आज वापस ले आया डाकिया खत मेरा।
हाथ में पीला पड़ चुका लिफाफा था।
ऊपर तुम्हारा नाम, नीचे मेरा पता।
और कोने में लाल स्याही से लिखा था -
_बोला पता सही था लेकिन लोग बदल गए.._
मैंने पूछा, "कब से?"
डाकिया बोला, "पता नहीं साहब।
पिछले 3 महीने से हर हफ्ते यही खत आता है।
पहले गेट पर ताला था।
फिर ताले पर नया नाम।
अब तो घर में किराएदार रहते हैं।"
मैंने लिफाफा खोला।
3 पन्ने थे।
पहले पन्ने पर लिखा था - "तुम्हारे बिना नींद नहीं आती"
दूसरे पर - "तुम्हारी हंसी के बिना चाय फीकी लगती है"
तीसरे पर - "लौट आओ, सब माफ कर दूंगा"
स्याही अभी भी गीली थी।
शायद आंसुओं की वजह से।
या शायद इसलिए कि इंतज़ार कभी सूखता ही नहीं।
मैं उस घर के सामने घंटों खड़ा रहा।
खिड़की वही थी जहां तुम चाय पीती थी।
दीवार वही थी जहां तुम्हारी परछाई बनती थी।
बस तुम नहीं थी।
डाकिया चला गया।
मैंने खत जेब में रखा और घर आ गया।
अब वो खत मेरी डायरी में है।
न भेजा गया, न फाड़ा गया।
क्योंकि कुछ खत मंजिल तक नहीं पहुंचते।
वो हमें ही मंजिल बना देते हैं।
और कुछ लोग...
पते सही होने के बाद भी
गलत हो जाते हैं..
Kushal K Pawar...