Andheri Gufa - 7 in Hindi Horror Stories by Wow Mission successful books and stories PDF | अंधेरी गुफा - 7

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अंधेरी गुफा - 7

अंधेरी गुफ़ा – भाग 7 : सिसकियों की गूंज (पूर्ण संस्करण)
रात फिर से उतर आई थी।
गाँव पर वही सन्नाटा छाया था, जैसे सब कुछ किसी अनदेखे डर के नीचे दबा हो।
मंदिर की दीवार पर जो शब्द “वह लौट आई है” उभरे थे, अब पूरी तरह मिट चुके थे।
पर हवा में अब भी वही नमी थी — और वही गंध, जैसे किसी जले हुए फूल की।
ललिता उस रात के बाद से कहीं दिखाई नहीं दी।
लोग कहते थे, वह गुफ़ा में चली गई थी और कभी वापस नहीं लौटी।
पर हर अमावस की रात, मंदिर के पीछे से किसी औरत की धीमी सिसकियाँ सुनाई देती थीं।
गाँव के बच्चे उस ओर जाना तो दूर, नाम तक लेना नहीं चाहते थे।
उस रात चौकीदार गोविन्द की बारी थी पहरा देने की।
हवा में अजीब सर्दी थी।
उसने अपनी लालटेन संभाली और मंदिर के चारों ओर चक्कर लगाने लगा।
चारों तरफ अंधेरा, और बस झींगुरों की आवाज़।
अचानक उसे लगा जैसे किसी ने बहुत पास से उसका नाम पुकारा —
“गोविन्द…”
वह चौंक गया।
पीछे देखा — कोई नहीं।
कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि फिर वही आवाज़ आई —
“गोविन्द… मेरी मदद करो…”
इस बार आवाज़ इतनी पास थी कि उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
आवाज़ मंदिर के पीछे की ओर से आ रही थी — वही रास्ता जो गुफ़ा तक जाता था।
गोविन्द की सांसें तेज़ हो गईं।
उसने खुद को समझाया — “शायद कोई मज़ाक कर रहा है…”
लेकिन उस आवाज़ में जो दर्द था, वो किसी इंसान का नहीं लग रहा था।
वह हिम्मत करके आगे बढ़ा।
मंदिर के पीछे मिट्टी गीली थी, जैसे किसी ने अभी-अभी वहाँ कदम रखे हों।
ठंडी हवा चली और उसकी लालटेन झपकी — और बुझ गई।
चारों ओर अंधेरा छा गया।
अब उसे कुछ और सुनाई दिया —
सिसकियों के बीच किसी के चलने की आवाज़… धीरे-धीरे…
“कौन है वहाँ?” गोविन्द ने पुकारा।
पहले सन्नाटा…
फिर वही नाम —
“ललिता…”
गोविन्द के पाँव जैसे ज़मीन में धँस गए।
“ललिता? तुम… तुम ज़िंदा हो?”
