भूल-97
नेहरू ने अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटा
भारतीय संविधान ने 10 मई, 1951 को तब एक बेहद अफसोसजनक मोड़ लिया, जब नेहरू ने भारतीय संविधान में पहला संशोधन किया, जो एक कानून बन गया, जिसमें अन्य प्रावधानों के साथ अनुच्छेद-19(1)(ए) में संशोधन करके अभिव्यक्ति की आजादी (एफ.ओ.ई.) को प्रतिबंधित कर दिया गया।
नेहरू के पूरी तरह से उलट, अमेरिका ने संविधान में किए गए पहले संशोधन के इसके बिल्कुल विपरीत किया था। उसने अभिव्यक्ति की आजादी (एफ.ओ.ई.) का और अधिक विस्तार किया था—किसी भी कानून को धर्म की स्थापना का सम्मान करते हुए निषिद्ध करना, यह सुनिश्चित करना कि धर्म के मुक्त अभ्यास पर कोई रोक नहीं है—बोलने की स्वतंत्रता को रद्द करना, प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लंघन करना, शांतिपूर्वक इकट्ठा होने के अधिकार के साथ हस्तक्षेप करना या शिकायतों के सरकारी निवारण के लिए याचिका करना। नौ अन्य संशोधनों के साथ किया गया यह संशोधन 15 दिसंबर, 1791 को स्वीकार किया गया और ‘बिल अॉफ राइट्स’ का गठन किया गया। नेहरू द्वारा लाए गए इस संशोधन के पीछे शायद ‘रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य’ मामले पर उच्चतम न्यायालय का 1950 का फैसला था, जिसके जरिए थापर के मार्क्सवादी जनरल ‘क्रॉसरोड्स’ पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया गया था। इस फैसले के जरिए उच्चतम न्यायालय ने अभिव्यक्ति की मुक्त आजादी को मान्यता प्रदान की थी, जो हमारे संविधान की मूल भावना में निहित है, अमेरिका की तरह।
नेहरू के उपर्युक्त संशोधन के चलते अपने समय के प्रसिद्ध और शानदार गीतकार एवं लेखक मजरूह सुल्तानपुरी को 1950 के दशक की शुरुआत में नेहरू पर एक कविता लिखने के जुर्म में बंबई की आर्थर रोड जेल में बंद कर दिया गया था! (यू.आर.एल.36) “...मिल मजदूरों के लिए आयोजित एक बैठक के दौरान उन्होंने (मजरूह ने) जवाहरलाल पर एक कविता का पाठ किया। वह गीत, जो नेहरू और खादी के विरोध में था, ने राजनेताओं को नाराज कर दिया। बॉम्बे के तत्कालीन गवर्नर मोरारजी देसाई ने मजरूह को आर्थर रोड जेल में डाल दिया और माफी माँगने को कहा। लेकिन न झुकनेवाले उस कवि ने माफी माँगने से इनकार कर दिया और बदले में दो साल की सजा भुगतना मंजूर किया।” (यू.आर.एल.121)
धर्मपाल, एक जाने-माने विचारक व विद्वान्, अपने कई मशहूर कामों और अभूतपूर्वपुस्तक ‘द ब्यूटिफुल ट्री’ के लेखक, जिन्होंने सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की अपमानजनक हार के बाद लोकसभा सांसदों को एक खुला पत्र लिखा और नैतिक आधार पर नेहरू से इस्तीफा देने की माँग की, को गिरफ्तार कर ‘डिफेंस अॉफ इंडिया ऐक्ट’ के अंतर्गत हस्ताक्षर करनेवाले दो अन्य साथियों—नरेंद्र दत्त और रूप नारायण के साथ तिहाड़ जेल में डाल दिया गया। अगर लाल बहादुर शास्त्री और जय प्रकाश नारायण (जे.पी.) ने कोशिश न की होती तो वे तीनों तिहाड़ में ही जीवन बिताते। (यू.आर.एल.122, यू.आर.एल.123)
नेहरू अपने आलोचकों के प्रति वास्तव में बेहद शातिर और प्रतिशोधी थे—इसके बावजूद ऐसे लोग बहुतायत में हैं, जो अभिव्यक्ति की आजादी के लिए उनका गुणगान करते हैं। नेहरू के युग के दौरान कई ऐसी पुस्तकें, फिल्में, फिल्मी गाने, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सरकार- विरोधी प्रतीत होते थे, को सेंसर या फिर प्रतिबंधित कर दिया गया। उदाहरण के लिए, प्रसिद्ध कवि प्रदीप के सन् 1961 में फिल्म ‘अमर रहे ये प्यार’ के एक गाने को सिर्फ इन पंक्तियों ‘हाय! सियासत कितनी गंदी; बुरी है कितनी फिरका बंदी; आज ये सब-के-सब नर-नारी; हो गए रास्ते के ये सब भिखारी।’ (यू.आर.एल.44)
