जब निशा अपना ऑफिस का काम खत्म कर बाहर आई तो उसकी नजर बाहर बैठे विजय पर पड़ी, लेकिन उसने अपनी नजर गुस्से से दूसरी तरफ कर ली और अपने फोन पर बात करते हुए वहां से चल दी,,,,,
विजय ने जब निशा को जाते हुए देखा तो निशा को आवाज लगाई लेकिन निशा ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा और गाड़ी में बैठ कर चली गई,,,,
विजय बेबस लाचार उसे देखता रह गया और व वापस घर आ गया उसे अब बस निशा की याद सताए जा रही थी, अब ना उसका खाने पीने में मन लगता और ना कुछ काम में वह अकेले में रो पड़ता कि उसने अपने ही हाथों से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है,,,
अब उसे एहसास होने लगा कि जब कोई अपना नजर अंदाज करता है तो कितनी तकलीफ होती है जब उसने निशा के साथ यह सब कुछ किया था तो निशा को कितनी तकलीफ हुई होगी,,,,
उसने एक बार भी यह है क्यों नहीं सोचा कि निशा को उसकी जरूरत है कितनी बार निशा ने उससे अपने प्यार का इजहार किया, उस का साथ पाना चाहा लेकिन वह तो धन के लालच में इतना अंधा हो चुका था कि उसे निशा की खुशियों से कोई लेना-देना नहीं था,,,,
सच कहती थी निशा की खुशियां पैसों से नहीं अपनेपन से खरीदी जाती है, आज उसे यह एहसास हो चुका था आज वह अपने आपको निशा की जगह महसूस कर रहा था उसे आज निशा का दर्द महसूस हो रहा था जैसे तैसे उसकी रात कटी और वह फिर निशा से मिलने के लिए चल दिया,,,,,
वह सारा दिन इंतजार करता रहा लेकिन निशा ने उसे अंदर मिलने नहीं बुलाया,,,,,
शाम को जब निशा ऑफिस से बाहर निकली और सीधी अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गई विजय उसे आवाज देता, तभी विजय ने देखा कि एक आदमी आया और निशा उसके साथ हंसते बोलते हुए गाड़ी में बैठकर निकल गई,,,,,
यह देखकर विजय के पैरों तले जमीन खिसक गई और वह सोचने लगा की रोमी की बात कहीं सच तो नहीं है कहीं निशा ने उसे भूल कर किसी और से शादी तो नहीं कर ली,,, नहीं नहीं,,, ऐसा नहीं हो सकता निशा ऐसा नहीं कर सकती,,,
तभी उसने वहां चौकीदार से पूछा कि जो यह निशा मैम के साथ आदमी है यह कौन है चौकीदार ने कहा कि यह सुनील दत्त साहब है,,,,
निशा को सुनील दत्त के साथ जाते देखकर विजय सोचने लगा कि कहीं निशा ने सुनील दत्त से शादी तो नहीं कर ली, इसलिए वह जानबूझकर उसे पहचानने से इंकार कर रही है ,,,,
विजय को निशा और सुनील दत्त के भाई बहन के रिश्ते के बारे में कुछ भी पता नहीं था और उस वक्त भी निशा और सुनील दत्त एक साथ किसी इंपॉर्टेंट मीटिंग में गए हुए थे,,,,
विजय बोझिल कदमों से वापस घर आ गया ,बार-बार उसे निशा का उस आदमी सुनील दत्त के साथ हंसना बातें करना याद आ रहा था, फिर उसके साथ बैठकर गाड़ी में जाना उसे अंदर ही अंदर हिला कर रख देता और वह अकेले कमरे में बंद होकर अपने आप से सवाल करता नहीं,,, नहीं ,,,,निशा ऐसा नहीं कर सकती है,,, ऐसे कैसे मुझे भुला सकती है,,,
फिर उसकी आत्मा ही उससे कहती की क्यों नहीं कर सकती तुमने भी तो निशा के साथ गलत ही किया था अपने बच्चों और निशा के बारे में ना सोचकर तुमने भी तो धन के लालच में अंधे होकर रोमी से विवाह कर लिया था,,,
एक बार सोचा तुमने निशा और उसके बच्चों के बारे में क्या गुजरी होगी उस वक्त निशा पर, जब उसके पति ने उसकी ही मांग का सिंदूर किसी दूसरी औरत की मांग में भर दिया था,,,
जब तुम अपनी जिंदगी का फैसला किसी और के साथ जीने के लिए कर सकते हो तो फिर निशा क्यों नहीं,,,,
क्या निशा का कोई अधिकार नहीं है वह किसी और से विवाह पर अपनी बाकी की जिंदगी हंसी खुशी नहीं गुजार सकती,,,,
अगर मर्द करे तो यह उसका हक है लेकिन औरत करें तो यह गलत है,,, क्या गलत किया है निशा ने कुछ भी तो नहीं गलत किया,,,,
उसकी आत्मा उससे पूछती और विजय अपने दोनों कानों पर हाथ लगाकर जोर जोर से चिल्ला कर रो पड़ता,,,,
आज उसका मन कर रहा था कि रहे आज कहीं जाकर मर जाए,,,,
आज उसे महसूस हो रहा था कि जब हम अपने प्यार को किसी और के साथ देखते हैं तो हमें कैसा महसूस होता है वह सारी रोता रहा लेकिन रोमी तो अपनी किसी नाइट पार्टी में गई हुई थी उसे नहीं पता था कि विजय क्या करता है और क्या नहीं और निशा के पिता वह तो अधिकतर अपने कारोबार के सिलसिले में बाहर रहते थे इसलिए पूरा घर विजय को खाने को दौड़ता था,,,,