सुकूत के उस पार
सभी के हाथ में किरदार की तहरीर नहीं है,
मगर कोई भी अपने वक़्त से बेग़ैर नहीं है।
वो जिनके नाम पर तहज़ीब के क़िस्से हैं बहुत,
उन्हीं के शहर में इंसान की तौक़ीर नहीं है।
अजीब दौर है, सच बोलना इल्ज़ाम हुआ,
ज़ुबाँ तो सबके पास है, मगर ज़मीर नहीं है।
मैं अपने अह्द के अख़बार पर हैरान हूँ बहुत,
यहाँ ख़बर तो बहुत है, मगर तफ़्सीर नहीं है।
किसी के ख़्वाब की क़ीमत लगी है मंडी में,
किसी की आँख में बाक़ी कोई ताबीर नहीं है।
जो लोग भूख को आँकड़ों में बदल देते हैं,
उन्हें ग़रीब के चेहरे की कोई तासीर नहीं है।
कई सदियों से जो दरिया का रुख़ मोड़े हुए हैं,
उन्हीं को लगता है साहिल की कोई पीर नहीं है।
निहाल, अहल-ए-सुख़न होने का मतलब ये भी है,
जहाँ सुकूत हो, कहना कि सब ख़ैर नहीं है।