कोई जवाब नहीं।
बस गुफ़ा की गहराई से एक ठंडी हवा निकली और उसके साथ आई एक धीमी हँसी।
“ज़िंदा… या ज़िंदा से भी ज़्यादा जागती हुई…”
गोविन्द का पूरा शरीर काँप गया।
उसने लालटेन जलाने की कोशिश की, पर माचिस की तीली खुद-ब-खुद बुझ गई।
अचानक उसे पीछे से किसी के पाँवों की आहट सुनाई दी।
वह पलटा —
गुफ़ा के द्वार पर ललिता खड़ी थी।
उसकी आँखें लाल चमक रही थीं, चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसके होंठों से एक हल्की हँसी फूट रही थी।
उसके पाँव ज़मीन को छू नहीं रहे थे — वह जैसे हवा में तैर रही थी।
“तुमने मुझे पुकारा क्यों?” उसने धीमे स्वर में कहा।
गोविन्द काँपते हुए बोला, “मैंने… मैंने कुछ नहीं किया…”
ललिता उसके करीब आई।
हवा में एक ठंडक फैल गई, जैसे किसी ने आसपास की गर्मी चूस ली हो।
वह फुसफुसाई —
“झूठ बोलना यहाँ की मिट्टी बर्दाश्त नहीं करती…”
उसने हाथ बढ़ाया — गोविन्द की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
वह चिल्लाया, पर आवाज़ उसके गले में ही अटक गई।
सुबह जब गाँववाले मंदिर पहुँचे,
गोविन्द ज़मीन पर पड़ा था — सांस चल रही थी पर आँखें खाली थीं।
उसकी हथेली में खून से लिखा था — “सत्य।”
गाँव में दहशत फैल गई।
बुज़ुर्गों ने कहा, “अब गुफ़ा ने जागना शुरू कर दिया है।”
किसी ने पहली बार गुफ़ा से एक औरत की नहीं, बल्कि बच्चे की हँसी सुनी।
मंदिर की घंटी अपने आप बजी।
दीवार पर फिर से शब्द उभरे —
“वह अब अकेली नहीं है…”
लोगों में खलबली मच गई।
कहा गया कि ललिता के साथ अब कोई और आत्मा भी है — शायद वह बच्चा जिसकी मौत गुफ़ा में सालों पहले हुई थी।
कुछ बुज़ुर्गों को याद आया कि दशकों पहले एक औरत अपने बच्चे के साथ उसी गुफ़ा में गई थी… और वापस कभी नहीं लौटी थी।
वह औरत भी “ललिता” ही थी।
क्या ये वही आत्मा थी?
या कोई और ताक़त जो उसकी शक्ल लेकर लौटी थी?
उस रात गाँव के प्रधान ने कहा —
“अब कोई उस रास्ते पर नहीं जाएगा। जो गया… वो लौटकर नहीं आएगा।”
लेकिन एक युवक था, नाम अर्जुन, जो सच्चाई जानना चाहता था।
वह बोला, “अगर डर से भागे तो ये गाँव हमेशा शापित रहेगा।”
उसने तय किया कि अगली रात वह खुद गुफ़ा में जाएगा।
गाँववालों ने रोका, पर अर्जुन नहीं माना।
रात होते ही वह लालटेन और एक छोटी मूर्ति लेकर निकला।
हवा फिर ठंडी थी, जैसे किसी ने पहले से उसे महसूस कर लिया हो।
जैसे ही वह गुफ़ा के द्वार के पास पहुँचा,
ज़मीन हल्की सी काँप गई।
दीवार पर वही शब्द झिलमिलाए —
“सत्य को जानने वाला कभी लौटता नहीं…”
अर्जुन ने गहरी सांस ली और कहा —
“फिर भी मैं जाऊँगा।”
उसने पहला कदम अंदर रखा…
गुफ़ा के भीतर अंधेरा नहीं था — वहाँ नीली रोशनी थी, जो खुद चट्टानों से निकल रही थी।
कहीं दूर वही सिसकियाँ गूँज रही थीं, पर अब वे औरत की नहीं, दो लोगों की थीं — एक औरत और एक बच्चा।
अर्जुन का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
वह बोला, “ललिता… अगर तुम हो तो सामने आओ…”
गुफ़ा की गहराई से एक आवाज़ आई —
“तुम देर से आए… अब रास्ता बंद हो चुका है…”
अचानक उसके पीछे पत्थर गिरने की आवाज़ आई —
गुफ़ा का मुँह बंद हो गया।
और अर्जुन के हाथ में लालटेन अपने आप बुझ गई।
सिर्फ एक हल्की हँसी गूँजी —
“अब वह अकेली नहीं है…”
🕯️ भाग 8 में जारी रहेगा…
जहाँ अर्जुन पहली बार गुफ़ा की सच्चाई देखेगा — और जानेगा कि ललिता इंसान थी… या किसी प्राचीन बलि की आत्मा 💀🌑