अंतर्मन का द्वंद्व
क्यों अपराधबोध से भर उठता है मेरा मन?
क्यों अपनी ही रचनाओं को पढ़ते हुए भावों से भर उठती हूँ मैं?
क्यों किसी की सहायता लेने में हिचकिचाती हूँ मैं?
क्यों कविता रचने की उत्कंठा मुझे बार-बार पुकारती है,
फिर भी मन किसी अनजाने भय से घिर जाता है?
क्यों अपनी छोटी-छोटी त्रुटियों को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाती?
क्यों लगता है कि यदि भाषा, व्याकरण, लय, तुक और प्रवाह को सँवारने में
किसी यंत्र का थोड़ा-सा सहयोग ले लूँ,
तो कहीं मेरा कवित्री बनने का स्वप्न अधूरा न रह जाए?
क्या सहायता लेना मेरी मौलिकता को कम कर देगा?
या मेरी अभिव्यक्ति को और अधिक स्पष्ट, सशक्त और प्रभावी बना देगा?
क्यों मेरी रचनाओं में अनायास ही पीड़ा उतर आती है?
क्यों प्रत्येक पंक्ति मेरे अंतर्मन का स्वर बन जाती है?
शायद इसलिए कि हर शब्द मेरे हृदय से जन्म लेता है,
और हर भाव मेरे जीवन के अनुभवों से आकार पाता है।
मैं जानती हूँ—
भाव मेरे हैं,
विचार मेरे हैं,
अनुभूतियाँ मेरी हैं।
यदि कोई केवल मेरी भाषा को सँवार दे,
मेरे शब्दों को अधिक सुसंगत, सहज और प्रभावशाली बना दे,
तो भी मेरी रचना की आत्मा मेरी ही रहेगी।
ठान लिया है अब मैंने—
पीछे नहीं हटूँगी रचना करने से।
अपने इस रचनात्मक सफ़र में
अपने मुकाम तक पहुँचकर रहूँगी।
आकाश की निर्मलता-सा स्वच्छ रखूँगी अपने विचारों को।
बादलों की ओट में नहीं,
सत्य के प्रकाश में डटकर खड़ी रहूँगी।
मेरी रचनाएँ भी निर्मल आकाश-सी
स्वच्छ, उजली और निष्कलुष होंगी।
नदी की अविरल धारा-सी
मेरी काव्य-यात्रा निरंतर बहती रहेगी।
हर मोड़ पर नए छंद,
नए शब्द और नए भाव जन्म लेते रहेंगे।
सागर की अथाह गहराइयों से
विचारों के अनमोल मोती चुनूँगी,
और उन्हें ऐसे शब्दों में पिरोऊँगी
जो पाठकों के हृदय को स्पर्श करें।
हर परिस्थिति मुझे कुछ न कुछ सिखाकर जाएगी,
जिससे मैं अपने जीवन में और बेहतर बन सकूँगी।
सदैव तत्पर रहूँगी
अपनी रचनाओं को गढ़ने और निखारने में।
कभी न डरूँगी,
कभी न रुकूँगी,
कभी अपने विश्वास को टूटने नहीं दूँगी।
अपने कवित्री बनने के स्वप्न को
अपने शब्दों, अपने भावों और अपने सतत प्रयासों से
एक दिन अवश्य साकार करूँगी।