Vakil ka Showroom - 18 in Hindi Thriller by Salim books and stories PDF | वकील का शोरूम - भाग 18

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वकील का शोरूम - भाग 18

"चिंता मत करो।" विनोद फुसफुसाया- "मैं तुम्हें मंजिल पर पहुंचाकर ही दम लूंगा।"


इसके बाद विनोद यूं अंजुमन पर टूट पड़ा, जैसे कई दिनों का भूखा शेर हो। फिर भी अंजुमन को मंजिल तक पहुंचाने में उसे पंद्रह मिनट और लगे और इसके साथ ही वह खुद भी मंजिल तक पहुंच गया।


फिर मंजिल पर पहुंचने के बाद दोनों ही मुसफिर थककर बुरी तरह हांफने लगे।


"थैंक्यू सर।” अंजुमन तृप्ति की एक गहरी सांस लेकर बोली- "थैंक्यू वैरी मच। आपने मेरी जान बचा ली। अगर आप मुझे सैटिसफाई न करते तो शायद मैं इस आग में जलकर मर जाती।"


विनोद ने उसे अपने सीने से चिपका लिया और बोला- "मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा।"


"आप मेरी हालत नहीं समझते। म... म... मैं...।" "निफ्फो हूं। यही कहना चाहती हो न?"


"क...क... क्या?" अंजुमन छिटककर दूर हो गई तथा आश्चर्य से विनोद को देखती हुई बोली- "अ... आप ये सब कैसे जानते हैं?"


"वह एम्पलायर सचमुच बड़ा बेवकूफ होता है, जो अपने एम्लाई के बारे में पूरी जानकारी नहीं रखता। एक-न-एक दिन वह बुरी तरह सात खाता है। जहां तक मेरी बात है, मैं अपने सभी साथियों के बारे में पूरी-पूरी जानकारी हासिल कर चुका हूं। अगर मैं यह काम न निपटा चुका होता तो शोरूम के उद्घाटन के लिए कभी तैयार न होता।"


"म...म... मेरे बारे में क्या जानते हैं आप?" अंजुमन की आवाज धीरे से कांप गई।


"ये पूछो कि क्या नहीं जानता। अगर ब्रीफ में कहूं तो तुम एक ऐसे शख्स की बेटी हो, जिसकी समाज में बहुत इज्जत है। जिसने कभी कोई बुरा काम नहीं किया। जो यहां से बहुत दूर रहता है, अपने परिवार के साथ। जिसने अपनी बेटी को उच्च. शिक्षा के लिए दिल्ली भेजा था। बेटी ने उच्च शिक्षा तो ली, मगर उसके साथ कुछ ऐसा हो गया कि वह निम्योमिनियाक बन गई।"


अंजुमन की आंखें आश्चर्य से फट-सी पड़ीं। वह यूं विनोद को देखने लगी जैसे दुनिया का आठवां आश्चर्य देख रही हो।


"उस शरीफ आदमी की बेटी को तकदीर फिर दिल्ली से आगरा ले आई। उसे स्टूडेंट से कॉलगर्ल बना दिया। उसकी जिंदगी के तार राज बहादुर नामक एक आदमी से जुड़ गए। उस राज बहादुर ने तुम्हें यहां भेज दिया। नौकरी करने के लिए। या फिर यूं कहो कि सी.आई.डी. करने के लिए। वह भी एक ऐसे शख्स की, जिसकी सी.आई.डी. करना खतरे से खाली नहीं।"


अंजुमन की जुबान को जैसे लकवा मार गया। वह जैसे किसी पत्थर की शिला में तब्दील हो गई।


"तुम्हारी जगह कोई और होता तो शायद वह इस वक्त इस दुनिया में न होता।" तभी विनोद का लहजा एकाएक बेहद सर्द हो गया।


"तो फिर...म...मुझे क्यों छोड़ दिया?"


"इसका सीधा-सादा जवाब यह है कि मैं इस बात को जानना चाहता हूं कि राज बहादुर ने तुम्हें मेरे पीछे क्यों लगा रखा है?"


"वह जानना चाहता है कि तुम्हारे पास इतना पैसा कहां से आया?"


"यही तो मैं जानना चाहता हूं कि वह इस बात को क्यों जानना चाहता है?"


