[ 9. वंशवादतंत्र और तानाशाही प्रवृत्तियाँ ]
भूल-95
नेहरू के तानाशाही तरीके
“दिल की गहराइयों से नेहरू हमेशा एक तानाशाह, एक शीर्ष दर्जे के राजनेता और अपनी बात को मनवाने का हुनर जाननेवाले थे। उन्हें सिर्फ गांधी और पटेल का डर था— उनकी नैतिकता और लोगों पर जबरदस्त पकड़ के चलते गांधी से और दृढ़ता, भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल न होने की आदत तथा पार्टी में पकड़ के चलते पटेल से।”
—इतिहासकार मक्खन लाल (मैक/251)
“और बात तब पूरी तरह से बरदाश्त से बाहर हो गई, जब भारत के प्रधानमंत्री ने साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाकर कांग्रेस के अध्यक्ष पद से श्रीमान पी.डी. टंडन को हटाना और खुद को उस पर आसीन करना तय कर लिया और एक पूर्ण तानाशाह बन गए। मैं इस अंतिम घटनाक्रम के बाद खुद को कांग्रेस में बने रहने को देश के साथ विश्वासघात के रूप में देखता हूँ। कल की गई राजनीतिक हत्या कांग्रेस में लोकतंत्र की हत्या है। यह तो भारत में लोकतंत्र की हत्या की सिर्फ शुरुआत भर है।” (मैक/308)
—डी.पी. मिश्रा (कृपया भूल#123 भी देखें)
नेहरू को पहली बार ‘कांग्रेसी तानाशाह’ कहने के अलावा सी.आर. (राजाजी) ने यह भी कहा, “कांग्रेस में आपस में मिलनेवाले लोगों के दिमाग में सिर्फ यह बात चल रही होती है कि यह पता लगाएँ कि नेहरू के मस्तिष्क में क्या चल रहा है और उसका अंदाजा लगाएँ। असंतोष का एक छोटा सा प्रयास भी काफी नापसंद किया जाता है और उसे सिर उठाते ही कुचल दिया जाता है।”
—राजाजी (आर.जी.3/373)
नेहरू ने सत्ता प्राप्त करने और उसे बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया का लाभ उठाया; लेकिन वे स्वभाव से लोकतंत्रवादी न होकर एक तानाशाह ही थे। उन्होंने पार्टी के शीर्ष पदों और मंत्रिमंडल में ‘हाँ में हाँ मिलाने वालों’ को भरा, ताकि वे अबाधित सत्ता का सुख ले सकें और साथ ही पार्टी के कामकाज तथा उन मंत्रालयों में अपनी मन-मरजी से हस्तक्षेप कर सकें, जो उनके तहत नहीं हैं।
भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के कुछ ही महीनों के भीतर नेहरू ने बिना मंत्रिमंडल और वरिष्ठ सहयोगियों के परामर्श के अपनी मरजी से और तानाशाही तरीके से काम करना शुरू कर दिया, जिसका नतीजा हुआ—सरदार पटेल के साथ उनकी प्रसिद्ध अनबन। देशभक्त और लोकतांत्रिक सरदार पटेल को मजबूर होकर नेहरू के कामकाज के तरीकों पर सवाल उठाने पड़े और यहाँ तक कि आखिरकार दिसंबर 1947 में सरदार को इस्तीफा तक देना पड़ा। नवंबर 1947 से जनवरी 1948 के बीच नेहरू, सरदार पटेल और गांधी के बीच हुआ पत्रों का आदान-प्रदान नेहरू के काम करने के तानाशाही तरीके को सामने लाता है। बेहद दुःख की बात रही कि 30 जनवरी, 1948 को गांधी की हत्या से पहले वे नेहरू को सुधार नहीं सके। (कृपया भूल#30 के तहत जनवरी 1948 में पटेल द्वारा गांधी को दिया गया जवाब देखें, जो प्रधानमंत्री की शक्तियों और कर्तव्यों से संबंधित है।)
