—बारिश के बाद—
थम जाने दो बारिश, फिर देखते हैं,
कि दरिया सारे कब तक बहकते हैं।
निकल जाएगा मौसम जब बरसात का,
कुछ वक्त वहाँ जाकर फिर हम ठहरते हैं।
गुज़रे कोई मुसाफ़िर तो पूछ लेंगे,
कि क्यों किनारों पर लोग बैठते हैं?
शायद कुछ यादें यहाँ रह गई होंगी उनकी,
जो इस दरिया में वो घंटों तक ढूँढते हैं।
- MASHAALLHA