दश्त ए सहरा में मत छाँव तलाश कर
मेरे शहर में आके ना अपना गाँव तलाश कर
प्यास ही में न दम निकल जायें तेरा
उठ, जल्द कोई दरिया तलाश कर
तारा तो मैं गिरा दूँं जमीन पर
बस तू कोई पत्थर तलाश कर
खुद को ढुढ़ रहे हो क्यूं यहाँ वहाँ
बाजारों में जा, आईना तलाश कर
इस पर होगें कल आशियाने परिंदों के आंधियों,गिराने को कोई दूसरा दरख्त
तलाश कर
सूली चढ़ गये कातिल तेरे
इत्मीनान से अब, अपने सर को तलाश कर