रिद्धान वहाँ से निकल गया और उस रेट्रो पब में पहुँच गया।
इधर प्रकृति भी अपने घर पहुँच चुकी थी…
दुखी, रोती हुई, बिस्तर पर बैठी।
रिद्धान उस वकील से कह रहा था—
“तो बताओ हम इस केस को कैसे री-ओपन करा सकते हैं?”
वकील ने गहरी साँस लेकर कहा—
“देखो रिद्धान, तुम मेरे दोस्त हो इसीलिए फिर से बता रहा हूँ… इस केस को री-ओपन कराने के लिए मज़बूत सबूत चाहिए।”
रिद्धान ने झुंझलाकर जवाब दिया—
“तो मैं तुम्हें सबूत दे तो रहा हूँ! ये लड़की आख़िरी बार मिली थी मेरी बहन से… और उसके बाद ही उसने सुसाइड अटेम्प्ट किया था।”
वकील ने सिर हिलाते हुए कहा—
“इतने से काम नहीं चलेगा। तुम्हें याद है ना, उस वक़्त कॉलेज की लड़कियों ने कहा था कि रिद्धि किसी लड़की की तरह बनने की कोशिश कर रही थी… उसके जैसे कपड़े और आदतें अपनाने लगी थी। समझ रहे हो इस बात की गंभीरता को?”
रिद्धान की आँखों में आग भर गई—
“तो मैं तुम्हें फीस किसलिए दे रहा हूँ?”
वकील ने गंभीरता से कहा—
“रिद्धान, तुम इस केस के पीछे पागल हो चुके हो। क्या तुमने सोचा है कि अगर उसी लड़की ने उल्टा कम्प्लेंट कर दी कि रिद्धि उसे स्टॉक कर रही थी… या उसकी मानसिक हालत ठीक नहीं थी… तो? अगर ये टॉपिक कोर्ट में आ गया तो जो थोड़ी-बहुत उम्मीद बची है रिद्धि को इंसाफ़ मिलने की… वो भी ख़त्म हो जाएगी। समझो!”
ये कहकर वकील उठ खड़ा हुआ।
जाते-जाते उसने रिद्धान की आँखों में सीधे देखते हुए कहा—
“हो सके तो दिल की जगह दिमाग़ से सोचो… शायद कुछ और रास्ता मिल जाए।”
और वो चला गया।
रिद्धान ने ग़ुस्से से दाँत भींचे और ज़ोर से अपना हाथ टेबल पर मारा।
ग्लास हिलकर गिर पड़ा और शराब फर्श पर बिखर गई।
उसकी साँसें भारी हो चुकी थीं।
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दूसरी तरफ़, प्रकृति अपने घर पर…
सोचों के जाल में उलझी हुई थी।
"ये सब रिद्धि के साथ कैसे हुआ…?
और रिद्धान का मेरे लिए ऐसा बर्ताव क्यों है…?
कभी हद से ज़्यादा ख्याल रखने वाला…
वो उन पलो को याद करने लगी (बेसमेंट में उसका रुमाल देना।। उसको बाहों में लेकर हॉस्पिटल जाना, उसके लिए गुंडों को पागलों की तरह मरना.....
और कभी एकदम जानवर…”
क्या तुम हमेशा ऐसे ही नहीं रह सकते ???? तुम्हारी दिक्कत क्या ? तुम मुझसे चाहते क्या हो?
उसने अपने दोनों हाथों से सिर थाम लिया।
आँखें बंद करके वही सोचती रही—
"क्या रिद्धि और रिद्धान की इस कहानी में मेरा भी कोई हिस्सा है…?"
उसके माथे पर बल थे, और दिल में बेचैनी।
तभी अचानक उसका फ़ोन बज उठा।
स्क्रीन पर नाम चमका— Mr. Raghuvanshi।
उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।
उसने हैरानी से खुद से कहा—
“ये मुझे क्यों कॉल कर रहे हैं? ऑफिस में कहने के लिए क्या बच गया था… जो अब कसार पूरी करनी है?”
फ़ोन लगातार बज रहा था।
उसने दाँत भींचते हुए कहा—
“नहीं… मैं नहीं उठाऊँगी… बिल्कुल नहीं उठाऊँगी।”
कॉल कट गया।
उसने चैन की साँस ली।
“आया बड़ा… अब क्यों कॉल कर रहे हैं…”
लेकिन अगले ही पल, फिर से फ़ोन बज उठा।
स्क्रीन पर फिर वही नाम— Mr. Raghuvanshi।
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
हाथ काँपने लगे।
“उठाऊँ…? या ना उठाऊँ…?”
आख़िरकार उसने गहरी साँस ली और कॉल रिसीव कर लिया।
“Mr. Raghuvanshi… आप…”
पर उसकी बात पूरी होने से पहले ही सामने से किसी ने उसकी आवाज़ काट दी।
“आप प्रकृति बात कर रही हैं?”
“हाँ… लेकिन आप कौन?”
तब सामने से आवाज़ आई—
“आपके बॉयफ्रेंड यहाँ हमारे रेस्टोरेंट में हैं।
इन्होंने बहुत ज़्यादा पी रखी है…
और बार-बार सिर्फ़ आपका ही नाम ले रहे हैं।”
प्रकृति के हाथ से फ़ोन लगभग गिर ही गया।
“क्या...........?!” उसने हड़बड़ाकर कहा।
वो तुरंत उठ खड़ी हुई।
दुपट्टा सँभालते हुए दरवाज़े की ओर भागी।
“प्लीज़ एड्रेस भेजिए…
मैं अभी आती हूँ।”
उसके क़दम तेज़ थे…
चेहरे पर ग़ुस्से की झलक थी…
पर दिल के भीतर एक अजीब-सी बेचैनी…
हर धड़कन जैसे कह रही थी—
"ये आदमी चाहे कितना भी कठोर क्यों न लगे…
पर जब भी उसका नाम लेता है…
मेरे दिल की दीवारें टूट जाती हैं।"
उसकी आँखों में आँसू भी थे और हल्की-सी चमक भी…
जैसे ग़ुस्से और प्यार की जंग एक साथ चल रही हो।
वो बाहर निकलते वक़्त बुदबुदाई—
"रिद्धान… तुम क्यों बार-बार मुझे अपने पास खींच लेते हो…
जबकि मैं बार-बार खुद से वादा करती हूँ…
कि अब तुम्हारी तरफ़ मुड़कर भी नहीं देखूँगी।"
उसके कदमों की रफ़्तार बढ़ गई…
क्योंकि दिल तो उसी की तरफ़ भाग रहा था।
उसने कैब बुलाई ,ओर अंदर बैठ गई।। कार में बैठी बैठी वो सोच रही है की क्या क्यों कैसे.... ये सब चल क्या रहा है।
प्रकृति ने अपना फोन निकाला और कबीर को कॉल करने के लिए उसका नंबर डाला ।।।।
उसको समझ नहीं आ रहा कि कॉल करना चाहिए या नहीं!!!!
फाइनली उसने नंबर डायल कर दिया।।
फोन बज रहा है।।।।
पर नो रिस्पॉन्स।।।