विशाल
भाग 1
उसने घर की खिड़की खोली, जिससे छनकर आती रोशनी कमरे में बिखर गई। उसने पंखा बंद किया और स्नान किया। नहाकर बाहर आने के बाद वह कुछ देर अपने छोटे से कमरे के बिस्तर पर बैठा रहा। विचार उसके दिमाग में उफन रहे थे, लेकिन कोई भी स्पष्ट रूप से बाहर नहीं आ रहा था।
तभी दीवार घड़ी की 'टिक-टिक' ने उसका ध्यान खींचा। "नौ बज गए। स्कूल पहुँचने में देर हो जाएगी।" वह झट से उठा, किवाड़ बंद किए और मोटा ताला लगा दिया। फिर कदम स्कूल की ओर बढ़ा दिए।
जब वह नुक्कड़ पर स्थित 'बजरंग पान भंडार' के सामने पहुँचा, तो एक आवाज़ आई, "कैसे हो मास्टर जी?" उसने पलटकर जवाब दिया, "मैं ठीक हूँ दिनेश। तुम कैसे हो?" दिनेश कुटिल मुस्कान के साथ बोला। उसकी तंग भौहें और आँखों की चमक उसके पीछे के भावों को साफ बयां कर रही थी। विशाल पेशे से अध्यापक था। अपनी चालीस साल की लंबी उम्र में उसने कितने ही बच्चों को पढ़ाया और आगे बढ़ाया, लेकिन खुद जीवन का एक बड़ा सबक नहीं सीख पाया, जो समय ने उसे सिखाया था।
"भैया, चिमनगंज तक चलना है," विशाल ने एक रिक्शा रोकते हुए कहा। रिक्शा रुका और वह उसमें बैठ गया। विशाल की निगाहें सामने बैठी एक लड़की पर पड़ीं, जो अपने फोन में मशगूल थी। उसके खुले बाल और दमकता चेहरा काफी आकर्षक लग रहा था। विशाल ने अपनी नज़रें हटाईं, पर वे बार-बार उसी पर जा टिकती थीं। रिक्शा सरपट दौड़ रहा था। एक सवारी को उतारने के लिए जैसे ही चालक ने ब्रेक लगाया, उस लड़की का फोन उसके सिर से टकराकर नीचे गिर गया। जैसे ही वह उसे उठाने के लिए झुकी, विशाल की निगाहें अनचाहे ही उसके वक्ष पर जा टिकीं।
वह स्वयं को इन हरकतों के लिए अपराधी मानता था, फिर भी उसका ध्यान अनायास ही उधर चला जाता था। जिस पर उसकी नज़रें टिकी थीं, वह लड़की इस गंदी ललक को भाँप गई और स्वयं को ढंक लिया।
शहर का नया दिन अभी भी खुद को व्यवस्थित करने में लगा था। बाहर की खुली हवा विशाल के चेहरे को छूकर अपने होने का अहसास दिला रही थी। उसने आँखें मूँद लीं ताकि उस पवन को महसूस कर सके। उसके बंद आँखों के पीछे ख्याल तैरने ही लगे थे कि गाड़ी फिर रुकी।"चिमनगंज! चिमनगंज!" इस आवाज़ पर वह हड़बड़ाकर उठा, किराया दिया और स्कूल की ओर बढ़ गया। विद्यालय का रास्ता एक गली से होकर जाता है।
उस रास्ते के एक कोने पर गणेश जी का एक छोटा चबूतरा है। आज भी वह वहाँ रुककर उस चबूतरे को कुछ देर देखता रहा। एक समय था जब उसकी ईश्वर में बड़ी आस्था थी। लेकिन पिछले तीन सालों से उसने उस चबूतरे को देखा तो, लेकिन न समाज बदला, न ही उसके देवता।
वहाँ अब उसका विश्वास पूरी तरह समाप्त हो चुका था। उसे किसी बात में दिलचस्पी नहीं रही थी।