घुमुरा की प्रतिध्वनि❤️
कलाहांडी के सुंदर पहाड़ी क्षेत्र, घने साल के वृक्षों की छाया और कल-कल बहती नदी के किनारे एक आदिवासी युवक गोविंद और चंचल युवती माधवी का निश्छल प्रेम पनपा था।
गोविंद घुमुरा वादन में निपुण था। उसके हाथों की थाप से घुमुरा से निकलने वाली गंभीर ध्वनि पहाड़ियों की सीमाओं को पार कर सीधे माधवी के हृदय को छू जाती थी। घुमुरा की एक विशेष ताल और उसकी ध्वनि ही उनके गुप्त मिलन का संकेत थी।
लेकिन उनके गाँवों के बीच चली आ रही पुरानी दुश्मनी उनके प्रेम की राह में बाधा बन गई। दोनों गाँवों के मुखियाओं ने उनके मिलन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। माधवी को अपने ही गाँव की सीमा के भीतर रहने के लिए बाध्य कर दिया गया।
फिर चैत्र पर्व की रात आई।
वर्ष की उस विशेष रात में सभी गाँववासी एकत्र होकर नृत्य और गीतों का उत्सव मनाते थे। उसी रात घुमुरा के वादन की गूँज चारों ओर फैलने लगी।
गोविंद अपने घुमुरा में अपना सारा विरह और दर्द उड़ेलकर बजाने लगा। उसकी गंभीर थाप में जैसे प्रेम की पुकार, विरह की पीड़ा और एक निश्छल हृदय की व्याकुलता समाई हुई थी।
वह आवाज़ सुनकर माधवी स्वयं को और रोक नहीं सकी। घुमुरा की प्रतिध्वनि का अनुसरण करते हुए वह उस शांत रात में जंगल की पगडंडी से दौड़ती हुई चली गई।
मांदल और घुमुरा की तेज होती ताल के बीच वह उत्सव के मंच तक पहुँची और सबके सामने गोविंद के सामने आ खड़ी हुई।
घुमुरा की थाप पर दोनों का मिलन हुआ। फिर दोनों ने ऐसा मनमोहक नृत्य किया कि उन्हें देखकर वहाँ उपस्थित ग्रामीणों के मन से वर्षों पुराना क्रोध जैसे धीरे-धीरे मिटने लगा।
घुमुरा की उस पवित्र ध्वनि ने दो शत्रु गाँवों को एक-दूसरे के करीब ला दिया।
उस दिन के बाद कलाहांडी की लोककथाओं में घुमुरा केवल एक वाद्य नहीं रहा, बल्कि वह ऐसे अमर प्रेम का प्रतीक बन गया, जिसने विरह को मिलन में बदल दिया।
~अनामिका✍️