नेहरू वास्तव में शास्त्रीय अर्थों में जरा भी उदारवादी नहीं थे, न ही वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विचारों के मुक्त प्रवाह के आंतरिक हिंदू लोकाचार से परिचित थे। हिंदू धर्म लोगों को अपनी सच्चाई की खोज करने की अनुमति देता है और यहाँ तक कि उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित तक करता है।
तिब्बत घटनाक्रम : नेहरू के एफ.ओ.ई. विरोधी रवैए का एक और उदाहरण
पृष्ठभूमि और अन्य विवरण के लिए कृपया ‘भूल#33: देश के रूप में तिब्बत का खत्म होना’ को देखें। सीता राम गोयल ने इस पर प्रकाश डाला है—
“लेकिन चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा किए जाने को भारत की जनता से तिब्बत की स्वतंत्रता के हनन के अलावा अपने देश की सुरक्षा के प्रति खतरे के रूप में भी देखा। ऐसा सिर्फ 22 अगस्त, 1953 को हुई एक बैठक, जिसमें विभिन्न देशभक्त राजनीतिक दलों के नेता व सांसद शामिल हुए थे, में भारत की ओर से तिब्बत पर चीनी कब्जे का अनाधिकारिक रूप से विरोध किया गया। इस बैठक ने एक ‘तिब्बत कमेटी’ की स्थापना और सितंबर में ‘तिब्बत दिवस’ आयोजित करने पर मुहर लगाई। लेकिन जैसे ही विचार की बात मीडिया के जरिए सामने आई, प्रधानमंत्री अगले दिन जारी किए गए एक सार्वजनिक बयान के जरिए इसके विरोध में सामने आ गए। 26 अगस्त के ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के अनुसार—“उन्होंने एक रिपोर्ट के हवाले से कहा कि कुछ लोगों ने ‘तिब्बत दिवस’ आयोजित करने का प्रस्ताव रखा था। उन्हें लगा कि ऐसा करना ठीक नहीं होगा और उन्होंने सदस्यों से इसमें कोई दिलचस्पी न लेने को कहा।” 22 अगस्त की बैठक में एक तिब्बत कमेटी की स्थापना की गई थी, जिसकी अध्यक्षता उस समय प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पी.एस.पी.) के सांसद श्री गुरुपद स्वामी के हाथों में थी। लेकिन कमेटी के एक और सांसद प्रोफेसर एन.सी. रंगा को 28 अगस्त को कमेटी से अपना इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि वे उस समय प्रधानमंत्री के साथ आंध्र प्रदेश के अपने प्रांतीय दल ‘कृषाकार लोक पार्टी’ के विलय पर चर्चा कर रहे थे।” (एस.आर.जी.2/204)
“हालाँकि, कमेटी ने देश के प्रति और तिब्बत में मानव स्वतंत्रता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। नई दिल्ली में अस्सी से भी अधिक लोगों ने चीनी दूतावास तक मार्च किया और उनके हाथों में लाल चीन को तिब्बत को खाली करने संबंधित तख्तियाँ थीं। इसके बाद नई दिल्ली टाउन हॉल में एक बैठक आयोजित की गई, जिसे श्री गुरुपद स्वामी, जनसंघ के श्री वी.पी. जोशी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के मुंशी अहमद दीन द्वारा संबोधित किया गया।” (एस.आर.जी.2/204)
“प्रधानमंत्री इस प्रयास से बेहद नाराज हुए। उन्होंने दिल्ली की मीडिया पर तिब्बत दिवस प्रदर्शन और उससे संबंधित बैठक की खबर न प्रकाशित करने का दबाव डाला। उस दौर के पत्रकार जगत् में यह बात जग-जाहिर थी कि प्रधानमंत्री के दामाद और उस समय समाचार- पत्रों के एक्सप्रेस समूह के निदेशक फिरोज गांधी ने अपनी पूरी शृंखला को राजधानी की इन घटनाओं से जुड़ी खबर न प्रकाशित करने के आदेश दिए।” (एस.आर.जी.2/204)