आचार्य कृपलानी ने पाकिस्तान के विरुद्ध भारत की कायरता, कश्मीर मुद्दे को गलत तरीके से सँभालने और हैदराबाद के निजाम के साथ किए गए यथास्थिति करार को रद्द करने की माँग को लेकर नवंबर 1947 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। नेहरू के तानाशाही तरीके से काम करने के कई विनाशकारी नतीजों में से एक था—कश्मीर को लेकर उनके फैसलों की एक पूरी शृंखला (जो वास्तव में बहुत बड़ी भूल थे), जो उन्होंने अपने कैबिनेट सहयोगियों को भरोसे में लिये बिना ही लिये थे।
एक बार गांधी और सरदार पटेल जैसे दिग्गजों के न रहने के बाद नेहरू जो चाहे वह करने को पूरी तरह से आजाद थे! कोई भी सिंगापुर के ली कुआन यू जैसे व्यक्ति की बुद्धिमान, तर्कसंगत, प्रबुद्ध और उदार अर्ध-तानाशाही से खुश हो सकता है, जो सिर्फ दो दशकों के समय में ही सिंगापुर को तीसरे दर्जे के देश से प्रथम दर्जे के शीर्ष देशों में ले गए। लेकिन कोई भी नेहरू जैसे लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए तानाशाह का पक्ष नहीं ले सकता, जिसकी एक के बाद एक की गई गलतियों के चलते भारत एक तीसरे दर्जे का देश बनने को मजबूर हो गया।
डॉ. आंबेडकर ने 27 सितंबर, 1951 को दिए गए अपने त्यागपत्र (नेहरू के मंत्रिमंडल से) में यह कहा था—
“मंत्रिमंडल अब सिर्फ विभिन्न कमेटियों द्वारा पहले से ही ले लिये गए फैसलों का रिकॉर्डिंग और पंजीकरण कार्यालय बनकर रह गया है। जैसाकि मैं कह चुका हूँ, मंत्रिमंडल अब समितियों से काम करता है। रक्षा से संबंधित सभी महत्त्वपूर्ण मामलों का निपटारा रक्षा समिति द्वारा किया जाता है। उनके द्वारा मंत्रिमंडल के उन्हीं सदस्यों को नियुक्त किया जाता है। मैं इन समितियों में से किसी का भी सदस्य नहीं हूँ। वे लौहावरण के पीछे काम करते हैं। वे लोग, जो इन समितियों के सदस्य भी नहीं हैं, उन्हें नीति-निर्धारण में भाग लेने का अवसर लिये बिना ही, सिर्फ संयुक्त जिम्मेदारी लेनी होती है।”
के.एम. मुंशी ने लिखा—“जवाहरलाल स्वभाव से तानाशाह थे; लेकिन वे बौद्धिक तौर पर हिटलर और स्टालिन जैसे तानाशाहों से घृणा करते थे। उन्होंने संविधान की शपथ ली थी, लेकिन वे उसे झुठलाने या अनदेखा करने को हमेशा तैयार रहते थे। वे जैसी असीमित शक्तियों से परिपूर्ण थे, उनके चलते वे कभी यह जान ही नहीं सके कि वे संविधान को अपने हिसाब से मरोड़कर देश का कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं!” (के.एम.एम.) (स्व7)
जॉन मथाई (1886-1959) एक अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने देश के पहले रेल मंत्री और उसके बाद वर्ष 1949 से 1951 के बीच देश के वित्त मंत्री के रूप में काम किया। नेहरू समर्थक होने के चलते वे प्रारंभ में तो सरदार पटेल के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे, लेकिन जैसे ही उन्हें नेहरू में ‘खोट होने’ का पता चला, उन्होंने कहा—
