1970 की सर्दियों में सैंटियागो की हवा में तनाव था। सल्वाडोर अयेंदे राष्ट्रपति बन चुका था। सड़कों पर समाजवादी नारे गूँज रहे थे—"जनता की सरकार, जनता के लिए!" लेकिन ऑगस्तो पिनोशे के लिए ये नारे जहर थे। वह अपने सैन्य ठिकाने पर बैठा था। उसकी मेज पर अयेंदे का भाषण चल रहा था—रेडियो की आवाज में उत्साह था, पर ऑगस्तो की आँखों में आग सुलग रही थी। उसने रेडियो बंद किया और अपनी बंदूक साफ करने लगा। हर गोली को वह प्यार से सहलाता था, जैसे वह उसका सबसे करीबी दोस्त हो। उसने अपने सहायक से कहा, "यह आदमी देश को खा जाएगा। इसे रोकना होगा।"
ऑगस्तो ने साजिश शुरू की। उसने सेना में अपने वफादारों को इकट्ठा किया—ऐसे लोग जो कम्युनिज्म से नफरत करते थे। रात के अंधेरे में गुप्त बैठकें होती थीं। सिगरेट का धुआँ हवा में फैलता था, और ऑगस्तो की ठंडी आवाज गूँजती थी—"हमें इंतजार करना होगा, पर जब मौका आएगा, हम सब खत्म कर देंगे।" उसने CIA से संपर्क साधा। एक रात उसकी मुलाकात एक अमेरिकी एजेंट से हुई। अंधेरी गली में, टोपी और कोट में छिपा वह शख्स बोला, "अयेंदे को हटाओ, हम तुम्हारे साथ हैं।" ऑगस्तो ने सिर हिलाया। सौदा पक्का हो गया—हथियार, पैसा, और सत्ता का वादा।
1971 और 1972 में ऑगस्तो ने अपनी सेना को तैयार किया। वह दिन-रात ठिकानों पर जाता, सैनिकों से बात करता। उसकी आवाज में जादू था—वह डर पैदा करता था, पर सम्मान भी लेता था। उसने जनरल कार्लोस प्रैट्स को अपना पहला निशाना बनाया। प्रैट्स अयेंदे का वफादार था, सेना का कमांडर-इन-चीफ। ऑगस्तो उसे हटाना चाहता था। उसने अफवाहें फैलाईं—प्रैट्स कमजोर है, देश को बचा नहीं सकता। 23 अगस्त 1973 को प्रैट्स ने इस्तीफा दे दिया। अयेंदे ने ऑगस्तो को नया कमांडर-इन-चीफ बनाया। यह उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी। ऑगस्तो ने अयेंदे की तरफ देखकर मुस्कुराया—एक ऐसी मुस्कान जो साँप की फुफकार से भी खतरनाक थी।
11 सितंबर का दिन करीब आ रहा था। ऑगस्तो ने अपनी योजना को आखिरी रूप दिया। उसने अपने सैनिकों को बुलाया। कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ उसकी आवाज गूँजी—"ला मोनेदा को तबाह कर दो। अयेंदे को जिंदा मत छोड़ो।" सैनिकों की आँखों में खून की प्यास थी। ऑगस्तो ने CIA से आखिरी संदेश लिया—"सब तैयार है।" उस रात वह अपने घर लौटा। लूसिया ने पूछा, "क्या होने वाला है?" ऑगस्तो ने उसकी तरफ देखा और कहा, "खून बहेगा।" उसकी डायरी में उसने लिखा—"सत्ता मेरी है। अब कोई नहीं रोक सकता।" चिली सो रहा था, पर ऑगस्तो की आँखें खुली थीं—सपनों का शिकारी अब जाग चुका था।
11 सितंबर 1973 की सुबह सैंटियागो में आसमान साफ था, पर हवा में कुछ भारीपन था—जैसे कोई तूफान आने वाला हो। ऑगस्तो पिनोशे अपने सैन्य मुख्यालय में खड़ा था। उसकी वर्दी पर एक भी सिलवट नहीं थी, और उसकी आँखों में एक ठंडी चमक थी—वही चमक जो शिकारी की होती है जब वह अपने शिकार को देखता है। आज वह दिन था जिसका उसने सालों इंतजार किया था। उसकी उंगलियाँ मेज पर रखे नक्शे को सहला रही थीं—ला मोनेदा, चिली का राष्ट्रपति भवन, उसका निशाना था। आज वह सल्वाडोर अयेंदे को खत्म करने जा रहा था, और इसके साथ ही चिली का इतिहास हमेशा के लिए बदलने वाला था।
