🖋️ शीर्षक: “खुद से मुलाक़ात”
आज आईने ने मुझसे एक सवाल पूछा,
तू हँस तो रही है… पर क्या सच में खुश है?
मैं थोड़ी देर चुप रही,
फिर अपनी ही नज़रों से नज़रें चुरा लीं।
लोग कहते हैं, वक़्त सब ठीक कर देता है,
पर कुछ ज़ख्म ऐसे होते हैं
जो वक़्त के साथ भी
बस चुपचाप साँस लेते रहते हैं।
मैं रोज़ खुद को समझाती हूँ —
“मज़बूत बन, सब ठीक हो जाएगा,”
पर हर रात,
तकिए पर गिरते आँसू
मेरी सारी हिम्मत बहा ले जाते हैं।
मैंने सीखा है मुस्कुराना,
अपने टूटे हिस्सों को छुपाना,
और इस भीड़ में भी
अकेले चलना।
पर आज दिल ने कहा —
थक गई हूँ मैं…
हर किसी के लिए मजबूत बनते-बनते,
खुद के लिए कमज़ोर हो गई हूँ।
शायद अब वक़्त है,
खुद से प्यार करना सीखने का,
दुनिया को नहीं…
पहले खुद को समझने का।
क्योंकि
हर जंग दूसरों से नहीं होती,
कुछ लड़ाइयाँ
खुद से भी लड़ी जाती हैं।