Nehru Files - 94 in Hindi Book Reviews by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-94

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नेहरू फाइल्स - भूल-94

भूल-94 
हिंदू-विरोधी होना

 “नेहरू के व्यक्तित्व में एक सतही भारतीयता और अंग्रेजी आचार-विचारों के प्रति प्रेम की भावना भरी थी, वह भी दोनों में से किसी भी संस्कृति या दर्शन के प्रति गहरी परख विकसित किए बिना।” (बी.एन.एस./10) “नेहरू की उस किसी भी व्यक्ति के प्रति नाराजगी जग-जाहिर थी, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, हिंदी भाषा के संरक्षण और हमारी पुरानी परंपराओं के आधार पर अपनी भारतीय पहचान या दर्शन के लिए सीना तानकर खड़ा था।” (बी.एन.एस./281) 
—ब्रिगेडियर बी.एन. शर्मा 

“नेहरू अपने समय के भारतीय जीवन से भी बिल्कुल अनजान थे, सिवाय अपने खुद को बिल्कुल अलग रखनेवाले उच्‍च भारतीयों के आंग्ल-रागी सेट के, जो तथाकथित सिविल लाइंस में रहते थे।” (एन.सी.2) 
—नीरद चौधरी 

नीरद चौधरी ने आगे कहा कि नेहरू को वास्तविक भारत के जीवन या संस्कृति या हिंदू धर्म की बहुत कम समझ थी। वे भारतीय उच्‍चारण के साथ अंग्रेजी भाषा बोलने वालों को गँवार समझते थे और घृणा की नजर से देखते थे। 

अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष एन.बी. खरे ने सन् 1950 में कहा था— “जवाहरलाल नेहरू शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुसलमान, लेकिन दुर्घटना से हिंदू (जन्म से) थे।” (अकब./27) 

राम मनोहर लोहिया का मानना था कि नेहरू द्वारा आंग्ल-भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को स्वीकार करने के चलते ही ऐसा हुआ कि वे हर उस चीज का विरोध करने लगे, जो देश को भारतीयता का अहसास दिलवाए। (डी.डी./373) 

नेहरू ने सन् 1953 में गृह मंत्री डॉ. कैलाश नाथ काटजू को भेजे एक पत्र में लिखा—“हिंदू व्यवहार में जरा भी सहिष्णु नहीं हैं और किसी भी देश के किसी भी व्यक्ति से अधिक संकुचित सोचवाले हैं, सिवाय यहूदियों के।” (यू.आर.एल.95) (जे.बी.क्यू.) 
—हिंदुओं व यहूदियों दोनों के प्रति घिनौनी, बेहूदा और अनावश्यक टिप्पणी 

“सन् 1947 में भारत के पहले प्रधानमंत्री एक घोषित हिंदू-विरोधी मार्क्सवादी थे। जब वे सत्ता में थे, तब उन्होंने घोषित रूप से हिंदू-विरोधी नीतियाँ प्रस्तुत कीं, जिन्हें गलती से ‘धर्मनिरपेक्षता’ कहा जाता था।” कोई भी उनके लेखन में उनकी अपनी हिंदू पृष्ठभूमि के प्रति नफरत का स्वाद ले सकता है, बिल्कुल ट्रॉटस्की जैसे ‘गैर-यहूदी यहूदियों’ के आत्म-अलगाव की तरह।” (जे.बी.क्यू.) 

“कई वर्षों की दासता के बाद जब जनता विद्रोह करती है तो एक देश का पुनर्जन्म होता है। नई सरकार का प्रमुख ध्येय राष्ट्र-निर्माण होता है। ऐसी सरकार क्रांतिकारी जोश और बौद्धिक साहस से परिपूर्ण होती है। वह एक ऐसा एजेंडा लागू करने की दिशा में आगे बढ़ सकती है, जो सत्ता से बाहर हो चुके शासकों से बिल्कुल अलग हो। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत की नई विकसित सरकार को उसकी सभी अंतर्निहित क्षमताओं के साथ एक विद्रोही सरकार के रूप में लिया ही नहीं। हिंदू-विरोधी नीति गोरे शासकों की एक और ऐसी विरासत है, जिसे नेहरू सरकार ने तहे-दिल से अपनाया।” (यू.आर.एल.96) 

इस पुस्‍तक में सन्निहित कई भूलों में ऐसे उदाहरण हैं, जो नेहरू के हिंदू-विरोधी और भारतीय सभ्यता विरासत व विरोधी चरित्र के उदाहरण हैं, जिन्हें ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नेहरूवादी ब्रांड की आड़ में थोपा गया। 

आंग्ल-रागी मोतीलाल नेहरू ने जवाहरलाल का पालन-पोषण ऐसे ही किया था और इसके बदले में जवाहरलाल ने भी अपने राजवंश को बिल्कुल इसी तरह से बड़ा किया था कि वे सभी असल भारत से पूरी तरह से कटे रहे और किसी भी हिंदू या भारतीय चीज के प्रति नफरत की भावना से भरे रहे। 

