शाम के पांच बज चुके थे।
सी.आई.डी. कार्यालय में इंस्पेक्टर ममता अपनी सीट पर बैठी चाय की चुस्कियां ले रही थी। उसके ठीक सामने एक कुर्सी पर बैठा था ओमप्रकाश
लम्बे कद व सांवले रंग का रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुका एक ए.एस.आई. । उसके हाथ में भी चाय का कप था।
“हो तो ओमप्रकाश ।” ममता ने चाय की एक लंबी घूंट लेकर पूछा- "तुम क्या कह रहे थे?"
"मैं ये कहूं था मैडम जी।” ओमप्रकाश हरियाणवी बोली में बोला- “उस वकीलां की दुकान का ख्याल छोड़ दयो । किमें कुछ नी धरया।"
"यानी शहर में कानून की सरेआम बेइज्जती होती रहे? उसे इस तरह सजा-धजाकर बेचा जाए और हम कुछ भी न
करें?"
“समझदारी इस्से मैं है जी।"
"लगता है, तुझे वकीलों से बहुत डर लगता है।
"काले कोट आलयां से कूण नहीं डरता मैडम जी? कहीं भी फसा मारें। कित्तै टांग दें। इनका कोए भरोसा नई ।"
"मैने तुझे यहाँ भाषण देने के लिए बुलाया है क्या?" "नहीं जी। आपने तो मन्ने चाय पीण बुलाया है। वो में पीण ई लग रहया हूं।"
"ओमप्रकाश । मैंने तुझे यहां चाय पर नहीं बुलाया। तुझे इसलिए बुलाया है कि तू उस शोरूम को बंद करवाने का कर रास्ता सुझा ।"
"इब्बे लो जी। रास्ता ई रास्ता सुझा यूँगा। आप सूझणे वाली
बणो ।”
"शाबाश! यह हुई न बात । बता फटाफट, इस शोरूम को किस तरह बंद करवाया जा सकता है?"
"चा पी ल्यूं?"
"जरूर जरूर । और पीनी है तो और मंगवा ।" या ई बहोत है मैडम जी। गुण करेगी तो। नहीं गुण करणी होगी। तो चाहे चाय से नहा ल्यो। कुछ नहीं होगा।"
"अब अपनी चाय खत्म कर। मैं तेरा सुझाव सुनना चाहती हूं।"
ओमप्रकाश ने जल्दी-जल्दी चाय सुड़की, फिर कप मेज पर टिका दिया।
"एक बीड़ी और पी ल्यू?" फिर उसने ममता से
पूछा ।
"बिल्कुल नहीं। बिल्कुल नहीं।"
"अच्छी बात नई पीता बीड़ी। रास्ता सुझाता हूं।"
"सुझा । जल्दी सुझा ।"
औमप्रकाश ने यूँ दाएं बाएं देखा, जैसे उसे इस बात का खतरा हो कि कोई उनकी बातें सुन तो नहीं रहा। फिर वह अपना चेहरा यूं आगे ले आया, जैसे कोई भेद भरी बात कहना चाहता हो।
"अब कुछ बोल भी ।” ममता झल्लाकर बोली ।
"हाइड एंड सर्च ।” ओमप्रकाश फुसफुसाकर बोला- "दि
बेस्ट वे टू क्लोज दा शोरूम ।”
“क्या मतलब?"
“मतलब ये है मैडम जी कि शोरूम में कोई गड़बड़ी वाला सामान पहल्यां तो छुपा दयो, फिर उसको तलाश कर ल्यो ।”
“समझ गई। तुम ये कहना चाहते हो कि पहले तो शोरूम में कोई गैर-कानूनी सामान चुपके से रखवा दिया जाए और बाद में वहां छापा मारा जाए
"या ई बात है जी। आप समझ गए हो मेरी बात को।”
"दम तो है तेरी बात में।" ममता बोली- लेकिन इसमें कुछ दिक्कत आ सकती है।"
"किस बात की दिक्कत जी?"
"पहली बात तो ये कि वहां जो सामान रखा जाएगा, वह कहां से आएगा?"
"आप बी मैडम जी बड़ी अजीब बात करो। पुलिस के पास सामान के क्या तोडे ? आप सी.आई.डी. की इंस्पेक्टर हो। आप चाहो तो माल ई माल पैदा हो
जाएगा।"
"लेकिन कैसे?"
"इंडिया की पुलिस की सबसे बड़ी खासियत या ई तो है कि वो हर उस अड्डे के बारे में जाणे है, जहां जुरम होता है
तू कहना क्या चाहता है?"
चूरा पोस्त का एक कट्टा बहोत है।” ओमप्रकाश धीरे से बोला- "और उस एक कटूटे का इंतजाम करणा कौण-सा मुश्किल है।”
"मेरे लिए बहुत मुश्किल है।” ममता सपाट स्वर में बोली- क्योंकि मैं गलत काम करने वालों से महीना नहीं खाती, इसलिए एक कटूटा तो क्या, एक ग्राम का इंतजाम करना भी मेरे लिए मुश्किल है।"
"मेरे खातर (लिए) कोई मुश्किल नहीं है। मैं कर गा इंतजाम । शोरूम के भीतर पहुंचा भी देऊंगा। आप इस छापा मारकर बरामद कर लेना।
"कोई और रास्ता नहीं हो सकता क्या?"
