की आवाज़, और दूकानदारों की चिल्लाहट।
पहले यह शोर उसे सिरदर्द देता था। लेकिन आज, उसे इस शोर में भी वही 'शून्य' सुनाई दे रहा था जो उसने गुफा में सुना था। उसे हर आवाज़, हर चिल्लाहट उसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा का हिस्सा लग रही थी।
भीड़ में अकेला :
आर्यन वापस शहर (दिल्ली/मुंबई) लौट आया। उसने अपनी कंपनी दोबारा शुरू नहीं की, न ही वह जंगल में भागा। उसने एक साधारण जीवन चुना।
उसके पुराने दोस्त उसे देखकर हैरान थे।
"तुम बदल गए हो, आर्यन," वे कहते। "तुम अब किसी बहस में नहीं पड़ते? तुम्हें अब ट्रैफिक में गुस्सा नहीं आता? तुम्हें अब पैसे कमाने की होड़ नहीं है?"
आर्यन सिर्फ मुस्कुरा देता। वह उन्हें कैसे समझाता कि जिसे 'गुस्सा' आता था, वो आर्यन तो हिमालय की बर्फ में मर चुका है। अब जो वापस आया है, वह सिर्फ एक साक्षी (Witness) है।
वह काम करता था, लेकिन परिणाम की चिंता किए बिना। वह खाता था, लेकिन स्वाद के लालच के बिना। वह लोगों के बीच रहता था, उनसे बात करता था, हंसी-मजाक भी करता था, लेकिन उसकी आँखों में झांकने पर लोगों को एक अथाह गहराई दिखाई देती थी—जैसे कोई गहरा कुआं हो।
'कीचड़ में कमल' :
एक शाम, एक पुरानी पार्टी में, उसका एक पुराना बिजनेस पार्टनर उसके पास आया। वह बहुत तनाव में था।
"आर्यन, मेरा बिजनेस डूब रहा है, मेरी पत्नी मुझे छोड़कर जा रही है। मैं क्या करूँ? मुझे भी तुम्हारे वाले हिमालय पर जाना है। मुझे उस बाबा का पता बताओ।"
आर्यन ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ पानी का गिलास उठाया और शांत स्वर में कहा:
"हिमालय कोई जगह (GPS Location) नहीं है, मेरे दोस्त। हिमालय एक अवस्था (State of Mind) है।"
उसने अपने दोस्त के कंधे पर हाथ रखा। उस स्पर्श में वही शांति थी जो योगी के स्पर्श में थी।
"अगर तुम अपनी बेचैनी को अपने साथ लेकर पहाड़ पर जाओगे, तो वहां भी तुम्हें बेचैनी ही मिलेगी। और अगर तुम अपने भीतर के शोर को शांत कर लो, तो यह शोर-शराबे वाली पार्टी भी तपोवन बन जाएगी।"
उस दिन, आर्यन ने वही किया जो योगी ने उसके साथ किया था—बिना उपदेश दिए, सिर्फ अपनी मौजूदगी (Presence) से सामने वाले को शांत कर दिया।
अंतिम सत्य :
कहानी के अंत में, आर्यन अपने छोटे से अपार्टमेंट की बालकनी पर खड़ा है। नीचे शहर की गाड़ियों का शोर है, ऊपर तारों भरा आसमान है।
वह अपनी जेब से एक पुरानी, सूखी हुई 'भोजपत्र' की पत्ती निकालता है जो वह उस गुफा से लाया था। वह उसे देखता है और हवा में छोड़ देता है। पत्ती हवा में लहराते हुए नीचे गिर जाती है।
उसे अब किसी याद की, किसी निशानी की जरूरत नहीं है।
उसने महसूस किया कि वह योगी उससे दूर नहीं है। वह योगी अब आर्यन के अंदर सांस ले रहा है।