Chandrvanshi - 10 - 10.2 in Hindi Thriller by yuvrajsinh Jadav books and stories PDF | चंद्रवंशी - अध्याय 10 - अंक - 10.2

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चंद्रवंशी - अध्याय 10 - अंक - 10.2


"रोम, तू यहाँ से चला जा," विनय अंदर आए रोम को रोकते हुए बोला।  
रोम, विनय, जीद, माहि, साइना और आराध्या तथा आदम, राहुल और उसके कुछ आदमी मंदिर के प्रांगण की दीवार में बने खजाने के द्वार पर खड़े थे। विनय रोम को समझा रहा था।  
"यहाँ से कहाँ जाऊँ! बाहर भी कालिया के ही लोग हैं और यहाँ मारने वाले भी हैं," रोम मुस्कराते हुए बोला।  
"तो बाहर कौन है?" विनय बोला।  
"श्रेय, रोमियो और अभी जो बोला वह," रोम जॉर्ज और श्रेया को नहीं जानता था इसलिए उन्हें अलग संबोधित करता बोला।  
रोम और विनय को दबाव में डालता आदम अपनी भाषा में बोला, "ज्यादा समय मत बर्बाद करो, जल्दी करो।"  
बाहर मंदिर में गिरे पत्थरों के साथ-साथ अंदर भी एक द्वार खुला था। वहाँ कई पत्थरों को जमाकर सीढ़ियाँ बनाई गई थीं, जिससे नीचे जाने का रास्ता दिख रहा था।  
रोम आदम को देख बोला, "जा, खजाना नीचे ही है, जाकर ले ले, निकल जा लुच्चे!" आदम को उसके सारे शब्द समझ नहीं आए।  
दीवार के अंदर रोम की आवाज की गूंज हो रही थी। यह सुनकर माहि और आराध्या हल्के से हँसने लगीं। तब आदम ने रोम को आगे जाने को कहा। रोम फिर बोला, "खजाना तुझे लेना है या मुझे?"  
उसकी बात सुन आदम के आदमी भी हँसे। उन्हें रोकने के लिए आदम ने पिस्तौल निकाली और ऊपर करके 'धड़ाम' की आवाज की। यह सुनकर सभी चुप हो गए। फिर विनय आगे बढ़ा।  
जैसे-जैसे अंदर गए वैसे-वैसे अंधेरा बढ़ने लगा। "आगे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा," विनय बोला।  
आदम ने अपने आदमियों से ऊपर जाकर मशाल (जलाने के लिए लकड़ी) लाने को कहा। ऊपर गए आदमियों ने जंगल में पड़ी लकड़ियाँ उठाईं। वहाँ मौजूद पंडितों की धोती और बाकी सबके कई कपड़े उतरवाए। उनके कपड़ों को लकड़ियों के साथ लपेटकर हवन कुण्ड के पास पड़ा घी उन पर डाल दिया और कुछ लकड़ियाँ आग के साथ नीचे लाए। एक मशाल विनय के हाथ में रखी।  
विनय और रोम दोनों को पहले अंदर भेजा।  
सीढ़ियाँ गोल थीं। जैसे-जैसे नीचे उतरते गए, दीवार पर कुछ ऐतिहासिक चित्र दिखाई देने लगे। विनय और रोम नीचे पहुँचे तो देखा कि सीढ़ियाँ समाप्त हो गई थीं। आगे सिर्फ दीवार थी।  
"लो, यहीं से रास्ता बंद हो गया। चलो वापस चलकर कहें उस गधे को," रोम ऊँचे स्वर में बोला। उसकी आवाज की गूंज ऊपर जा रही थी। आदम वह सुन रहा था।  
राहुल धीरे से आदम के पास आया और बोला, "मन करता है सारी गोलियाँ उतार दूँ उसके भेजे में।"  
"उतार देना, लेकिन अभी नहीं। पहले खजाना मिल जाए," आदम बोला।  
नीचे खड़े विनय ने रोम की बात न सुनते हुए मशाल उस दीवार पर घुमाई। दीवार पर संस्कृत भाषा में कुछ लिखा था।  
