Hindi Quote in Poem by C M kasana

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ये मत मत पूछो साहब कि
इस धरती से गिला क्या क्या है
यह पूछो कि इस धरती से मिला क्या-क्या है ।

जिस नदिया ने शीतल जल दिया पीने को
हमने उस नदिया को
मैले कपड़ों और तन को धोकर
कितना गन्दा कर दिया ।

जिन पेड़ों ने फल दिए खाने को
सांस दी जिन्दा रहने को
उन पेड़ों को हमने काट कर बेच दिया
चंद सिक्कै कमाने को ।

जिस धरती ने सीना दिया घर बनाने को
तन दिया अन्न उपजा कर पेट कि बुझाने को
हमने उसमें भी ज़हर घोल दिया
उपजाऊ शक्ति बढ़ाने को ।

ऊपर वाले ने तो इंसान बनाया था
एक दूसरे की मदद करने को
मगर इंसान के पेट की भूख इतनी बढ़ गई
पेट तो भर गया मगर भूख नह मिटी
इंसान ने उन्नति के नाम पर प्रकृति का
कितना ही विनाश कर दिया ।

मत पूछो साहब इस धरती से गिला क्या क्या है
यह पूछो साहब इस धरती से मिला क्या क्या है।

हिसाब करने बैठो तो हिसाब नहीं कर पाऊंगा
क्योंकि प्रकृति मां है मां देना जानती है लेना नहीं जानती है इसका हिसाब करना बहुत मुश्किल है
जिस तरह इंसान जन्म देने वाली मां का
हिसाब नहीं कर सकता है
उसी तरह जीवन भर अपने आंचल में पालने वाली
प्रकृति मां का हिसाब करना भी मुश्किल है ।

मत पूछो साहब इस धरती से गिला क्या क्या है
यह पूछो साहब इस धरती मां से मिला क्या क्या है।

Hindi Poem by C M kasana : 111980954
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गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर
गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर

सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर पड़ती, पूरा गांव सुनहरी रोशनी से जगमगा उठता। पक्षियों की मधुर चहचहाहट, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और ठंडी हवा मन को एक अलग ही शांति देती थी।

शहर में रहने वाली अनन्या कई साल बाद अपने दादा-दादी के गांव आई थी। शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और मोबाइल की दुनिया में वह खुद को थका हुआ महसूस करती थी। गांव पहुंचते ही उसने देखा—हर चेहरे पर मुस्कान थी, हर घर का दरवाज़ा खुला था और हर इंसान एक-दूसरे का हाल पूछ रहा था।

एक सुबह दादाजी उसे खेतों में ले गए। हरी-भरी फसलें हवा के साथ झूम रही थीं। किसान मेहनत कर रहे थे, लेकिन उनके चेहरों पर संतोष साफ दिखाई दे रहा था।

अनन्या ने पूछा, "दादाजी, यहां लोगों के पास शहर जैसी सुविधाएं तो नहीं हैं, फिर भी ये इतने खुश कैसे हैं?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटी, खुशी बड़ी-बड़ी इमारतों में नहीं, बल्कि संतोष, अपनापन और प्रकृति के साथ जीने में होती है।"

उस दिन अनन्या ने बच्चों के साथ मिट्टी में खेला, पेड़ों की छांव में बैठकर कहानियां सुनीं, तालाब किनारे सूर्यास्त देखा और रात को खुले आसमान में अनगिनत तारों को निहारा।

जब वापस शहर लौटने का समय आया, तो उसके दिल में एक नई सोच जन्म ले चुकी थी। उसने समझ लिया कि जीवन का असली सुख केवल पैसा कमाने में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए पलों और प्रकृति के करीब रहने में है।

उसने तय किया कि चाहे वह शहर में रहे, लेकिन गांव की सादगी, प्रेम और शांति को हमेशा अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखेगी।

सीख:
"सच्ची खुशी वहीं मिलती है, जहां मन को शांति, रिश्तों में अपनापन और प्रकृति का साथ मिलता है। गांव की सादगी ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत है।" 🌿🌾

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