“प्रधानमंत्री ने कुछ दिनों बाद कुछ ऐसा किया, जो और भी कहीं बुरा था। राज्यसभा में 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय मामलों पर बाेलते हुए उन्होंने तिब्बत दिवस मनानेवाले अपने विरोधियों की निंदा की और उन्हें ऐसी भाषा में धमकाया, जिसे जंगली कहा जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि अकसर तो नहीं, लेकिन कभी-कभी लोग मित्र देशों के खिलाफ कोई-न-कोई धरना-प्रदर्शन का आयोजन कर देते हैं। वे एक तिब्बत दिवस मनाने की घोषणा करते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि किसी को तिब्बत दिवस आयोजित करने की आवश्यकता क्या है, वह भी इस मोड़ पर। वह ज्ञानी महोदय कौन थे, जिन्होंने यह सुझाव दिया या यह किसके दिमाग की उपज थी, मुझे नहीं पता। लेकिन फिर भी, करीब दस दिन पूर्व तिब्बत दिवस आयोजित हुआ (किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया)। सिर्फ दर्जन भर लोग तिब्बत के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए दिल्ली की सड़कों पर निकले और चीनी दूतावास तक मार्च निकाला और चिल्लाते हुए उसके सामने प्रदर्शन किया। खैर, यह पूरी तरह से बचकाना है और यह बड़ा अजीब है कि बड़े हो चुके लोग ऐसा काम करें और व्यवहार करें; क्योंकि अगर कुछ दर्जन लोग ऐसा करते हैं तो यह इसका संकेत नहीं है कि यह बड़े वर्ग की राय है। वास्तव में, यह उनके छोटेपन और मूर्खता को दिखाता है। मैं इसका उल्लेख इसलिए कर रहा ह ूँ, क्योंकि यह पूरी तरह से हास्यास्पद है। मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं है कि अगर कोई ऐसा सोचता है और हमारा विरोध करता है, यहाँ तक कि तर्क या बहस या सड़कों पर भी। बहरहाल, अगर वह एक निश्चित सीमा से आगे जाता है तो किसी भी सरकार को काररवाई करनी होगी। हम आमतौर पर कोई काररवाई नहीं करते। हमने की भी नहीं है। लेकिन मैं चाहता हूँ कि यह सदन चरम को सोचे और मैं तो ऐसे कामों के लिए ‘मूर्खता’ शब्द का प्रयोग करना चाहूँगा। मुझे पता है कि इस सदन का कोई भी सदस्य इनको महत्त्व नहीं देता है। लेकिन दुनिया में ऐसे बहुत से तत्त्व मौजूद हैं, जो आग लगाने का काम करते हैं और जो ऐसे मौकों को भुनाने की कोशिश में रहते हैं, वह भी ऐसे समय में, जब हम मित्रवत् सहयोग की भावना को तैयार करने की कोशिशों में लगे हुए हैं।” (एस.आर.जी.2/205)
“यह बयान आक्षेपों से भरा हुआ था। यहाँ पर एक लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री देश की सुरक्षा से संबंधित मसलों पर दूसरे लोगों के सोचने और अपने भावों को व्यक्त करने के प्रति उच्च कोटि की असहिष्णुता प्रदर्शित करता हुआ। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और उसके संगठनों ने उनकी ही आँखों के सामने एक ऐसे तंत्र को तैयार किया था, जो कभी इस देश के दूतावास के सामने तो कभी उस देश के दूतावास के सामने, जब चाहे तब, बिना किसी बात के धरने-प्रदर्शन करते रहते थे और पता नहीं कितने मित्र देशों के प्रति जहर उगलते रहते थे। प्रधानमंत्री ने आज की तारीख तक वामपथिं यों द्वारा उन दूतावासों के बाहर किए गए गुंडागर्दी के नग्न प्रदर्शन (कारों को जलाने, पथराव करने और यहाँ तक कि उनके कर्मचारियों की पिटाई करने) को लेकर अपना मुँह तक नहीं खाेला है। लकिे न चीन द्वारा एक बफर राष्ट्र पर किए गए अवैध कब्जे से पैदा होनेवाले खतरे के प्रति अपने देश की सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए कुछ देशभक्त लोगों के एक छोटे से प्रदर्शन ने प्रधानमंत्री को नाराज कर दिया और वे अपने पद की गरिमा ही भूल गए। प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय महत्त्व के मामले में खुद को कम्युनिस्टों के प्रति झुका हुआ दिखा दिया; और उन्होंने ऐसा करने की प्रक्रिया में खुद को पूरी तरह से हास्यास्पद बना दिया था। एक तरफ तो वे लगातार यह कहते रहे कि चीन का विरोध करनेवाले मुट्ठी भर लोग हैं, जो अपने खुद के अलावा और किसी का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने इस पर इतना अधिक ध्यान देने की आवश्यकता समझी और ऐसा माहौल बना दिया कि पता नहीं यह घटना कितनी महत्त्वपूर्ण है। प्रदर्शनकारियों पर काररवाई करने की उनकी धमकी निश्चित ही किसी बड़े अपराध से कम नहीं थी।” (एस.आर.जी.2/205-6)