उसे पढ़ने के लिए विनय ने मशाल पास की और ध्यान से पढ़ा:  
"केवलं सः एव धनं प्राप्नोति। यः स्वजीवनं जनसेवायां समर्पयति।"  
फिर उसका गुजराती में अनुवाद करते हुए बोला, "धन मात्र उसे ही प्राप्त होता है जो अपने जीवन को जनसेवा में समर्पित कर दे।"  
"मतलब रहस्य के अंदर भी रहस्य," आश्चर्यचकित रोम बोला।  
कपार पर हाथ रखते हुए विनय बोला, "तुझे नहीं समझेगा।"  
विनय ने पूरी दीवार देख ली। वहाँ एक भी दरार या खांचा नहीं था जिससे लगे कि यहाँ भी कोई द्वार है। विनय की नजर दाईं ओर एक शस्त्र की नक्काशी पर पड़ी। वह एक ही कतरनी बाहर की ओर निकली हुई थी।  
उसे देखते ही विनय ने वहाँ हाथ लगाया और वह अंदर की ओर धकेली गई। जैसे ही वह अंदर गई, अंदर जाने का रास्ता खुलने लगा। उसके घर्षण की आवाज की गूंज हो रही थी।  
ऊपर खड़े आदम और उसके आदमियों के चेहरे पर शरारती मुस्कान छा गई।  
"सोना दिखाई दिया?" रोम बोला।  
विनय अंधेरे में भी उसकी बात सुनकर मशाल रोम के चेहरे के पास लाया और उसे देखने लगा। फिर बोला, "यह अभी पहला पड़ाव है।"  
"मतलब अभी इससे भी गहरा कुछ है?" रोम बोला।  
"हाँ! ऐसे पाँच पड़ाव अभी बाकी हैं," विनय बोला।  
"मुझे पहले बताया होता तो मैं आता ही नहीं," रोम बोला।  
"तुझे बताया था लेकिन तू माना ही नहीं," विनय बोला।  
"हाँ पर इसमें क्या, वह पड़ाव पढ़े हैं तो उसके सुझाव भी पढ़े होंगे न?" रोम बोला।  
"सुझाव अजीब हैं," विनय बोला।  
"कैसे?" रोम बोला।  
"पहले पड़ाव में लिखा था कि शस्त्र से अंधकार दूर होगा," विनय बोला।  
"दूसरे पड़ाव में क्या लिखा था?" रोम बोला।  
"अज्ञान और ज्ञान की समझ हो तभी आगे बढ़ना," विनय बोला।  
"चलो तो वापस," रोम बोला।  
उसकी बात सुनकर सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया आदम बोला, "कहाँ?"  
"अज्ञान और ज्ञान की समझ लेने," रोम बोला।  
यह सुनकर आराध्या हँस पड़ी। धीरे-धीरे सब हँसने लगे।  
रोम को यह पसंद नहीं आया तो वह विनय का हाथ पकड़ आगे बढ़ने लगा।  
अंदर जाते ही विनय ने उसे रोका और मशाल अंदर की। जैसे ही थोड़ा सा प्रकाश अंदर पड़ा कि सब कुछ एकदम से चमकने लगा। विनय और बाकी सबकी आँखें चुँधिया गईं।  
लेकिन माहि के चश्मे के अंदर प्रकाश उतना नहीं पहुँचा जितना बाकी सबकी आँखों में था।  
उसने देखा कि अंदर सब कुछ बदलने लगा था। नीचे की ज़मीन सर्पाकार होकर एक आदमी ही चल सके इतनी जगह थी और दोनों तरफ सात-आठ फीट गहरी खाई में धारदार भालों की नोकें दिखाई दे रही थीं।  
पर इतनी सारी चमक वहाँ से आ रही थी, जो किसी चमकीले पत्थर पर ऊपर की ओर लगाई गई हो ऐसा लग रहा था।  
आदम कई बार खड़े रहने के बाद अपने एक आदमी को आगे जाने को कहता है। माहि ने उसे रोकने की कोशिश की फिर भी आदम ने एक आदमी को आगे भेजा।  
वह आदमी आँखों पर हाथ रखकर आगे बढ़ा। थोड़ा आगे बढ़ा ही था कि उसका पैर फिसला और वह सीधा नीचे गिरा।  
