Inteqam - 30 in Hindi Love Stories by Mamta Meena books and stories PDF | इंतेक़ाम - भाग 30

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इंतेक़ाम - भाग 30

अब तो विजय उसकी मां भी उसके पास नहीं थी जिससे दो शब्द बोल कर वह अपना दुख बांट सकें उधर विजय की मां भी अकेले रहकर बहुत दुखी थी,,,

अब उसकी तबीयत अक्सर खराब रहती थी, लेकिन उसे संभालने वाला कोई नहीं था,,,,

अब उसे निशा की बहुत याद आती थी उसे महसूस होने लग गया था कि जिंदगी में पैसा ही सब कुछ नहीं होता कभी-कभी अपनापन भी जीने के लिए जरूरी हो जाता है, लेकिन अब क्या करें क्योंकि वह जानती थी कि रोमी तो विजय को वापस आने नहीं देगी और निशा और उसके बच्चों का अभी तक उसे कुछ भी पता नहीं था क्योंकि विजय ने भी अपनी मां को सब निशा के बारे में कुछ नहीं बताया था,,,,,

वही दूसरे दिन विजय को ऑफिस जाना पड़ा क्योंकि कहीं दिन से ऑफिस ना जाने की वजह से ऑफिस जाना उसके लिए जरूरी था,,,,

ऑफिस जाकर विजय शाम को निशा से मिलने न जाकर अपने बच्चों की स्कूल का पता लगाकर उनके स्कूल उनसे मिलने पहुंच गया,,,,,,

स्कूल के बच्चों की जब छुट्टी हुई तो उसके बच्चे बाहर आए विजय अपने बच्चों को ढूंढता, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने बच्चों को कैसे ढूंढेगा अब इन 4 सालों में तो उसके बच्चे काफी बड़े हो गए होंगे वह उन्हें पहचाने का कैसे अगर उसने उन्हें पहचान भी लिया तो पता नहीं उसके बच्चे उसे पहचानेंगे या नहीं,,,,,

तभी उसे निशा और सुनील दत्त दिखाई दिए सुनील दत्त के दोनों बेटे भी उसी स्कूल में पढ़ते थे, जिसमें निशा के और सन्नू के बच्चे पढ़ते थे और आज एक साथ मीटिंग से वापस आते वक्त सुनील दत्त और निशा ने अपने बच्चों को एक साथ स्कूल से ले जाने के बारे में सोचा,,,,

सुनील दत्त और निशा को एक साथ देख कर विजय फिर से अंदर ही अंदर टूट गया,,,

तभी उसके बच्चे दौड़कर निशा के जाकर लिपट गए अपने बच्चों को देखकर विजय की आंखों में आंसू झलक आए,,,

वह अपने आप से ही बातें करने लगा कि उसकी गुनगुन बिटिया कितनी बड़ी हो गई है और दीपू वह वह तो बहुत बड़ा हो गया है वह तो उन दोनों को पहचान ही नहीं पाया था,,,

दोनों बच्चे सुनील दत्त के बच्चों से अच्छे से बातें कर रहे थे, वही सुनील दत्त के बच्चे भी निशा से अच्छे से बातें कर मिल रहे थे सन्नो का बेटा भी उनके साथ था,,,,

फिर सभी एक साथ गाड़ी में बैठे और वहां से चल दिए, विजय उन्हें वहां से जाते हुए देखता रहा,,,,

फिर विजय पास ही एक बेंच पर बैठ गया उसकी आंखों से आंसू बहने लगे वह अपने बच्चों को लेकर अपने आप से ही बातें करने लगा कि उसके बच्चे कितने बड़े हो गए हैं पता नहीं बे उसे जानते हैं या नहीं, भूल गए होंगे जब बे उसके पास से आए थे तब तो वे कितने छोटे थे,,,,

वह अपने आप को मन ही मन धिक्कार रहा कि वह कैसा पिता है जो अपने बच्चों को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर कर दिया,   

निशा तो महान है एक देवी है जिसने ठोकरें खाते हुए भी अपने बच्चों की जिंदगी सवार दी ,वह न एक अच्छा पति बन सका और ना ही एक अच्छा पिता उसके जीने पर धिक्कार है,,,,

वह देर तक अपने आप से बातें करता रहा रात होने को आई तो स्कूल के चौकीदार ने आकर उससे कहा रात को यहां बेंच पर रुकना अलाउ नहीं है इसलिए आप अपने घर जाओ,,,,

चौकीदार की बातें सुनकर विजय अपने ख्यालों से बाहर आया और वह वापस घर आ गया,,,,

उसे चिंता में डूबे देखकर रोमी ने कहा क्या हुआ और कहां थे इतनी देर से मैंने ऑफिस फोन कर पूछा था,,,

यह सुनकर विजय ने कहा कुछ नहीं बस थोड़ी तबीयत ठीक नहीं है इसलिए थोड़ा बाहर टेलने चला गया,,,,

यह कहकर वह कमरे में जाकर सो गया रोमी उसे जाते हुए देखती रही,,,,