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लाइफ में, कुछ तो, सिक्रेट होना चाहिये । वरना लोग हमारी, व्येलू करना छोड देते हैं।।
अरे . बहु जी ' बर्तन साफ होने में नही आ रहे है। गर्म पानी दे जाओ ' प्रेमवती अपनी सेठानी को आवाज लगाती है। ' और सेठानी गर्म पानी लेकर बुढी ' अम्मा को पानी देती है। लो . अम्मा जी पानी अब साफ होंग बर्तन ' तभी प्रेमवती घूरते हुए। जै का सेठानी कटोरा भरकर झूठन इसे कूड़े मे डालोगी ' सेठानी हां अम्मा जी ' प्रेमवती अरे हम वार ' की बात कहो तो साची है। पड़ी लिखी हो कर घर का आधा खाना बचा हुआ कुड़ेदान की जगह सड़क पर घूम रहे पशु पक्षी को डाल दो तो किसी का भला हो। सेठानी चौकते हुए हां अम्मा जी सही बोले है। सेठानी को प्रेमवती के कहा बुरा न लगा। एक बर्तन मे झूठन ' व खराब खाना सब्जियो फल के छिलके बर्तन में इक्कट्ठे किये ' और बाहर सड़क के पशु को डालना शुरू कर दिया । सेठनी सोचने लगी जो बाते ' मोबाइल पर पढ़ती थी, मैसैस ' . कूड़ेदान मे मुंह डाल कर खाने से ' पशुओ को कितनी चोट लगती है। जो बात हर समय हाथ मे लगा, मोबाइल न समझा सका वो बात बूढी अम्मा ने सिखा दी।
सच्चे रिश्ते कुछ नहीं मांगते, शिवाय वक्त और इज्जत के।
सपनों में भी तुम्हारे सिवा किसी और का ख्याल नहीं, आता । वे हिसाब प्यार करते है हम। ख्वाबों मे भी तुम्हारा साथ निभाते है हम , तुम हो कि हर पल ठुकराते हों हमे, हर पल तुम्हारे आने की आहट दरवाजे पर महसूस करते हैं हम । तमन्ना कभी पूरी नहीं हुई , ' फिर भी तेरी आंखें मे अपनी पूरी दुनिया देखते है हम । तुम से प्यारा कोई लगता नहीं हमे, तुम्हारी आदत हो गयी है , कैसे जुदा हो कर - रहे हम। एक पल तुम्हारी अवाज न सुने पल भर का समय सौ बर्ष के बराबर बीताते हम वही शादी से पहले वाली चाहत बन जाये हम। हर पल सांसो पर तुम्हारा नाम हर संगीत मे गुनगुनाते है हम , सोलह श्रृंगार मेरे तेरे लिए जैसे भी हैं साजन की सजनी है आखिर हम , गिला शिकवा दुर करके तो देखो चाहत मे नजर फिर भी आयेगे हम , रूठो न हम से ऐसे फिर कभी लौट कर न आये हम। अगले जन्म का वादा नही करते दुसरे घर से ढोली आयी , इस चौखट से अर्थी पर ही जाऊँगी मै , ज्यादा देर न हो जाये हमारी वफा को पहचान लो कदर , समझो बीच मंझधार मे न वि छडेगे हम।
क्यों समाज तूने यह रीत बनाई है अपनी बिटिया हुई पराई है न तू सीता है, न तू राधा है त्याग की मूरत ऐसी बनाई है, कितने बने महल-द्वारे घर की चारदीवारी चौखट बनी लक्ष्मण रेखा है, देश को आजादी मिली पर तू कभी आजाद न हुई है , गली-गली चौबारे पर बैठा बहरूपिया है मौसम की तरह दुनिया रंग बदलती है नारी तेरा रंग बदलना दुनिया को रास न आया है, अपनों को भूल न सके पराए को अपनाया, समझ न सके ऐसे भंवर में फंसी न रह सके न निकल सके, दिन गुजरे महीने बीते दुखों की गिनती सालों में हो जाती है, ऐसी रहती तू जैसे पंख काट दिए पंछी के, क्यों जुर्म करें नारी पर ये लक्ष्मी है, सरस्वती है, जब अति हो जाए मां दुर्गा का अवतार है औरत ही नानी, औरत ही दादी औरत ही मां, बुआ, मौसी है औरत न हो तो ये दुनिया अधूरी है।
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