संयोगिता के जाने के बाद आदित्य के मन में एक बेचैनी घर कर गई। वह जानता था कि उसकी आँखों में जो दर्द था, वह कोई साधारण चिंता नहीं थी—वह किसी गहरे ज़ख्म की परछाई थी।
वह पूरी रात सो नहीं पाया। उसकी आँखों के सामने बार-बार संयोगिता का चेहरा आ जाता, उसकी आवाज़ कानों में गूंजती—"कभी-कभी कुछ कहानियाँ पूरी नहीं होतीं।"
लेकिन क्यों?
सुबह की हल्की धूप जब खिड़की से अंदर आई, तो आदित्य की बेचैनी और भी बढ़ गई। कमरे की सफेद दीवारें अब उसे एक बंद दायरे की तरह महसूस हो रही थीं। वह जानता था कि जब तक संयोगिता की आँखों में छिपे सवालों के जवाब नहीं मिल जाते, तब तक उसकी खुद की कहानी भी अधूरी ही रहेगी। उसने फैसला कर लिया—अब और इंतजार नहीं।
वह सीधा संयोगिता के गाँव की ओर निकल पड़ा। हवेली दूर से ही अपनी भव्यता और गूढ़ रहस्यों के साथ खड़ी नजर आ रही थी, लेकिन आदित्य जानता था कि वहाँ जाना अभी सही नहीं होगा। संयोगिता से अकेले मिलने का यही एक मौका था।
गाँव की पगडंडियों पर चलते हुए उसने चारों ओर नजर दौड़ाई। सुबह की हल्की ठंडी हवा पेड़ों के पत्तों को झकझोर रही थी, और दूर मंदिर की घंटियों की आवाज़ वातावरण में गूंज रही थी। आदित्य को महसूस हुआ कि संयोगिता इस समय मंदिर जा सकती है। उसने मंदिर की ओर कदम बढ़ाए और इंतजार करने लगा।
कुछ देर बाद, हल्के गुलाबी रंग की साड़ी में संयोगिता मंदिर की ओर जाती दिखाई दी। उसका चलना धीमा था, जैसे किसी गहरे विचार में डूबी हो। उसके चेहरे पर एक अजीब-सा तनाव था—न चिंता, न डर, बस एक अनकही उलझन।
आदित्य की धड़कन तेज़ हो गई। उसने बिना वक्त गँवाए आगे बढ़कर उसका रास्ता रोक लिया।
"संयोगिता!"
संयोगिता अचानक ठिठक गई, जैसे किसी ने उसे किसी गहरी नींद से जगा दिया हो। उसकी आँखों में एक पल के लिए विस्मय झलका, फिर वह तुरंत खुद को संयत करते हुए इधर-उधर देखने लगी।
"आदित्य! तुम यहाँ क्यों आए हो?" उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें एक अनकही घबराहट झलक रही थी।
आदित्य ने उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश की। "तुमसे बात करनी है।"
संयोगिता ने एक बार फिर चारों ओर नजर दौड़ाई, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा। उसके हाथों की हल्की कंपन और गहरी साँसें इस बात का इशारा कर रही थीं कि वह इस मुलाकात के लिए तैयार नहीं थी।
"तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था," उसने धीमे से कहा।
" मगर मैं तुमसे मिलना चाहता था संयोगिता"-आदित्य ने दृढ़ता से जवाब दिया।
संयोगिता ने उसकी आँखों में देखा, लेकिन वहाँ सिर्फ सवाल थे, जिनका जवाब देने से वह कतरा रही थी।
"आदित्य, तुम यहाँ क्यों आए हो?" उसकी आवाज़ में हल्की घबराहट थी।
"मुझे तुमसे बात करनी है"
क्या बात?
आदित्य ने गंभीरता से कहा-" तुम कल अचानक वहां से चली क्यों आई क्या कुछ छुपा रही हो मुझसे?"
संयोगिता ने कुछ पल चुप रहकर आकाश की ओर देखा, जैसे सही शब्द ढूंढ रही हो। "कुछ भी नहीं, आदित्य। हर किसी की ज़िंदगी में कुछ बातें होती हैं, जो कहने के लिए नहीं बनीं।"
"लेकिन मैं सुनना चाहता हूँ, संयोगिता। मुझे तुम्हारी आँखों में सवाल दिखते हैं, तुम्हारे शब्दों में अधूरी बातें सुनाई देती हैं। अगर तुम्हें मुझ पर थोड़ा भी भरोसा है, तो सच बताओ।"
संयोगिता ने उसे टालने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो आदित्य को चुप करा देता। "कुछ बातें जितनी दूर रहें, उतना ही अच्छा होता है, आदित्य।"
आदित्य ने गहरी सांस ली और धीरे से कहा, "और अगर मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ?"
संयोगिता कुछ नहीं बोली, लेकिन उसकी आँखों में आँसू झिलमिला उठे। वह अचानक पीछे मुड़ी और तेज़ कदमों से वापस चल पड़ी।
आदित्य वहीं खड़ा रह गया, लेकिन अब वह जानता था कि यह सिर्फ संयोगिता की व्यक्तिगत मजबूरी नहीं थी। इसमें कुछ और था—कोई ऐसा राज़, जिसे वह बताने से डर रही थी।