Bazaar - 7 in Hindi Anything by Neeraj Sharma books and stories PDF | बाजार - 7

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बाजार - 7

 बाजार ------7------

                           सूरज डलता हुआ, शाम का धुआँ, प्रकिति मे बिखेर रहा था। घोसलों की ओर परिंदो चिडियो की चाये चाये रुखसत कर रही थी। रात अभी हुई ही कहा थी...

                             लिली ने देव से कहा था ----" देव मिले हो मुझे, ऐसा लगता हैं जैसे कि जन्मों का संबंध हो.. " बस ये सुन कर उसने लिली का हाथ पकड़ कर एक गहरा चुभन तस्दीक किया था। 

 " तुम ज़ब से जूड़ी हो, तुम तकदीर हो मेरी, शादी के बाद..... "   गाड़ी को उसने धीरे से मोड़ा , और आगे  बड़ गए।

कितना आपना पन था। शीतल हवा, महीना अगस्त का आखिर था।  बम्बे भी कब सोता हैं.. सारी रात जागता रहता हैं। कितना शौर... कब सोते होगे ये पैसे वाले घमुकड़ लोग ----  हक़ीक़त मे इनके सफर कितने परेशान करते होंगे, जिनको सारी  रात  ये झेलते होंगे।

बम्बे की सड़को पे कितनो की जिंदगी बनती हो गी, और कितनो की जिंदगी विरानियो भरी होती होंगी, किस्मत का बाहरी योगदान कितना जरुरी होता हैं।

                          हर दिल की गहरायी लिए जो प्यार करता हैं, वो बहुत कम शक्श होते हैं।

पुहच चुके थे, माया ने देखा बाहो मे उठाया उसकी हीरे सी बेटी को, अंदर आ रहा था। कितना आपना पन था उस मे, माया ने भरी हुई आँखो से देखा। 

" कुमुदनी तुम ठीक हो, या अभी भी सिर दुःख रहा हैं ---" वो उसके पास ही बैठ गया था। माया उसके सामने चेयर पे बैठ गयी... "हम कयो न इसकी शादी ही कर दें। " देव मुस्करा पड़ा, और लिली ने चेहरा दोनों हाथों से डाप लिया था। 

" हां देव, तुम तैयार हो... " 

"--हां मैं कयो नहीं तैयार  हुगा। " देव ने रुक कर कहा।

जेसबी गिरजा वाले पादरी आये थे। कह रहे थे, कल चर्च मे आ कर ये काम को सोदर्य कर देते हैं। मैंने" हां " बोल दिया।  " अच्छा किया ---" देव ने बोला।

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                       मुकदर  की कभी कभी मौज होती हैं।

देता हैं छपर फाड़ कर, समझा करो भाई। देव साहब सुपर स्टार बन चुके थे, नाम से फ़िल्म हिट हो जाती हैं। ऐसा एक्टर जो डूबती किश्ती को भी पार लगा दें। उसका होना ही स्टारडम मे एक हैरान करने वाला सच था।      

                              एक बात थी। वो पीने बहुत ही लग चूका था... ये सिर्फ वो ही जानता था... और कोई नहीं। इतना पीना भी खतरनाक था... पर कोशिश की तो थोड़ा विराम लग गया था.. कोई दस दिन से...।

मामा जॉन आज ही आया था... जान को भी खुशखबरी पता चली तो उसने जीजस को थैंक्स कहा था। बना बनाया बंगला जिसका नाम खुद लिली ने रखा था उसका नाम "शीश महल" रखा गया था। वक़्त भी जैसे ठहर गया हो। चर्च की शादी धूमधाम से हुई थी। देव और लिली दोनों खुश थे।

                         सुहागरात मे बिस्तर को गुलाबों से सजा दिया गया था। माया भी बगले मे चुप चाप एक कमरे मे बैठी थी। बगले मे बहुत  स्टेडर लेबल निर्देशक और एक्टर काफ़ी थे, सब के हाथ मे ख़ुशी के मारे जाम थे शराब के... और सब के ख़ुशी थी। माया के करीब आया " देव " जिनको उसने आशीर्वाद दिया था... लिली शर्मा रही थी। जो अक्सर होता हैं। दसाई निर्देशक ने उसको " जीत " फ़िल्म के लिए साइन किया था, जिसमे उसका रोल एक खलनायक का था। जबरदस्त। 

(चलदा )  ----------- नीरज शर्मा।