“पिंजरा नहीं, घोंसला …“
कहते हैं कि जिस चिड़िया के आगे रोज़ दाना रख दिया जाए, जिसके लिए पानी का कटोरा भर दिया जाए, उसे और क्या चाहिए।
मगर किसी ने कभी उसकी आँखों में झाँककर यह नहीं देखा कि उसकी भूख दाने की नहीं, उड़ान की होती है।
मेरे पिंजरे में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं रही। दाना भी था, पानी भी था, धूप से बचाने के लिए छाँव भी थी।
कमी अगर थी, तो बस उस खुले आसमान की, जहाँ मैं अपने पंख अपनी मर्ज़ी से फैला सकूँ।
मैं अपना दाना किसी के हाथ से नहीं खाना चाहती।
मैं चाहती हूँ कि सुबह की पहली धूप के साथ उड़ूँ, किसी अनजान छत पर बैठूँ।
आँगन में बिखरे दो दाने अपनी चोंच से चुनूँ और फिर किसी पेड़ की डाल पर बैठी गिलहरी के साथ एक ही पोखर से पानी पी लूँ।
शायद उस पानी में मिट्टी की खुशबू होगी, आज़ादी का स्वाद होगा।
सोने के कटोरे का पानी कभी वह स्वाद नहीं दे पाया।
लोग कहते हैं कि कैद में रहने वाली चिड़िया सुरक्षित रहती है।
उसे न भूख सताती है, न मौसम का डर होता है।
मगर उन्हें कौन समझाए कि डर से बड़ी भी एक कैद होती है।
और वह है बिना जिए पूरी उम्र गुज़ार देना।
सुरक्षित रहना और जीवित रहना, दोनों एक बात नहीं होते।
मुझे कभी सोने का पिंजरा नहीं चाहिए था।
मैंने तो बस एक पेड़ की सबसे पतली टहनी माँगी थी।
जहाँ हवा तेज़ चलती हो, जहाँ गिरने का डर भी हो और उड़ना सीखने की गुंजाइश भी।
मैं अपना घर किसी और के हाथों बना हुआ नहीं देखना चाहती।
मैं चाहती हूँ कि एक-एक तिनका अपनी चोंच से उठाऊँ, उसे कई बार गिराऊँ, फिर दोबारा जोड़ूँ।
क्योंकि घोंसले लकड़ियों से नहीं, मेहनत और उम्मीद से बनते हैं।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ, क्या सचमुच प्रेम किसी को अपने पास बाँध लेने का नाम है?
अगर है, तो फिर पिंजरे में बंद हर चिड़िया सबसे ज़्यादा प्रेम की हक़दार होगी।
लेकिन नहीं…
प्रेम वह है जो पंखों पर भरोसा करे, उड़ानों से डरे नहीं और लौट आने की ज़िद भी न करे।
जिस दिन पिंजरे का दरवाज़ा खुलेगा, शायद मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूँगी।
इसलिए नहीं कि मुझे उस जगह से नफ़रत होगी, बल्कि इसलिए कि मेरी आँखें पहली बार इतने बड़े आसमान को देख रही होंगी।
मुझे नहीं पता होगा कि मेरा पहला बसेरा कहाँ होगा, पहली बारिश कहाँ मिलेगी और पहली रात किस डाल पर कटेगी।
मगर मुझे इतना यक़ीन होगा कि वह हर तिनका, हर दाना और हर घूँट पानी मेरा अपना होगा।
मैं पिंजरे से भागना नहीं चाहती।
मैं बस अपने हिस्से का आकाश माँगती हूँ।
मैं किसी और का बनाया हुआ घर नहीं चाहती।
मैं अपना घोंसला बनाना चाहती हूँ।
जहाँ हर तिनका मेरी मेहनत का हो, हर सुबह मेरी उड़ान की हो।
और हर शाम मुझे यह सुकून दे कि मैंने अपनी ज़िंदगी उधार में नहीं, अपनी शर्तों पर जी है।
क्योंकि मैं चिड़िया हूँ।
मुझे दाने से पहले दिशा चाहिए, कैद से पहले खुला आसमान चाहिए।
और पिंजरे से कहीं ज़्यादा… अपना बनाया हुआ एक छोटा-सा घोंसला चाहिए।
प्राची गुर्जर…..