नेहरू ने एक ओर जहाँ (ए) मुसलमानों के हमलों और उनके परिणामस्वरूप हिंदुओं के नर-संहारों के प्रति निषेधात्मक रवैए को बढ़ावा दिया (भूल#92) और खुद नकारनेवाले इतिहास के लेखन में व्यस्त रहे (भूल#93); (बी) समान नागरिक संहिता के संवैधानिक दायित्व की अनदेखी की (भूल#86); (सी) पूर्वी पाकिस्तान से आनेवाले मुसलमानों के चलते पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल की जनसांख्यिकी को बेहद प्रतिकूल तरीके से प्रभावित होने दिया (भूल#5, 59, 60) और ऐसा करके उनकी संस्कृति तथा सुरक्षा से समझौता किया; (डी) ईसाई मिशनरियों द्वारा बड़े स्तर पर किए जा रहे गैर-कानूनी धर्म-परिवर्तन को लेकर आँखें मू ँदे रखीं और भारतीय संस्कृति एवं आंतरिक व बाह्य‍ सुरक्षा, विशेषकर पूर्वोत्तर में, से समझौता किया (भूल#60, 61); (ई) देवनागरी के मुकाबले उर्दू और फारसी-अरबी लिपि को महत्ता प्रदान की (भूल#81); (एफ) संस्कृत को नजरअंदाज किया (भूल#82); वहीं दूसरी ओर, उन्होंने हिंदुओं से जुड़ी किसी भी चीज की निंदा करने या उसे गलत ठहराने के लिए धर्मनिरपेक्षता (भूल#85) की अपनी विकृत धारणा का इस्तेमाल किया और हिंदू धर्म की वकालत करनेवालों को फासीवादी के रूप में प्रचारित किया; और यहाँ तक कि सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का भी विरोध किया (भूल#87)! इस विषय में भूल#122-23 भी देखें। 

हिंदू या हिंदू विरासत के प्रति नेहरू का पूर्वाग्रह उनके लालन-पालन के अलावा उनके विकृत वैश्विक दृष्टिकोण के परिणास्वरूप भी था, जिसके लिए उनकी मार्क्सवादी सोच (भूल#106-7), जो अतीत को खारिज करती थी, जिम्मेदार थी। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि नेहरू ने कभी इसलामी या ईसाई अतीत के लिए यही मापदंड नहीं लागू किया। 
संदीप बालकृष्ण ने लिखा— 
“वास्तव में, नेहरू जैसे भारतीय केवल औपनिवेशिक राष्ट्रीय मानस के स्वाभाविक परिणाम के रूप में उत्पन्न हो सकते हैं (भूल#84)। किसी भी प्रकार से ब्रिटिश उपनिवेशवाद से बाहर निकलने के अपने प्रयासों में नेहरू ने आँखें मूँदकर सोवियत विविधता को गले लगाया। उनकी धर्मनिरपेक्षता वैचारिक नाजायज संतान है, जो स्टालिनवादी कम्युनिज्म के प्रति एक लाइलाज प्रेम (भूल#106) और अपनी खुद की हिंदू जड़ों से एक विवादास्पद अलगाव के मिलन का नतीजा है।” (एस.बी.के./एल-293) 

“धर्मनिरपेक्षता के 70 वर्ष हिंदुओं के लिए इस परिभाषित चरित्र को भूल जाने और इसकी अवहेलना करनेवाली परियोजना का एक बड़ा हिस्सा भर हैं। और तरीकों के बीच, इसे पूरा करने में इस्तेमाल की जानेवाली एक स्थायी पद्धति है—औपचारिक शिक्षा के माध्यम का उपयोग करते हुए आत्म-अलगाव और आत्म-घृणा की स्थायी भावना पैदा करना। सांस्कृतिक आत्मविश्वास के पूर्ण क्षरण के चलते आनेवाली कायरता इसका परिणाम है।” (एस.बी.के./एल-341) 

“नेहरूवाद की बदौलत स्वतंत्रता के बाद शहरी, अंग्जरे ी शिक्षित भारतीय हिंदू अपनी ही धरती पर अजनबी हैं और आज आनंद कुमार स्वामी की उस भविष्यवाणी को सच बना दिया है कि ‘हिंदू अपनी जड़ों से दूर कर दिया गया, ऐसा वर्णनातीत और सतही है—एक ऐसा बौद्धिक समाजच्युत, जो न तो पूर्व का है और न ही पश्चिम का, न ही अतीत का और न ही भविष्य का’।” (एस.बी.के./एल-2320) 

