क्यों समाज तूने यह रीत बनाई है
अपनी बिटिया हुई पराई है
न तू सीता है, न तू राधा है
त्याग की मूरत ऐसी बनाई है,
कितने बने महल-द्वारे
घर की चारदीवारी
चौखट बनी लक्ष्मण रेखा है,
देश को आजादी मिली
पर तू कभी आजाद न हुई है ,
गली-गली चौबारे पर बैठा बहरूपिया है
मौसम की तरह दुनिया रंग बदलती है
नारी तेरा रंग बदलना
दुनिया को रास न आया है,
अपनों को भूल न सके
पराए को अपनाया, समझ न सके
ऐसे भंवर में फंसी न रह सके
न निकल सके,
दिन गुजरे महीने बीते
दुखों की गिनती सालों में हो जाती है,
ऐसी रहती तू जैसे पंख काट दिए पंछी के,
क्यों जुर्म करें नारी पर ये लक्ष्मी है,
सरस्वती है,
जब अति हो जाए मां दुर्गा का अवतार है
औरत ही नानी, औरत ही दादी
औरत ही मां, बुआ, मौसी है
औरत न हो तो ये दुनिया अधूरी है।