"अब यह तो मैं भी नहीं जानती।"


"मैं जानता हूं कि तुम नहीं जानतीं।" विनोद सपाट स्वर में बोला- "तुम भोली हो। नादान हो। तुम्हें यूज किया जा रहा है।"


"मैं अपनी मर्जी से यूज हो रही हूं।"


"एक ही बात है।"

"एक ही बात नहीं है।"


"मैं अपनी बात को रिपीट कर रहा हूं। तुम भोली हो। नादान हो। सच्चाई नहीं समझतीं।"


अंजुमन ने एक गहरी सांस ली, फिर कपड़े पहनने लगी।


"तुम मुझे गलत न समझना।" विनोद बोला- "मैं केवल इसीलिए तुमसे शारीरिक संबंध बनाए हुए हूं, ताकि तुम्हें भटकना न पड़े। अपने बॉस के साथ शारीरिक संबंध होना किसी कॉलगर्ल के पेशे से कहीं इज्जत की बात है।"


"मगर...।"


"मुझे अपनी बदनामी की चिंता नहीं है।" विनोद सपाट स्वर में बोला- "जितनी कि इस बात की कि तुम शोरूम की सेल्सगर्ल होते हुए किसी कॉलगर्ल के रूप में इधर-उधर भटको।"


"लेकिन।" अंजुमन की आवाज कांप गई- "आप भी आखिर कब तक मुझे सहारा दोगे?"


"कुछ सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में छिपे होते हैं। ऐसे सवालों के जवाब ढूंढ़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।"


"मगर सर...।"


"अपने राजा मंडी वाले मकान को छोड़ दो और यहां आकर रहने लग जाओ। यह बंगला बहुत बड़ा है।"


"नहीं रह सकती।"


"क्यों?"


"क्योंकि फिलहाल तो मैं अपने बॉस की प्रेमिका कहलाती हूं। बाद में रखैल कहलाने लगूंगी।"


"तो क्या अब लौट जाओगी?"


"मेरा अपने घर पहुंचना, आपके और मेरे, दोनों के लिए


ठीक है, लेकिन सर...।"


"हां... हां बोलो।"


"राज बहादुर अच्छा इंसान है। शरीफ है। समझदार है। मैं पता लगाने की कोशिश करूंगी कि वह आपके बारे में जानकारी क्यों चाहता है?"

बैरिस्टर विनोद ने धीरे से गर्दन हिलाई, फिर बोला- "कल शाम को शोरूम का उद्घाटन है। तुम इस बात की पूरी कोशिश करना कि कहीं कोई गड़बड़ न हो।"


"आपको किसी गड़बड़ी की आशंका है?"


"आशंका नहीं, गारंटी है। मुझे पूरा विश्वास है कि कल कुछ न कुछ होकर रहेगा।"


"लेकिन सर...।"


"फिक्र मत करो। मैं पूरी तरह सतर्क हूं। कल भी पूरी तरह सतर्क रहूंगा। यहां काम करने वाला हर आदमी पूरी तरह सतर्क रहेगा। तुम भी रहना।"


"जरूर सर।"


"अकेली मत जाना। ड्राइवर को बोलना, तुम्हें घर सुरक्षित छोड़कर आए। ये मेरा हुक्म है।"


फिर वहां से विदा हो गई अंजुमन।





दिन निकलते ही शोरूम के उद्घाटन की तैयारियां शुरू हो गईं। पूरे बंगले को किसी दुल्हन की तरह सजाया गया तथा पूरा स्टाफ अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद नजर आने लगा। स्टाफ के हर आदमी की तरह ही सतर्क थे वैरिस्टर विनोद और अंजुमन ।


लेकिन कहीं कोई संदेहास्पद बात दिखाई नहीं दे रही थी। दूर-दूर तक ऐसा कुछ न था, जिस पर शक किया जा सके। इस प्रकार दोपहर का एक बज गया।


तभी एकाएक वहां एक ऐसा व्यक्ति पहुंचा, जिसके बाल बेतरकीबी से बिखरे हुए थे, चेहरा सूजा हुआ, दोनों पैर चोटों से भरे तथा कपड़े कुछ स्थानों से फटे हुए थे। उसके एक हाथ में बहुत बड़ा कपड़े का थैला था, जिसमें सामान था।


"क्या है?" गार्ड ने उससे पूछा।


"बड़े वकील साहब से मिलना है।" उस आदमी ने जवाब दिया।


"कौन से बड़े वकील साहब ?"