वह बात, जो इसे (भारत को) औरों से बिल्लकु अलग बनाती है, वह यह है कि संविधान स्वदेशी बहुसंख्यक हिंदुओं को उन अधिकारों से वचिं त करता है, जो अल्पसंख्यक गैर-हिंदुओं को मिले हुए हैं। ये हिंदुओं को उनके अपने धर्मनिरपेक्ष देश में एक दूसरे दर्जे का नागरिक बना देते हैं; लेकिन अल्पसंख्यकों के बिल्लकु उलट, उन्हें (हिंदुओं को) बिना अनुचित सरकारी हस्तक्षेप के अपने शैक्षणिक संस्थानों को संचालित करने तक की आजादी नहीं है। उनके सभ्यतागत ज्ञान और प्राचीन ग्रंथों को सार्वजनिक शिक्षा से गायब कर दिया गया है; उनके धर्मांतरण न करनेवाले धर्म और अन्य धर्मों के बीच झूठी समानता तैयार करके उन्हें धर्मांतरण के लिए तैयार किया जाता है; अल्पसंख्यकों के विपरीत, उन्हें अपने स्वयं के मंदिरों और उनकी संपत्तियों के प्रबंधन के अधिकार से वचिं त किया जाता है; अल्पसंख्यकों के विपरीत, उन्हें अनुचित सरकारी हस्तक्षेप के बिना अपनी पैतृक परंपराओं को मनाने और उन्हें जारी रखने की स्वतंत्रता नहीं है। सार्वजनिक शिक्षा के जरिए उन्हें उनके प्राचीन सभ्यतागत ग्रंथों से वचिंत कर दिया गया है। हिंदू छात्र हिंदू धर्म और अपनी प्राचीन सभ्यतागत विरासत के विषय में कुछ नहीं सीख रहे। इसके विपरीत, सार्वजनिक शिक्षा का ढाँचा इस प्रकार से तैयार किया गया है कि हिंदू छात्रों का मानस-परिवर्तन किया जा सके और वे अपने ही धर्म व संस्कृति से घृणा करने लगें और उसे खारिज कर दें। संविधान द्वारा बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के बीच नियत कर दिए गए द्वंद्ववाद ने हमारे समाज को विषैला कर दिया है।” (स्व10) 

नीचे नेहरू की ‘डिस्कवरी अ‍ॉफ इंडिया’ के कुछ अंश (अमेजन का किंडल संस्करण) (जे.एन.1) दिए गए हैं, जो नेहरू की भारतीय-हिंदू सांस्कृतिक विरासत-विरोधी और मुसलमान— पश्चिम समर्थक विचारधारा के जीवंत उदाहरण हैं और साथ ही वास्तविक विद्वत्ता एवं जानकारी की कमी के भी— 

“वहीं दूसरी तरफ, दक्षिण भारत के कुछ बेहद प्रसिद्ध मंदिर, जो नक्काशी और बारीक काम से भरी हुए हैं, मुझे परेशान करते हैं और बेचैनी से भर देते हैं।” (जे.एन.1/एल-4308) 

“वास्तुकला के प्राचीन भारतीय आदर्शों के साथ एक नई सादगी और आभिजात्य के मेल से दिल्ली और आगरा में सुंदर इमारतें तैयार हुईं। यह भारतीय-मुगल कला दक्षिण और उत्तर में दूसरी इमारतों की विस्तृत सजावट और अलंकरण की ह्रासोन्मुख शैली से एकदम भिन्न थी। प्रेरित वास्तुकारों और निर्माताओं ने आगरा में मोहब्बत भरे हाथों से ताजमहल को खड़ा किया।” (जे.एन.1/एल-5381) 

“इसलाम ने हिंदुस्तान को हिला दिया। इसने ऐसे समाज, जो गिर रहा था, तरक्की और जोश के लिए जिंदगी भर दी। हिंदू कला, जो दूषित व पतित हो गई थी और जो तफ्सील, नकल एवं पुनरुक्ति की वजह से बोझिल हो चली थी।” (जे.एन.5/358) 

इससे स्पष्ट होता है कि नेहरू के मुताबिक, एक तरफ भारत की सभ्यता का क्षय हो गया था, जबकि दूसरी तरफ हमलावर मुसलमान श्रेष्ठ थे और नए विचारों से ओत-प्रोत थे। 

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि नेहरू के युग के दौरान एक तरफ जहाँ अजंता (बौद्ध स्थल) को अच्छी तरह से संरक्षित और अच्छे से रखा गया था, वहीं दूसरी तरफ एलोरा के भव्य मंदिरों और कई अन्य स्थानों (हिंदू स्थल होने के चलते) की उपेक्षा की गई थी। यह लेखक खुद वर्ष 1971 की गरमियों में अजंता और एलोरा दोनों ही स्थानों पर गया था। अजंता बेहद साफ- सुथरा और कई प्रकार की सुविधाओं से सुसज्जित था, पर भव्य एलोरा पूरी तरह से उपेक्षित स्थान था। दौलताबाद के किले को पार करते समय हमारी टैक्सी सड़क के किनारे रुकी। चालक ने हमें इशारे से कुछ दूर स्थित पत्थर के मंदिर को दिखाया। हमने एक खेत को पार किया, तब वहाँ तक पहुँचे, क्योंकि कोई और रास्ता ही नहीं था। वहाँ पर कोई भी सुरक्षाकर्मी या गाइड या पुरातात्त्विक विभाग का कोई कर्मचारी मौजूद नहीं था। लेकिन कई पर्यटकों के लिए वह एक सुनसान स्थान था। जैसे ही धुँधलका अँधेरे में बदलने लगा, हम वापस लौट लिये, क्योंकि वहाँ रोशनी का भी कोई इंतजाम नहीं था!