मैं एक कहानी हूँ ' हर युग में पढ़ी जाती हूँ।
इतिहास बन गयी हूँ ' लाज बन गयी हूँ ।
जन्म - जन्मांतर जी -जी कर मरती हूँ ।
मर -मर कर जीती हूँ ।
अपना अस्तित्व खोती हूं स्वाभिमान खोती हूं ।
घर की लाज मैं हूं , धर्म मर्यादा संस्कार मुझ से ही लागू है।
त्याग परित्याग की अग्नि मे तपती हूँ ' पुत्री बन अग्नि परीक्षा का प्रमाण मैं ही हूँ । सर्वगुणसंपन्न का दामन मुझे ही ओढ़ना है। सती हूं ' सावित्री ' हूं ' तारा हूँ ' राधा रुकमणी हर वार अग्नि मे नपती सीता हूँ ।
बेटी होने का दण्ड भोगती आयी हूँ।
गंगा सी पवित्र हूँ , फिर भी पुरुष प्रधान समाज है।
हर वार महिला पर ही लंछा लगाया है।
शैतानी नजरो ने हर जुर्म सहती आयी हूँ
घर की लक्ष्मी में हूँ ' भ्रम मे जीती आयी हूँ
माँ बन हर दर्द सहती हूं ' रंगो में बहने वाला रक्त की हर बूंद का प्रमाण देती आयी हूँ बच्चो के खातिर हर कठोरता को अपनाया है। सम्मान सम्मान ही खोजती आयी हूँ ।
- Nandini Agarwal Apne Kalam Sein