Vakil ka Showroom - 15 in Hindi Thriller by Salim books and stories PDF | वकील का शोरूम - भाग 15

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वकील का शोरूम - भाग 15

“मैं जानती हूं।”


“क...क... क्या मतलब?"


“ये मत समझना कि मैं तुम्हारे इस पैकेट से डर गई हूं। मैं न ऐसे पैकेटों से डरती हूँ और न ही मौत से ।"


तो फिर चीखी क्यों थी?"


"चीखती तो मैं रोज हूं। जहां तक आज की बात है ,मै 

इसलिए चीखी थी ताकि तुम यहां चले आओ। डरने का नाटक इसलिए किया था, ताकि तुम इस बात को कबूल कर लो कि तुमने मुझे भला चंगा साबित करने के लिए यह सब किया था। बाद में यह कबूल इसलिए कर लिया कि मैं भली चंगी हूं, ताकि तुम मेरी हकीकत जानने के बाद आइंदा ऐसी कोई हरकत न करो।”


"लेकिन तुमने ऐसा क्या किया है, जिसका प्रायश्चित करने के लिए तुम एक पागल का जीवन गुजार रही हो?"


“मैं केवल पागल का जीवन ही नहीं गुजार रही, पागल का ट्रीटमेंट भी ले रही हूं। सच तो यह है कि मैं पागल हो जाना चाहती हूं। हमेशा हमेशा के लिए।"


“मगर क्यों... क्यों... क्यों?"


प्रत्युत्तर में रेणु खामोश हो गई।


"तुम बताती क्यों नहीं?" एकाएक चीख पड़ा डॉक्टर सोनेकर तुमने ऐसा क्या किया है, जिसका तुम प्रायश्चित कर रही हो, वह भी इस तरह । पागलखाने में रहकर पागल न होकर भी पागलपन की दवाइयां खाकर यहां तक कि बिजली के शॉक लगवाकर ।”


रेणु ने इस बार भी कोई जवाब नही दिया। उसके चेहरे पर जैसे साफ लिखा था कि वह कुछ न बोलने का पक्का इरादा बना चुकी है।


डॉक्टर सोनेकर फिर कुछ न बोला। चेहरे पर भूचाल जैसे भाव लिए वह लौट पड़ा।


'आखिर क्या लफड़ा है?' वह बड़बड़ाने लगा 'आनंदमयी के कल के बारे में भला यह कैसे जानती है।'

शाम के लगभग 6 बजे ।


अंजुमन कानून के शोरूम में से बाहर निकली। फिर जैसे ही वह बाहर खड़ी अपनी स्कूटी की ओर बढ़ी उसे अपने पीछे एक गुर्राती हुई आवाज सुनाई दी ठहरो ।”


अंजुमन के कदमों को जैसे ब्रेक लग गया। वह पलटी, फिर जैसे ही उसकी नजर सामने खड़े व्यक्ति पर पड़ी, उसके होश फाख्ता हो गए। उस शख्स का आधे से अधिक चेहरा जला हुआ था। आंखें अंगारों की तरह दहकती हुई प्रतीत हो रही थीं। नीचे का जबड़ा लटककर उसे और भयानक रूप प्रदान कर रहा था। अंजुमन का पूरा शरीर उसे देखकर थर थर कांपने लगा। उसे यूं लगा जैसे वह अभी चकराकर गिर पड़ेगी। बड़ी


मुश्किल से उसने खुद को संभाला, फिर मरी हुई आवाज में बोली- 'त......तुम?" "पहचान लिया मुझे ?” वह शख्स किसी घायल चीते की तरह गुर्राया।


"ह...हां ।” वह टूटी आवाज में बोली- "तुम ज्वाला हो ।”


"पूरा नाम ज्वाला प्रकाश है।"


“हो वही ल... लेकिन न तुम...य... यहां क्यो  आए हो?" "समझा उस वकील के घोड़े को।" वह शख्स गुर्रा उठा - "बंद करे कानून की इस दुकान को। नहीं होने दूंगा में


ऐसा मेरे होते कानून को कोई नहीं बेच सकता। मां मानता


हूं में कानून को कोई मेरी मां को बेचे यह मुझे मंजूर नहीं।" "ओह!” अंजुमन के नेत्र फैल गए - "त... तो तुम्हीं हो वह शख्स जिसनै बैरिस्टर विनोद को फोन कर शोरूम बंद करने की धमकी दी थी?"


"हां दी थी, लेकिन लगता है, वह मेरी बात नहीं मानेगा। तू समझा उसे नहीं समझाएगी तो...?" "त...त... तो क्या?"


