(भाग-15)
लगभग एक हफ्ते में अपना काम निपटाकर मैं चला आया। हालांकि उस एक हफ्ते की रातें भी मैंने उसी के यहां उसी के बेड पर हम बिस्तर होते गुजारीं। राम जाने उन दिनों मुझमें कहां से इतनी शक्ति आ गई थी कि मैं उसे भरपूर सेक्स का आनंद देता रहा...। पर उस उत्तेजक श्रम के पीछे एक शुभ निर्माण की महती मंशा छुपी थी। क्षमा तो उसी लालसा के तहत रोज हम बिस्तर हो रही थी।
क्योंकि वह अपनी रिक्ति को भरना चाहती थी। अपनी संतान की स्वयं अधपति होने की चाह ने ही उसे इस बेमेल सेक्स के लिए मजबूर किया, जो मुझे प्रयास पूर्वक उत्तेजित करती।
इसके लिए उसे मेरे पुरुषांग को छूने, चूमने, उससे खेलने में मजा आता हो अथवा नहीं, पर वह नियमित ऐसा करती। और जब वह ताव खा जाता तो उसे अपनी उंगलियों से पकड़ अपने काम्यशरीर के अंदर करा लेती। फिर मेरी कमर पकड़ अपने नितंबों को पलंग पर नचाती, जीभ निकलवा अपने मुंह में खींच चूसती। और चरम पर पहुंचा सीत्कार भरते संपीडित करने लगती। और तब मेरा निर्झर भी उछल कर बहने लगता।
प्राण मानो प्राणों में समा जाते।
और मेरी कोशिश होती कि बोवनी अच्छे से हो जाए इसलिए शिथिल होने पर भी अंग उसके काम्यशरीर से निकालता नहीं, उसी अवस्था में उसके ऊपर ही पड़ा-पड़ा झपक जाता।
वह भी उठती नहीं। पेशाब रातभर रोके रखती।
इस तरह रोज रात हम दोनों मिलकर एक यज्ञ-सा सम्पन्न करते रहते।
सुबह उठने से पहले वह मेरा चेहरा हाथों में भर चूमते हुए थेंक्स कहती। बदले में मैं भी उसे चूमते हुए गुडमार्निंग कहता।
उन कीमती क्षणों में जिस मनोरम संरचना का आभास होता, उससे तन-मन पुलकित हो आता। उत्साह दिन भर बना रहता। गोया बुढ़ापा यौवन में तब्दील हो गया था जो दिन भर बीती मधुयामिनी की मधुर स्मृति मुखमंडल पर छायी रहती। वह मुझे देख-देख मुस्काती रहती और मैं उसे देख-देख। और शाम को फिर घर पहुंच, भोजन-चाय के बाद बिस्तर पर जा फोरप्ले में जुट जाते। फिर आपस में गुँथकर पलंग की चरर-मरर में गले के मादक स्वर मिलाते-मिलाते मक्खन-सा मथ फेंकते और चरम पर हा-य, हा-य करते प्राण प्राणों में छोड़ देते।
उसके बाद सुकून भरी इतनी गहरी नींद सो जाते कि कोई स्वप्न भी याद नहीं रहता।
काम निपटाने के बाद जब मैं घर चला आया तो लगभग एक महीने बाद उससे डरते-डरते पूछा कि- रिजल्ट क्या रहा?'
क्षमा ने चहकते हुए बताया, पॉजिटिव!'
मुझे मानो यकीन नहीं, खुशी से उछल पड़ा, प्रेगनेंसी!?'
-हाँजी!' उसने उत्साहित स्वर ने पुष्टि की।
खुशी में रातभर नींद नहीं आई। क्योंकि मेरी भी कोई औलाद न थी। अब बुढ़ापे में वंश चल गया...। दूसरे दिन उत्साह में उससे पूछा, स्कूल-दाखिले में मेरा नाम लिखवाओगी ना...'
'क्यों...'
'क्योंकि लोग जानना चाहेंगे, सन्तान किसकी है!'
इस पर वह खामोश रह गई। अगले दिन मेल पर उसकी एक रचना मिली, "बाप कौन"। उसे मैं सारा काम छोड़ तुरंत पढ़ने बैठ गया :
राम के दरबार में विधवा धोबिन को पेट से पैदा बच्चे की जानकारी के लिए बुलाया गया। पूरा दरबार लगा था?
गुरु विश्वामित्र ने औरत से बाप का नाम पूछा।
औरत ने प्रतिष्ठित आदमी होने के कारण बताने से इनकार कर दिया तो गुरु ने उस औरत को फांसी की सजा सुनाई और उसकी आखिरी इच्छा जाननी चाही।
औरत ने कहा, आप मेरे बच्चे के पिता का नाम पूछ रहे हैं तो पहले आप अपने पिता का नाम बता दें।'
क्योंकि विश्वामित्र को घास से पैदा बताया गया है, वे गर्दन झुकाए रह गये। पर गुरु के पिता का नाम पूछने पर राम झल्ला गए, बोले- गुरु की इतनी बेइज्जती करने की तेरी हिम्मत कैसे हुई?'
तो उस ढीठ औरत ने राम से उनके पिता का नाम पूछ लिया! और चूंकि राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन के पिता ऋषि बताये जाते हैं, क्योंकि इनकी माताओं ने खीर खाई थी श्रृंग ऋषि की गुफा में... सो वे भी गर्दन झुकाए रह गये।
तब लक्ष्मण क्रोधित हो बोले, तूने बड़े भाई का अपमान किया है, तुझे जिंदा नहीं छोड़ूगा।'
तब उसने इनसे भी बाप का नाम पूछ लिया...।
अब तो सीता भी तिलमिला गईं, तूने मेरे देवरजी का अपमान किया...तैश में बोलीं, इसकी जबान काट लो!'
औरत ने सीता से भी बाप का नाम पूछा और वे गर्दन झुकाए रह गईं, क्योंकि घड़े से पैदा हुई थीं।
सीता का अपमान देख हनुमान बौखला गये, तूने माता का अपमान किया, तुझे मैं गदे से जमीन में गाड़ दूँगा!'
औरत ने तुरंत हनुमान से उनके बाप का नाम पूछ लिया।
हनुमान भी अपने पिता का कोई एक नाम नहीं बता पाये! पवनसुत, शंकरसुवन या केशरीनंदन?गर्दन लटकाए रह गये।
अंत में धोबिन ने कहा कि- जब आप में से कोई अपने पिता का असली नाम नहीं बताना चाहते, फिर मेरे बेटे के बाप का नाम क्यों पूछ रहे हैं...?
इसलिए हे भद्र! पहले अपने-अपने बाप के नाम पता करके आओ फिर हमसे पूछना...'
-क्षमा
लघुकथा मैंने पत्रिका के फोल्डर में डाल दी और मान लिया कि उसने जो ठान लिया था कि- 'यह मैं कर लूंगी' सो करके दिखा दिया!
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समाप्त