“नेहरू के कार्यकाल में मंत्रिमंडल ने कभी काम किया ही नहीं। सभी निर्णय प्रधानमंत्री और संबंधित विभाग के मंत्री द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिये जाते थे। यहाँ तक कि जब कोई फैसला मंत्रिमंडल में पेश किया भी जाता था तो प्रधानमंत्री उसके साथ खड़े रहते थे और नतीजा पहले से तय होता था। भारतीय मंत्रिमंडल ने सिर्फ एक ही बार ठीक तरीके से काम किया और वह तब हुआ, जब अक्तूबर 1948 के अंत में नेहरू कुछ हफ्तों के लिए वाशिंगटन की यात्रा पर गए हुए थे और सरदार पटेल प्रधानमंत्री के रूप में कामकाज देख रहे थे। मंत्रिमंडल ने पहली बार संयुक्त जिम्मेदारी के साथ काम किया; कार्यवाहक प्रधानमंत्री ने बिल्कुल वैसे ही बैठकों को आयोजित किया, जैसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने की होतीं।” (बी.के./505)
अपने स्पष्ट और ईमानदार विचारों के चलते, विशेष रूप से योजना आयोग को लेकर राय की विविधता की अनुमति देने के बजाय और मामले को लोकतांत्रिक तरीके से मंत्रिमंडल तथा अन्य मंचों पर बातचीत के जरिए सुलझाने के बजाय नेहरू द्वारा जॉन मथाई (तत्कालीन वित्त मंत्री) को अपने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। (यू.आर.एल.34)
नेहरू कितने लोकतांत्रिक रहे होंगे, इसे साबित करने के लिए नेविल मैक्सवेल की पुस्तक ‘इंडिया’ज चाइना वॉर’ का यह अंश काफी है—
“विदेशी मामलों के लिए एक कैबिनेट समिति बनी हुई थी। नेहरू द्वारा अकसर उसे नजरअंदाज किया जाता था और समय-समय पर विदेश नीति से जुड़े अहम फैसले लेकर उनकी घोषणा कर दी जाती थी—और अकसर कमेटी या मंत्रिमंडल को उनकी जानकारी तक नहीं होती थी। चीन के साथ सीमा विवाद के मामले में यही हुआ, जिसे न सिर्फ मंत्रिमंडल, उसके विदेश विभाग और रक्षा समितियों से दूर रखा गया, बल्कि संसद् को तब तक भनक नहीं लगने दी गई, जब तक सशस्त्र संघर्षों के चलते इसे दबाए रखना नामुमकिन हो गया।” (मैक्स/91)
अगर आप अहंकारी हैं और अपनी काबिलीयत, ज्ञान और समझ को लेकर दूसरों की झूठी बातों में आ जाते हैं, तब या तो आप दूसरों की बातों को अनसुना कर देते हैं या दूसरों की राय को खारिज कर रहे होते हैं; और आप पूरी तरह से अलोकतांत्रिक हो जाते हैं। आप अपनी खुद की सीमाओं का अहसास नहीं करते। आप यह नहीं समझते कि आपके लिए दूसरों को भी शामिल करना, उनकी विशेषज्ञता का लाभ उठाना और एक सर्वसम्मत नतीजे तक पहुँचना आवश्यक है। आपके व्यवहार को देखते हुए लोग आपको सच बताना बंद कर देते हैं और इसके बजाय वे आपको सिर्फ वही बताते हैं, जो आप सुनना चाहते हैं। ऐसे में, आप ईमानदार राय और प्रतिक्रिया से दूर हो जाते हैं। रुस्तमजी ने लिखा—
“ ...लेकिन जब आपने उनसे (जी.बी. पंत, नेहरू के मंत्रिमंडल में नंबर दो) बात की तो आपको चपलता और मस्तिष्क की तेजी देखने को मिली, जो उनके स्थूल शरीर के बिल्कुल उलट थी। उनकी सोच त्वरित और निर्णायक थी। वे बेहद चतुराई से बात करते थे और बहस में उनकी बराबरी करनेवाले बिरले ही थे। उनकी अंग्रेजी पूरी तरह से ठीक थी और समस्या की जड़ तक पहुँचने की उनकी काबिलीयत भी। इसके बावजूद, जब पंत प्रधानमंत्री की मौजूदगी में होते तो वे इतने तमीजदार थे कि वे दूसरे को चमकाने के नाते अपने ज्ञान के स्तर को भी नीचे कर लेते थे।” (रुस्त/1194-95)
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भूल-96
नेहरू-सत्ता सिद्धांतों को पीछे छोड़ देती है