सभी के कानों में उसकी चीख की गूंज सुनाई देने लगी।  
माहि ने देखा कि भालों की नोक उसके शरीर को आर-पार कर गई थी। यह देखकर वह भी काँप गई।  
आदम ने फिर एक और आदमी को भेजने को कहा। लेकिन इस बार माहि ने उसे रोक लिया और कहा, "सभी मेरे पीछे चलो।"  
माहि, साइना, आराध्या, जीद, विनय, रोम, आदम, राहुल और आदम के आदमी एक के बाद एक सर्पाकार पंक्ति में खड़े हो गए। सभी ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था ताकि कोई गिरे नहीं।  
माहि सबसे पहले दूसरी ओर पहुँची। वहाँ फिर एक और द्वार था, जहाँ अंजलि अंधेरे में बदल गई थी।  
फिर मशाल का प्रकाश धुंधली आँखों से देखने के लिए उपयोगी होने लगा।  
दूसरा पड़ाव सभी पार कर चुके थे। आराध्या और साइना पहले से ज़्यादा डरी हुई थीं।  
आदम के आदमी बच जाने से खुशी से फूले नहीं समा रहे थे।  
"बहुत खुश मत हो, अभी ऐसे चार पड़ाव और आएँगे और यह तुम्हारा आदम मरने से पहले तुम्हें ही भेजेगा,"  
आदम के आदमियों की खुशी देख न सकने वाला रोम बोला।  
लेकिन उन्हें गुजराती आती ही नहीं थी इसलिए उन्होंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।  
"दूसरे को मारूँ या न मारूँ, तुझे तो मैं मारकर ही रहूँगा," अपने आदमियों को उकसाते हुए रोम को देखकर आदम बोला।  
"पहले तू तो बच के दिखा, आया बड़ा सोना लेने वाला," रोम आदम को चिढ़ाते हुए बोला।  
"यह कैसा जीव है जिसे सरकार ने पुलिस में भर्ती किया है?" आदम बोला।  
"चुप... सब चुप हो जाओ," उन दोनों की बात में बाधा पड़ती देख विनय बोला।  
फिर विनय आगे बढ़ने का रास्ता खोजने लगा। उसने देखा कि सामने की दीवार पर कुछ लिखा था जिससे ही आगे बढ़ा जा सकता था।  
उसने नक्शा याद किया (पहले पड़ाव में अस्त्र से अंधकार दूर होगा। दूसरे में अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने की बात थी)।  
"अज्ञान से ज्ञान की ओर मतलब क्या होता है?" विनय बड़बड़ाया।  
उसकी बात सुनकर माहि बोली, "अपने अंदर के अंधकार से प्रकाश की ओर की यात्रा को ही ऋषि-मुनि ज्ञान की प्राप्ति मानते हैं।  
लेकिन यहाँ तो हमें समझ आया कि प्रकाश का मार्ग उलझनों से भरा होता है।  
इसलिए उसे पार करने के बाद ही ज्ञान की प्राप्ति होती है।"  
माहि की गहरी बात किसी को समझ नहीं आई।  
इसलिए, माहि ने उस दीवार पर एक पत्थर लेकर वही पूरी बात उकेर दी और तुरंत तीसरे पड़ाव का रास्ता खुलने लगा।  
"वाह, मेरी बहन तो ज्ञानी निकली," रोम बोला।  

***  

तीसरे चरण में पहुँचते ही सभी संगीत के नशे में डूबने लगे। मधुर संगीत इंसान के मन में विचारों को भी स्थिर कर देता है। इसलिए ही ऋषियों-मुनियों की कठिन तपस्या को भंग करने के लिए अप्सराएं संगीत गान करती थीं। परंतु उन सबमें भी एक निर्दयी आदम पर वह संगीत कोई असर नहीं कर रहा था। उसने जैसे ही आगे बढ़ने के लिए एक कदम बढ़ाया, तुरंत ही कान फाड़ देने वाला शोर गूंजने लगा। सभी एकदम से होश में आ गए। आदम की आंखें फटी की फटी रह गईं। बाकी सभी ने तुरंत अपने कानों पर हाथ रख लिए।  
