हम इस पीढ़ी की लड़कियां
अपने मां जैसे नहीं बनना चाहती।
देखा है मां को घुट घुट के जीते हुए
अपने अरमानों को दिल में गाड़कर
किसी कोने में रोते हुए..
दिल में दर्द दबाकर लबों पे मुस्कान
सजाकर संस्कार तले दबे हुए..
हम आज की पीढ़ी की लड़कियां हैं
साहब.......
अपने दम पर उड़ान भरना जानती है
स्वतंत्रता मतलब व्यभिचार नहीं हम
अपनी हदे पहचानती है,
अगर पढ़ी जरूरत तो मर्द जात का ईगो
घसीटकर जमीन में गाड़ देती हैं।
हम आज की पीढ़ी की लड़कियां हैं ....