पहले से ही प्रधानमंत्री जैसे शक्तिशाली पद पर होने के बावजूद नेहरू ने सन् 1951 में खुद कांग्रेस अध्यक्ष बनने का प्रयास किया और 1954 तक इस पद पर बने भी रहे, ताकि वे सरकार और पार्टी दोनों पर एक जैसी मजबूत पकड़ सुनिश्चित कर सकें; हालाँकि, ऐसा करना कांग्रेस के ‘एक व्यक्ति एक पद’ के सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ाता था। इसके बाद नेहरू ने अपने पिछलग्गू और बिल्कुल अनजान उ.न. ढेबर को पार्टी के अध्यक्ष पद पर आसीन कर दिया और उन्हें 1959 तक अध्यक्ष बना रहने दिया, जिसके बाद उन्होंने सन् 1959 में अपने बेटी इंदिरा गांधी को पार्टी के अध्यक्ष पद की गद्दी पर बैठा दिया।
विडंबना देखिए कि जब वे खुद पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री—दोनों पदों को एक साथ सँभाले हुए थे, तभी उन्होंने राज्य स्तर पर ऐसी व्यवस्था पर पाबंदी लगाई थी। उन्होंने सन् 1953 में एक प्रस्ताव पारित करवाया, जिसमें राज्यों के मुख्यमंत्रियों को साथ में पी.सी.सी. (प्रदेश कांग्रेस कमेटी) का पद सँभालने से रोका गया था और ऐसा करने का कारण यह बताया गया था कि चूँकि मुख्यमंत्रियों के पास करने के लिए इतना अधिक काम होता है कि वे पार्टी के काम के लिए समय नहीं दे पाते हैं। (क्या प्रधानमंत्री के पास उतना ही काम नहीं होता? कपट की हद!) क्यों? वे नहीं चाहते थे कि राज्यों के मुख्यमंत्री शक्तिशाली हो जाएँ और आनेवाले दिनों में उन्हें या उनकी बेटी को किसी भी प्रकार की चुनौती पेश करें। सिर्फ इतना ही नहीं, उन्होंने सन् 1963 की ‘कामराज योजना’ के जरिए अपनी बेटी इंदिरा के भावी प्रतियोगियों को भी किनारे लगा दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने वंश की सत्ता सुनिश्चित करने के लिए सन् 1963 की ‘कामराज योजना’ के तहत अगर किसी को सबसे पहले सरकार से बाहर होना चाहिए था तो वह खुद नेहरू को 1962 के भारत-चीन युद्ध में शर्मनाक हार के लिए (भूल#36) और कई अन्य क्षेत्रों में अपनी नाकामयाबी के लिए भी।
नेहरू एक अनीश्वरवादी थे, लकिे न सत्ता उनका भगवान् थी। अपनी छवि को चमकाने के लिए उनके सिद्धांत बहुत अच् थे; छे लकिे न अगर वे उनके या फिर उनके बाद उनके राजवंश के रास्ते का रोड़ा बने तो नेहरू ने बिना शर्म किए और अनैतिक तरीके से सत्ता का चुनाव किया। नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता की बात की और सांप्रदायिकता एवं जातिवाद का विरोध करते रहे; लेकिन जब चुनावों के लिए उम्मीदवारों के चयन की बात आई तो धर्म और जाति उनके व कांग्रेस, जो उनके अधीन ही थे, के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कारक बन गए। नेहरू ने पूँजीपतियों का विरोध किया, लकिे न अगर वे उनकी पार्टी के चुनावी युद्ध-तिजाेरी को भरने के लिए आगे आ गए तो उनका फायदा करने में भी गुरेज नहीं किया। नेहरू के रास्ते में सिद्धांत कभी आड़े नहीं आए। समाजवाद नेहरू के लिए महज एक धुन नहीं थी। समाजवाद में जो बात नेहरू और उनके राजवंश को सबसे अधिक पसंद आई, वह थी—गरीबों और सत्ता-विहीनों को जमा करने तथा उनके वोट हथियाने की क्षमता।