अगर आगे न बढ़ें तो मधुर संगीत, और अगर आगे बढ़ें तो जानलेवा भयंकर शोर। इस नई मुसीबत का सामना करने के लिए साइना आगे आई। उसने कंप्यूटर के साथ-साथ संगीत की विद्या का भी थोड़ा अभ्यास किया था। इसलिए उसने उस मधुर संगीत को सुनकर सोचा और उस संगीत के अनुसार कदम उठाने शुरू किए। वह सुर के साथ आगे बढ़ती और रुकती। बाकी सभी उसे ही देखते रह गए। वह थोड़ा आगे जाकर उसी धुन में वापस लौट आई। साइना ने इस चरण को बेहद आसान बना दिया। उसने सभी को उसके उठते कदम की ओर देखकर चलने को कहा और एक बार में केवल तीन को ही चलने की समझ दी।  
पहले साइना, फिर आराध्या और उसके पीछे जिद चले। इसी तरह विनय, रोम और माही और बाकी सभी चले। लेकिन अंत में चलते-चलते आदम के चार आदमी बढ़ गए और आपस में झगड़ने लगे। उनमें से एक ने भागकर सामने पहुँचने की कोशिश की, जैसे ही एक कदम आगे रखा, शोर शुरू हो गया। वे जिस तरह से फंसे थे, उससे बचना मुश्किल था। उनके बीच की लड़ाई के कारण आदम और बाकी सभी को भी शोर सहन करना पड़ा। आदम गुस्से में आकर तुरंत अपनी पिस्तौल निकाल कर चारों को वहीं मार गिराया।  
“चलो, इनके कारण हम नहीं मरेंगे।” निर्दयी आदम बोला।  
इसके बाद साइना ने चौथे चरण को खोलने के लिए उसी तेज़ संगीत का उपयोग किया, जो पहले सुनाई दे रहा था। इसी तरह पाँचवाँ चरण पार कर सभी छठे चरण में पहुँचे। वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते आदम के केवल दो आदमी ही बचे थे। राहुल भी अंदर आकर डर रहा था। छठा चरण सबसे कठिन था।  
दस लोग बढ़े थे, उनमें से केवल पाँच ही आगे जा सकते थे। एक कदम आगे रखते ही पीछे की ज़मीन लावा में बदल जाती थी। जिद ने विनय से कहा कि उसे छोड़कर आगे बढ़ जाए। विनय नहीं माना और जिद को उठाकर आगे बढ़ गया। मौका देखकर रोम ने भी आराध्या को उठा लिया। मुस्कराता हुआ वह भी आगे बढ़ा। साइना ने माही को अपनी पीठ पर उठा लिया और आदम के आदमियों के मन में उठी लालच की भावना को चकनाचूर कर दिया।  
आदम और राहुल तो सबको पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ने लगे। आदम के आदमियों ने यह देखकर चौंक गए और इस बार उनमें से एक ने बचने के लिए राहुल के पैर पर हाथ में रखी मशाल फेंक मारी। राहुल जैसे ही गिरा, उसके नीचे की ज़मीन लावा बनने लगी। राहुल को बहुत गर्म लगने से वह चिल्लाने लगा।  
“नहीं....” आदम भी यह देखकर ऊँचाई से चिल्लाया। तुरंत ही राहुल का हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगा। राहुल अभी पीछे बचे दो आदमियों से ज्यादा दूर नहीं था। उसी समय पीछे बचे दोनों में से एक कूदा और राहुल के हाथ के पास गिरा। उसने राहुल को उठाकर बचा लिया। लेकिन उसके कपड़े और काफी त्वचा जल गई थी। राहुल को गिराने वाले की ओर देखकर आदम ने अपनी पिस्तौल की सारी गोलियां उस पर दाग दीं।  
