🙂मन की लालसा ☺️
मैं यह चाहती हूं,
पर हो नहीं रही है।
मन की मनवा ही खींचे,
मान नहीं रही है।
चाहती हूं छोड़ दु,
पर छूट नहीं रही है।
ऊंचे ख्याल से मन,
छूट नहीं रही है।
मां को मानव ही छोड़,
सी रही है।
अपने पर व्यंगय कसे,
तो आंसु निकल रही है।
नवीन ख्याल आवत है,
सोच सोच कर उक सावत है।
अक्षर मनवा चाहत है,
पर हट नहीं रही है।
कोशिश हम नहीं छोड़ेंगे,
जब तक पा न लें।