"बहोत रास्ते हैं, लेकिन मैडम जी, यो रास्ता चोखा है। नशीले पदार्थ की तस्करी में मोटी सजा है। दस साल, बारह साल, चौदह साल । सारे काले कोट वाले भीतर हो जाएंगे और शोरूम पर ताला लटक जाएगा।”
“ठीक है।” ममता गहरी सांस लेकर बोली- "यही सही। तुम करो चोरा पोस्त का इंतजाम ।उसे किसी तरह पहुंचाओं कानून के शोरूम में। मैं भी करती हूं छापे का इंतजाम ।”
ओमप्रकाश धीरे-धीरे सहमति में गर्दन हिलाने लगा।
रेणु की चीखों से गूंज उठा पागलखाना। उसकी चीखों में भय था। आतंक था और साथ ही था मौत
का खौफ। उसकी नजरें उस पैकेट पर टिकी थीं, जिन्हें दो आदमी वहां रखकर गए थे तथा उसे टाइम बम बताया था। उसकी चीखों की आवाज सुनकर जो पहला आदमी वहां पहुंचा, वह था डॉक्टर प्रकाश सोनेकर उसे देखते ही रेणु की चीखें अपने आप रुक गईं तथा पूरा शरीर थर थर कांपने लगा। डॉक्टर सोनेकर धीरे-धीरे चलता हुआ उसके करीब पहुंचा, फिर उसे ध्यानपूर्वक देखने लगा।
“क्या बात है?" फिर वह सामान्य स्वर में बोला- तुम इस तरह चिल्ला क्यों रही थीं? क्या हुआ?"
रेणु ने पहले भयभीत नजरों से डॉक्टर सोनेकर की ओर तथा बाद में पैकेट की ओर देखा।
“समझ गया।” सोनेकर मुस्कराकर बोला- तुम टाइम बम से डर रही हो, जो कभी भी फट सकता है।"
रेणु ने व्याकुल नजरों से इधर-उधर देखा, मगर बोली एक शब्द भी नहीं।
"फिक मत करो।” सोनेकर ने एक गहरी सांस लेकर कहा- यह टाइम बम केवल पागल रेणू को नुकसान पहुंचाएगा। अगर रेणु पागल नहीं है तो उसे यह कुछ भी नहीं कहेगा ।
रेणु के चेहरे ने एक साथ कई रंग बदले। अगले ही पल उसने डॉक्टर सोनेकर की ओर देखा, फिर उसे करीब आने का इशारा किया। सोनेकर तत्काल निकट पहुंचा।
“मैं पागल हूं।” फिर वह यूं बोली, जैसे नींद में बड़बड़ा रही हो- "अगर तुमने मुझे भला चंगा साबित करने की कोशिश की तो तुम्हारी खैर नहीं।"
“क...क... क्या मतलब?"
"कभी ऊटी गए हो?" रेणु ने पूछा। “ऊ...ऊ...ऊटी?" डॉक्टर चौंका
"वहां की पहाड़ियां बहुत ही सुंदर हैं।” रेणु धीरे से बोली- "उन पहाड़ियों में माँ काली का एक प्राचीन मंदिर है। देखा है कभी?"
डॉक्टर के चेहरे ने एक साथ कई रंग बदले, लेकिन वह बोला कुछ भी नहीं ।
"वहां उस मंदिर में कभी एक पुजारिन रहा करती थी।"
"वहां उस मंदिर में कभी रेणु आगे बोली- "आनंदमयी नाम था उसका आप जानते
हैं उसे ?"
इस बार तो सोनेकर का चेहरा राख की तरह सफेद पड़ गया।
"त......तुम कहना क्या चाहती हो?” फिर वह धीरे से चीख-सा पड़ा।
"सिर्फ इतना कि उसके कातिल को आज भी पुलिस ढूंढ रही है। अगर मुझे कुछ हो गया तो कातिल का पता ठिकाना पुलिस के पास पहुंच जाएगा। कुछ ऐसा इंतजाम कर दिया है मैंने ?"
"त...त... तुम कातिल हो जानती हो?"
"अच्छी तरह । खूब अच्छी तरह । वह इस वक्त मेरे सामने खड़ा है।"
"नहींsss" सोनेकर चीख पड़ा- "मैंने नही किया उसका कल?"
“यह बात बाद में पुलिस को बताना ।”
“ल...ल... लेकिन अगर तुम पागल नहीं हो तो यहां क्या
कर रही हो?"
“पश्चाताप ।”
“क्या मतलब?"
“मतलब फिलहाल नहीं समझाया जा सकता।" रेणु बड़बड़ाई - "तुम्हारे लिए बेहतर यही होगा कि अपनी स्थिति को समझो और इस पैकेट को उठाकर फिलहाल दफा हो जाओ ।”
"उस पैकेट से मत घबराओ। उसमें विस्फोटक कुछ भी नहीं है।”