"आनंदमयी की आत्मा तुझे नहीं छोड़ेगी। मुझे देख। उसने मेरा चेहरा जला डाला है। वह तेरा चेहरा भी जला देगी?"

"न...न... नहीं।”


"कानून की खिलाफत हाथ की पहली ली न है। वह शख्स अपने दाई जोर-जोर से हिलाते हुए बोला- उससे भी बड़ा जुर्म है कानून की खिलाफत करने वालों का साथ देना।"


मैं किसी का साथ नहीं दे रही। मैं नौकरी कर रही हूं।"


नौकरी हा...हा...हा...हा...हा... ।” वह भयानक ढंग से हंसा तू नौकरी कर रही है? जिसके एक इशारे पर मर्द जात तलवे चाटने लगे, वह नौकरी कर रही है?"


"म...म...मैं वाकई यहां नौकरी कर रही हूं।"


"बंद कर अपनी बकवास ।” वह चीख पड़ा में यहां बकवास सुनने नही आया। तू समझाना उस वकील को नहीं समझेगा, तो बहुत पछताएगा।"


"तुम खुद ही क्यों नहीं समझा देते?"


“समझाऊंगा।” उसका स्वर बेहद कठोर हो गया अगर तू तू नहीं समझाएगी, तो फिर मैं ही समझाऊंगा। इतने बढ़िया ढंग से समझाऊंगा कि फिर वह कुछ समझने के काबिल ही नहीं रहेगा।”


इसके बाद एक क्षण भी वहां न रुका वह शख्स । एक ही झटके से पलटने के बाद वह तेज-तेज कदमों से चलता हुआ अंजुमन की नजरों से ओझल हो गया। उसके जाने के बाद अंजुमन ने खुद को संभाला, फिर तेजी से दौड़ती हुई शोरूम के भीतर जा पहुंची। बैरिस्टर विनोद अपनी सीट पर मौजूद था। वह उसके करीब पहुंचकर जोर-जोर से हांफने लगी विनोद ने जब उसकी हालत देखी तो 

हैरान रह गया। “क्या हुआ?" उसने पूछा- "तुम ठीक तो हो अंजुमन ?"


"हां । म......मैं ठीक हूं।” अंजुमन एक कुर्सी पर गिरती हुई-सी बोली- "लेकिन हालात ठीक नहीं लग रहे ।” “क...क... क्या मतलब?”


अंजुमन ने जल्दी-जल्दी पूरी बात बताई। सुनकर अपनी सीट से उछल पड़ा विनोद ।

"वह किधर गया है? उसने पूछ।


कोर्ट की तरफ जवाब मिला।


फिर वहां एक क्षण भी न रुका विनोद वह किसी बगोले की तरह वहां से भागा।

रेणु की ओर एकटक देखे जा रही थी खंभे के साथ बंधी लगभग एक दर्जन पागल औरतें। रह-रहकर वे ठहाके लगा रही थी, तो कभी जोर-जोर से रो रही थी, लेकिन रेणु को तो जैसे उनकी परवाह ही नहीं थी। फिर एकाएक रहस्यमय ढंग से चुप हो गई वे सारी औरतें।


"हरामजादी।" फिर एक बड़बड़ाई "हमें मूर्ख बना रही है। ऐसा जाहिर कर रही है, जैसे हम कुछ जानती ही नहीं।"


"लेकिन इसका कोई फायदा नहीं होगा।" फिर दूसरी बड़बड़ाई "हमारे होते इसका कोई षड्यंत्र कामयाब नहीं होगा। हम एक दर्जन हैं। चौबीस घंटे न केवल इस पर नजर रख सकती हैं, बल्कि जब चाहें इसे मक्खी मच्छर की तरह मसल भी सकती हैं।"


"फिर भी दुश्मन को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए।" एक और बोली- "बहुत बार ऐसा होता है कि जिस दुश्मन को हम बहुत कमजोर समझ रहे होते हैं, वही मात दे जाता है।"


"हम मात नहीं खा सकती।" पहले वाली गुराई - "हम उस शख्स की यवनियां हैं, जिसने आज तक कभी मात नहीं खाई। जो हमेशा दूसरों को मात देने में माहिर रहा है, जिसने कभी हारना नहीं सीखा।"


"फिर भी। चौकस रहो । चौकन्ने रहो। मालिक ने कहा है, यहां आज-कल में कोई बहुत बड़ी गडबड होने वाली है और वह गडबड इसी छोकरी के कारण होगी।"


"कुछ नहीं होगा। यह छोकरी कर ही क्या सकती है। वह भी उस सूरत में, जब उसके हाथ-पांव बंधे हुए हैं।" फिर कोई कुछ नहीं बोला। उन औरतों ने फिर पागलों की


तरह ठहाके लगाने शुरू कर दिए।