छठा चरण पूरा कर अब सभी खजाने के बहुत ही पास पहुँच गए थे। एक ओर लालची आदम और दूसरी ओर रोम और विनय। आदम ने अपने बचे हुए आदमी को बुलाया और कहा, “समय आने पर इन दोनों को मार देना।” फिर चुपके से एक छोटी छुरी उसके हाथ में थमा दी। राहुल की हालत देखकर विनय और बाकी सभी को उस पर दया आ रही थी। परंतु आदम अपने पैसे के मोह में पुत्र को भूल गया था। वह सोच रहा था कि सोना मिलते ही उसका इलाज विदेश के बड़े अस्पतालों में करा देगा।  
सभी सामने मौजूद अंतिम द्वार की ओर देखने लगे। जिसके पीछे सोने की खान थी। आदम उन्हें मारने की सोच रहा था। जबकि विनय वहाँ से बाहर निकलने के रास्ते के बारे में सोच रहा था। जिद विनय के पास खड़ी थी। रोम के विचार शायद आराध्या को देखकर थम गए थे। विनय आगे बढ़ा और यह खोजने की कोशिश की कि उस दीवार को कैसे पार किया जाए। उसने नक्शे में केवल छह चरणों तक ही पढ़ा था। “अब आगे कैसे निकलेंगे?” आराध्या बोली।  
माही और साइना चारों ओर देखने लगीं। सभी बाहर निकलने की कोशिश करने लगे। किसी को कुछ मिल नहीं रहा था। पीछे जाने का कोई रास्ता ही नहीं था। दीवार को सभी गौर से देखने लगे। लेकिन कुछ नया नजर नहीं आ रहा था।  
सभी थक कर नीचे बैठ गए। कितने समय से वे इसमें फंसे थे, इसका उन्हें अंदाजा नहीं था। ऊपर गर्मी के मौसम में बारिश शुरू हो गई थी। समुद्र भी हवा की लहरों के साथ उछलने लगा। समुद्र की लहरों की आवाज उन्हें सुनाई देने लगी। उसी समय ज़मीन में उतरे पानी से चींटियाँ बाहर निकलने लगीं। लाल चींटियाँ धीरे-धीरे सभी को डंक मारने लगीं।  
थके बैठे लोग अब फिर से कूदने लगे। ऐसी विकट परिस्थिति में भी विनय का दिमाग वहीं से निकलने का रास्ता ढूंढ रहा था। तभी उसकी नजर वहाँ पड़ी जहाँ से चींटियाँ निकल रही थीं। उसने देखा कि वहाँ नीचे की तरफ दरार पड़ी थी। उसने वहाँ ऊपर पैर रखा और दबाया। जैसे ही पैर से दबाया, वह अंदर धँस गया और पूरी दीवार ज़मीन में उतरने लगी। सभी पीछे हट गए। थोड़ी देर में वहाँ भूकंप आने लगा।  
अचानक साइना का पैर फिसला और वह पीछे लावे की खाई में गिरने लगी। उसी समय माही ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया। साइना नीचे लटक रही थी। माही भी उसका हाथ पकड़कर ज़मीन पर गिर पड़ी। कंपन अभी भी जारी था। रोम माही की मदद में लग गया। अचानक कंपन रुक गया और चारों ओर रोशनी फैलने लगी। करोड़ों की कीमत के सोने में पड़े हीरे चमकने लगे।  
रोम और माही ने साइना को खींचकर बाहर निकाला। अचानक आदम के इशारे पर उसके आदमी ने विनय पर हमला कर दिया और उसकी पीठ में छुरी घोंप दी। विनय के मुँह से चीख की आवाज सुनाई दी। दौड़कर रोम ने आदम के आदमी को पीछे धकेला और वह लुड़कते हुए लावे में जा गिरा और जल गया। उसकी चीखों के बीच आदम की हँसी गूंजने लगी।  

***