सुबह 6 बजे उसने अपने चुनिंदा अधिकारियों को बुलाया। कमरा सिगरेट के धुएँ और तनाव से भरा था। ऑगस्तो की आवाज धीमी थी, पर हर शब्द में बिजली-सी चमक थी। "आज हम देश को बचाएँगे," उसने कहा, "कोई दया नहीं, कोई रुकावट नहीं। जो हमारे रास्ते में आएगा, उसे कुचल देंगे।" उसके सामने खड़े सैनिकों ने सिर हिलाया। उनकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब-सी भूख थी। ऑगस्तो ने CIA से मिले संदेश को जेब में रखा—अमेरिका ने हरी झंडी दे दी थी। अब सिर्फ खून बहाना बाकी था।
8 बजे सैंटियागो की सड़कों पर टैंकों की गड़गड़ाहट शुरू हुई। आसमान में हॉक हंटर लड़ाकू विमानों की गर्जना गूँज रही थी। ला मोनेदा के चारों तरफ सेना ने घेरा डाल दिया। अंदर अयेंदे अपने कुछ वफादारों के साथ था। उसने रेडियो पर आखिरी भाषण दिया—"मैं हार नहीं मानूँगा। यहाँ से मैं चिली के लोगों के लिए मरूँगा।" उसकी आवाज में दर्द था, पर हिम्मत भी। बाहर ऑगस्तो ने यह सुना और मुस्कुराया—एक ऐसी मुस्कान जो बर्फ से भी ठंडी थी। उसने अपने कमांडर को आदेश दिया, "बमबारी शुरू करो।"
9:30 बजे पहला बम ला मोनेदा पर गिरा। इमारत हिल गई, धूल और धुआँ हवा में फैल गया। सैंटियागो की सड़कों पर चीखें गूँज रही थीं। लोग भाग रहे थे, पर कहीं कोई सुरक्षित जगह नहीं थी। ऑगस्तो अपने मुख्यालय से यह सब देख रहा था। उसका चेहरा शांत था, जैसे वह कोई खेल खेल रहा हो। दूसरा बम गिरा, फिर तीसरा। ला मोनेदा की दीवारें ढहने लगीं। अंदर अयेंदे ने अपनी AK-47 उठाई—उसने फैसला कर लिया था कि वह जिंदा नहीं पकड़ा जाएगा। 11 बजे उसने खुद को गोली मार ली। उसका खून फर्श पर फैल गया, और साथ ही चिली का लोकतंत्र भी मर गया।
दोपहर तक ऑगस्तो ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। उसने अपने सैनिकों को शहर में फैलने का हुक्म दिया। "हर कम्युनिस्ट को ढूँढो, हर समाजवादी को मारो," उसका आदेश था। सैंटियागो की गलियों में खून की नदियाँ बहने लगीं। लोग अपने घरों में छिप रहे थे, पर सैनिक दरवाजे तोड़कर अंदर घुस रहे थे। एक युवक, जो अयेंदे का समर्थक था, सड़क पर भाग रहा था। सैनिकों ने उसे पकड़ा, उसकी चीखें हवा में गूँजीं, और फिर एक गोली ने सब शांत कर दिया। ऑगस्तो ने यह सब सुना और कहा, "यह जरूरी है। देश को साफ करना होगा।"
शाम तक सैंटियागो एक कब्रिस्तान बन चुका था। ऑगस्तो अपने नए कार्यालय में बैठा था। उसकी मेज पर एक गिलास व्हिस्की थी, और सामने चिली का झंडा लटक रहा था। उसने अपने परिवार को फोन किया। उसकी पत्नी लूसिया की आवाज काँप रही थी—"यह सब क्या है, ऑगस्तो?" उसने जवाब दिया, "यह देश का नया जन्म है।" लेकिन उसकी आवाज में कोई गर्मी नहीं थी, सिर्फ एक ठंडी क्रूरता थी। उस रात चिली सो नहीं सका। हर घर में डर था, हर गली में सन्नाटा। ऑगस्तो ने अपनी डायरी में लिखा—"11 सितंबर 1973, दिन एक। अब मैं चिली हूँ।"
(क्रमश:)