चाँद पर पहुँची… और हम?
विदेश की महिलाएँ
रॉकेट पकड़कर चाँद पर पहुँच गईं।
और अपनी कुछ बहनें…
अब भी मोहल्ले की बालकनी में खड़ी हैं,
हाथ में दूरबीन नहीं –
दूसरों की ज़िंदगी नापने का स्कैनर लेकर।
“वो कितनी गोरी है…”
“ये कितनी काली है…”
“अरे! मैं तो उससे ज़्यादा सुंदर हूँ।”
“मुझ पर तो लाखों मरते हैं।”
“मैं खाना ऐसा बनाती हूँ कि गैस सिलेंडर भी इमोशनल हो जाए।”
और उधर सामने वाली…
“देखो कैसे चलती है।”
“देखो कैसे कपड़े पहनती है।”
“इसके चेहरे पर तो ऐंठन है, इसे ऐटिट्यूड कहते हैं।”
मैंने कहा –
“बहन, दुनिया मंगल और चाँद पर कॉलोनी बसाने की सोच रही है…”
वो बोली –
“अच्छा छोड़ो, पहले ये बताओ…
उसकी साड़ी असली है या कॉपी?”
विकास रॉकेट की स्पीड से भाग रहा है,
और हम अब भी
गोरी-काली, सुंदर-बदसूरत, रोटी-सब्ज़ी
के स्टेशन पर उतरे खड़े हैं।
इसलिए…
वो चाँद तक पहुँच गईं,
और हम…
अब भी पड़ोस की छत तक ही सीमित हैं। 😂